Hindi Writing Blog: Social Issues
Social Issues लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Social Issues लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 9 जून 2019

कब थमेगा ये अंतहीन हो चला सिलसिला…



Girl Safety












कसक उठी है वही, 

फिर हूक सीने में ।

तड़प जाता है मन मेरा,

कली से यूं बिछड़ने पर ।

छलक जाते हैं आँखों से ये आँसू,

जमाने भर की बेबसी पर ।

कहीं विधि का लचरपन है,

कहीं खुद की विवशता है ।

कहाँ ढूंढ़ू कहाँ पाऊँ,

न मंजिल है न रस्ता है।

कसक उठी है वही फिर हूक सीने में,

कसक उठी है वही फिर हूक सीने में...

 

भारत माँ के आँगन से एक और बेटी की निर्मम विदाई से आहत मन की वेदना...


रविवार, 19 मई 2019

देश प्रगति में बाधक बनी सामाजिक समस्याओं का समाधान अनिवार्य है




Social Issues


जिद हो बदलने की,
बदल सकता जहां ये है।
अगर दृढ़ हों इरादें तो,
संवर सकता जहां ये है॥
चलो मिलकर सजाएँ हम,
नया भारत बनाएँ हम।
नया भारत बनाएँ हम…

हमारा राष्ट्र भारत(India) जिसका तिरंगा(National Flag) जब दुनिया के किसी भी कोने में फहराया जाता है, तो ये भारतीय के मन को झंकृत कर जाता है और ऐसा हो भी क्यों न, क्योंकि हम सब की शान है हमारा तिरंगा, जो न केवल हमारे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है अपितु हम 120 करोड़ भारतवासियों को भी प्रस्तुत करता है। गर्व होता है हमें अपने देश की उपलब्धियों को देखकर, फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र से क्यों न हों, लेकिन हम सब ये जानते हैं कि हमारी ये कामयाबी हमें एक दिन में नहीं मिली है, कैसे और कितना कुछ न्योछावर करके हमारे राष्ट्र ने आज ये मुकाम हांसिल किया है। एक तरफ हमारे राष्ट्र की प्रगति, हमारे मस्तक को गर्व से ऊंचा करती है तो वहीं दूसरी ओर प्राचीन काल से चली आ रही कुछ कुरीतियों के साथ कुछ आधुनिक समस्याएँ भी हमारे भारतीय समाज में व्याप्त हैं, जो हमें ये सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि यदि हम सभी अपने राष्ट्र को और ऊंचाई पर देखना चाहते हैं तो हमारे समाज का समग्र विकास इसके लिए अत्यंत अनिवार्य है।
Poverty

आज हम सभी 21वीं सदी में जी रहे हैं और इस आधुनिकता से भरे वातावरण में भी बहुत सी समस्याएँ अपना फन फैलाये भारत राष्ट्र की उन्नति को रोकने के लिए तैयार बैठी हैं, जिनका समाधान हम सब को मिलकर ही करना होगा, क्योंकि जिस दिन समाज का प्रत्येक व्यक्ति इससे निपटने का जिम्मा संभाल लेगा उस दिन अवश्य ही ये परिवर्तन हमारे राष्ट्र को परिवर्तित कर देगा और ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रही कि हम अकेले कुछ नहीं कर सकते, इतिहास गवाह है कि सती प्रथा जैसी भयावह कुरीति को समाप्त करने वाले राजा राममोहन राय भी अकेले ही थे जिन्होने ऐसा किया, फिर हम क्यों नहीं? इस आधुनिक काल में जहां पूरी दुनिया चाँद पर पहुँचने का ख्वाब सजा रही है वहीं हमारे भारत में आज भी प्राचीन परम्पराओं का पालन करते हुए बाल श्रम(child labor), महिलाओं के साथ भेदभाव(women inequality), भ्रूण हत्या(foeticide), बाल विवाह(child marriage), दहेज प्रथा(dowry custom), जातिवाद(casteism) व अंधविश्वास(superstition) जैसी कुरीतियों के साथ कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं जिनसे निपटने के लिए तो समाज के हर व्यक्ति हो आगे आना होगा और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए इस राष्ट्र में साफ-सफाई लानी होगी, साक्षारता को और बढ़ावा देना होगा, मदिरापान(Drinking) और अपराध(crime) को नियंत्रित करना होगा, भूखमरी(Starvation) और गरीबी(Poverty) के लिए समूहगत होकर गावों से लेकर शहरों की गलियों तक संस्थानों और सरकारों की मदद के लिए आगे आना होगा क्योंकि ये सारी चीजें जब एक साथ बढ़ेंगी तभी हमारा राष्ट्र इन समस्याओं से मुक्त होगा| तो मात्र लेखन-पठन तक न रुककर हम सभी अपनी क्षमतानुसार इस मुहीम को अपना हिस्सा बनाएँ और राष्ट्र के प्रगति के साक्षी बनें।
जय हिन्द जय भारत...

