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शनिवार, 14 सितंबर 2019

“हिन्दी दिवस” की ढेरों शुभकामनाएँ!!!

हिन्दी दिवस

मित्रों!

आधुनिक हिन्दी के पितामह कहे जाने वाले महान हिन्दी साहित्यकार “भारतेन्दु हरिश्चंद्र” ने कहा था____

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल |
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल....|”

उनके द्वारा कहे ये शब्द आज भारत राष्ट्र को अंग्रेजों से आजादी प्राप्त किए गए इतने वर्षों बाद भी अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी भाषा की गिरफ्त से आजादी न मिल पाने के दर्द को बयां करते हैं और न जाने कितनों को स्वयं के अभिव्यक्ति को मात्र भाषा के आधार पर दूसरों तक न पहुंचा पाने की वेदना को भी समेटकर बस हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपनी राजभाषा हिन्दी को न केवल अपने शब्दों में शामिल करें अपितु अपनी सोच को भी हिन्दीमय कर लें क्योंकि ये पीड़ा आज इतनी बढ़ चुकी है कि अब हिन्दी के कुछ शब्दों की तुलना में अँग्रेजी के शब्द हम सभी को आसान लगने लगें हैं|

मन, वचन व कर्म में हिन्दी को शामिल किए जाने की कामना के साथ “हिन्दी दिवस” की ढेरों शुभकामनाएँ!!!

शनिवार, 10 नवंबर 2018

"राष्ट्र भाषा हिंदी की उपयोगिता"____हिंदी जनमानस के परिप्रेक्ष्य से





"भाषा"________एक माध्यम भावनाओं की अभिव्यक्ति का और भाषा अगर मातृ भाषा हो तो भावनाओं की अभिव्यक्ति तो ऐसे निकलकर लेखनी में उतर जाती है कि कागज़ रूपी कैनवास भी कम पड़ जाए इन्हे चित्रमाला में पिरोने के लिए|

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे आज पूरे वैश्विक पटल पर मात्र एक दिशा देने की आवश्यकता है क्योंकि 7.6 बिलियन आबादी वाले इस विश्व में हिंदी भाषा को माध्यम बनाकर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है कि इस भाषा को वैश्विक पटल पर भाषा के रूप में अपनाये जाने के कारण इसे चतुर्थ स्थान प्राप्त है| हिंदी भाषा के माध्यम से अपनी छिपी और सारगर्भित तथ्यपूर्ण बातों से हम दूसरों को अवगत करा सकें यही उद्देश्य हर हिंदी भाषी के अंतर्मन को बार-बार उद्वेलित करता है, ऐसा इस लिए है क्योंकि कभी-कभी भाषा के चलते हमारे सामने मुश्किलें ये आती हैं कि हम अपनी बात अपनी मातृ-भाषा में धाराप्रवाह तो बोल सकते हैं परन्तु दूसरी अन्य भाषा इसे संक्षिप्त कर देती है|


लिहाजा आज जरुरत इस बात की है कि हमारी समग्र और समृद्ध हिंदी को हम इतना विकसित करें कि वो उन आम जन को भी एक मंच प्रदान करे जो भाषा के चलते अपनी बात रख नहीं पाते| हिंदी न केवल हमारी राष्ट्र भाषा है अपितु देश के 70% आबादी का भी प्रतिनिधित्व करती है और वैश्विक आंकड़े भी इनमे जुड़ जाए तो ये और बड़ा हिस्सा अपने अंतर में समाहित किये हुए है| वर्तमान में हिंदी कि उन्नति का द्वार इस लिए भी खुल गया है क्योंकि विदेश से आने वाली कंपनियां भी हिंदी भाषा का प्रयोग, हिंदी बोलने वाले ग्राहकों के अत्यधिक जन-बल के कारण ज्यादा से ज्यादा करने की जुगत में लगी हैं|


लिहाजा 21वीं सदी का ये दशक बहुत उपयुक्त समय है "रामधारी सिंह दिनकर", "मुंशी प्रेमचंद्र", "महादेवी वर्मा", "सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'", "सुभद्रा कुमारी चौहान", "मैथिली शरण गुप्त" जैसे हिंदी के धुरंधरों की परम्परा को आगे बढ़ाने का और भाषा के चलते आ रही अभिव्यक्ति की असमर्थता से निपटने का|

हम सबका गर्व - हिंदी




14 सितम्बर (हिंदी दिवस)_______________एक अविस्मरणीय तिथि, जो साकार स्वरुप है उस विचारधारा का जो अतीत से कर वर्तमान तक हिन्द राष्ट्र की अविरल बहती हिंदी रूपी धारा से न केवल भारत अपितु दुनिया के कोने-कोने को सिंचित कर रही है|

भारत अंतराष्ट्रीय मानचित्र पर रेखांकित एक ऐसा देश है जिसकी गौरवमयी ऐतहासिक गाथा के गान से सम्पूर्ण विश्व गुंजायमान हो रहा है| ऐसे में भारत की पहचान को और भी सशक्त, समृद्ध और समग्र बनाने में इस देश की राष्ट्रभाषा का योगदान भी कम प्रशंसनीय नहीं है| परन्तु आज हिंदी के इस सम्मानजनक अवस्था में पदार्पित करने के पूर्व इससे जुड़े इतिहास का भी आकलन महत्वपूर्ण हो जाता है क्यूंकि चर्चा ही "हिंदी की समग्रता" की है|

भारत एक ऐसा राष्ट्र, जिसकी धन्यता और सम्पन्नता की कहानियों ने सदैव से दुनिया भर के आक्रांताओं को अपनी तरफ आकर्षित किया है और जब ये आक्रांता भारत-माता की सीमाओं में प्रविष्ट हुए तो निरंतर दोहन की उनकी मानसिकता ने उन्हें यहाँ रुकने के लिए मजबूर कर दिया और इसी के चलते भारत राष्ट्र और भारतीय जनमानस ने अनगिनत वर्षों तक गुलामी की कैद में स्वयं को ही तर्पित कर दिया |

परन्तु इतिहास ने करवट ली और भारत माता के वीर सपूतों के शौर्यवान प्रदर्शन ने 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी के रथों पर बिठाकर विश्व मंच के पटल पर प्रेषित कर दिया लेकिन माँ भारती के नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी वो थी एक ऐसी भाषा जो भारत माँ को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक-एका के सूत्र में पिरो सके क्यूंकि पूर्व से ही विविध भाषाओँ से परिपूर्ण भारत को अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के भरपूर प्रयोग से आच्छादित कर रखा था लेकिन भारत का एक बड़ा हिस्सा इससे भी अछूता था|

लिहाजा अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रचलन को रोकने और स्वयं के भाषा की तरजीह देने की जद्दोजहद के बीच भारत के नीति-निर्माताओं ने आज ही के दिन 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दे दिया| तब से लेकर आज तक हिंदी सदैव पुष्पित और पल्लवित हुई है|

परन्तु दुःख इस बात का है कि सम्पूर्ण विश्व की भाषा बन चुकी अंग्रेजी ने आज तक इसके सरल पथ को जटिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| आधुनिकता और दिखावे की चादर में लिपटा भारतीय जनमानस का एक तबका हिंदी आते हुए भी उससे एक दूरी बनाये हुए है, कहीं-कहीं अंग्रेजी बोलना स्टेटस सिंबल तक बन गया है फिर भी इन सभी नकारात्मक मनः स्तिथियों के होते हुए भी भारत की गर्व बनी हमारी भाषा हिंदी आज दुनिया के प्रत्येक कोने में सम्माननीय दर्जा पाने में सफल सिद्ध हो रही है|