शनिवार, 4 मई 2019

दिल दलहलाने वाले घटनाक्रमों से आहत मानव-जीवनधारा

Terrorism Impact

























पिछले हफ्ते पूरी दुनिया से जिस तरह के दिल दहलाने वाले घटनाक्रम हम सबके सामने आए, उन सब से हमारा मन आहत तो होता ही है और हम ये समझ नहीं पाते कि ऐसा क्यों हो रहा है? वैसे तो जब भी हम समाज में अपने इर्द-गिर्द नजरें दौड़ाते हैं तो न जाने कितने घटनाक्रमों से हमारा सामना होता है जो न केवल अप्रिय होती हैं अपितु हमारे दिल को भी एक अंजाने भय से दहला जाती हैं|

आज जब कभी भी मैं अपने देश के अप्रिय समाचारों से नजरें बचाने के लिए दुनिया के गलियारों में झाँकती हूँ, तो वहाँ भी मुझे वही नजारा देखने को मिलता है जो मानव-जीवनधारा को ही रौंदने पर आमादा है और जिसके घटित होने के पीछे कोई अदृश्य ताकत नहीं बल्कि स्वयं इंसान ही है जिसकी बुद्धिमत्ता का लोहा पूरी दुनिया मानती है| न जाने ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर ढूंढते-ढूंढते हम सब भले थक जाएँ पर इन घटनाक्रमों को अंजाम देने वाले नहीं थकते और जिसका परिणाम हैं ये दिल दहलाने वाली घटनाएँ!!!

ये कैसी लड़ाई है? और किसके विरुद्ध है? कुछ समझ ही नहीं आता, माना कि इंसानी फितरत में लड़ाई भी शामिल है लेकिन वो मात्र स्वस्थ् प्रतिस्पर्धा के लिए है न कि मानव जीवन का ही गला घोटनें के लिए| अभी पिछले हफ्ते श्रीलंका (Sri Lanka) में जो कुछ हुआ, उसने मन को इतना आहत किया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? जिस बुद्ध कि धरती से दुनिया के लिए शांति संदेश निकलना चाहिए वहाँ न जाने कितने निर्दोषों ने अपने ईश को पूजते-पूजते अपनी जान गवां दी, दिल दहल गया कि आखिर कब बंद होगा ये सब? वहीं दूसरी ओर भारत (India) सहित दुनिया के अन्य देशों अमेरिका (US), ऑस्ट्रेलिया (Australia) और लीबिया (Libya) से भी मानव धन की कीमत पर हांसिल की जा रही जीत अन्तर्मन को अंदर तक छलनी कर देती है|

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है| आज न जाने कितने वर्षों से ये सब हो रहा है, बस अब तरीका बदल गया है और डर लगता है इससे कि कहीं ये तरीका मानव जीवन के वजूद को ही न खत्म कर दे| वैसे तो हमारे पड़ोस में किसी के द्वारा की गयी आत्महत्या जैसी घटना भी हमारे दिल को दहलाने के लिए पर्याप्त होती है फिर ऐसे में इतनी बड़ी घटनाएँ हमें कुछ दिनों, कुछ सालों के लिए सकते में डाल जाती हैं|

कभी-कभी तो मन सोचता है कि हमारी इस दुनिया में इतना भटकाव क्यों है? क्या ये कारवां यूं ही चलता रहेगा या इसमें कुछ बदलाव भी कभी आएगा? क्या आप सब को यह नहीं लगता कि एक बार फिर इस धरती पर महात्मा बुद्ध और महावीर जैन जैसे शांति दूतों का आगमन नहीं होना चाहिए? आखिर हम सबके इस धरती पर होने का मतलब क्या है? हम क्यों विवश होते हैं एक खुशनुमा जिंदगी के स्वप्न से परे होने को? क्या इस धरती पर समस्याएँ कम हैं, जो इस धरती पर हम इंसान क्षण प्रति क्षण नयी-नयी समस्याएँ पैदा करते जा रहे हैं? ये प्रश्न एक अनसुलझा प्रश्न है जिसका उत्तर मात्र और मात्र आने वाले भविष्य में छुपा है______________जिसकी आकांक्षा में आप और मैं दोनों हैं--------------


शनिवार, 29 दिसंबर 2018

नर नारी के बीच समानता इस मानव निर्मित समाज की अनिवार्यता क्यूँ?




नर-नारी उपहार सृष्टि का
फिर विभेद ये कैसा है |
नारी ने जन्मी मानवता
तो नर भी है सृजक समाज का ||
फिर विभेद ये कैसा है...
नर मे है पुरुषत्व का बल तो
नारी मे अंतर्बल की बहती धारा |
ऐसे मे पूरक हैं दोनों
फिर विभेद ये कैसा है ||
फिर विभेद ये कैसा है...
                ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

                                     

कल जब पूरे देश की सुर्खियों मे छाये तीन तलाक विधेयक को लोक सभा मे पारित किया गया तो देश की इस व्यवस्थापिका के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने हेतु नमन के लिए शीश अपने आप झुक गया क्योंकि ये भारतीय नारियों के इतिहास का वो स्वर्णिम दौर है जब महिलाओं की समानता को वैधानिक रूप से पुरजोर बल मिला है और ये बल आज के इस दौर मे इसलिए भी मायने रखता है क्यूंकि इसमे धर्म और समाज की बेड़ियों को तोड़ते हुए मात्र और मात्र नारी हित की ही बात दोहराई गयी है और ऐसा शायद इसलिए भी संभव हो सका है क्यूंकि आज की भारतीय नारी ने गज़ब की दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए मानव निर्मित इस समाज मे पुरुषों के समान अधिकार को दिये जाने और अपने हक़ की लड़ाई को लड़ने वाली पहल का सदैव समर्थन किया है| 
सदियाँ गवाह रहीं हैं कि प्राचीन काल से ही भारतीय नारियां पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं हैं फिर वो चाहे युद्ध क्षेत्र हो या ज्ञान क्षेत्र सभी मे उन्होने अपनी मौजूदगी पूर्ण रूप से स्पष्ट की है यही नही उन्होने आगे बढ़कर पुरुषों के साथ तारतम्य स्थापित करते हुए विदेशी आक्रांताओं से राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा भी की है| 
ऐसे मे समय की बहती धारा मे नारियों के अस्तित्व पर धीरे-धीरे पुरुषों का पुरुषत्व हावी होता चला गया जिसने स्त्रियों को देश की परिधियों से समेंट कर घर की चार दीवारी मे कैद कर दिया परंतु हौंसलों की ऊंची उड़ान उड़ने वाली भारतीय नारियों ने गाहे-बेगाहे इन चार दीवारियों की बेड़ियों को तोड़कर भारत राष्ट्र के गर्व पटल पर अपने साहस और शौर्य की अमिट दास्तान अंकित की| 
इतना ही नही उन्नीसवीं सदी आते-आते भारतीय नारियों ने घर की जिम्मेदारियों को अपना संबल बनाते हुए समाज की नकारात्मक घटनाओं से लड़ने मे भारतीय पुरुषों का बराबरी से साथ दिया फिर वो चाहे आजादी की लड़ाई हो या आजाद भारत का नव-निर्माण सभी मे नारियों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने कर्तव्य का बखूबी निर्वहन किया| 
इतने पर ही न रुकने वाला नर-नारी का ये अद्भुत सामंजस्य इक्कीसवीं सदी में भारत राष्ट्र की  एक नयी तस्वीर पूरी दुनिया मे प्रस्तुत कर रहा है चाहे वो सैन्य क्षेत्र हो, विज्ञान, खेल या राजनीति सभी क्षेत्रों मे ये समीकरण इतनी गहराई से समावेशित हो चुका है कि जिसके चलते आज पूरी दुनिया मे  हमारे देश को एक नही पहचान मिल रही है| 
वर्तमान मे नारियों की इस सबलता के पीछे पुरुषों के योगदान को भी कम करके नही आँका जा सकता और हर क्षेत्र मे महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने पुरुषों के सोच को बदलने पर मजबूर कर दिया| ऐसे मे हमारे समाज को अगर हमें तरक्की के नए रास्ते पर लेकर जाना है तो समाज के एक महत्वपूर्ण अंग परिवार को अपने कंधे पर आगे ले जाने वाली नारी की अनिवार्यता को समझना ही होगा जिसको आज का समाज बखूबी निभा रहा है|
ऐसे मे पुरुषों की सोच और समझ मे शामिल महिलाओं की दृढ़ इच्छाशक्ति और कर्तव्य निष्ठा वर्तमान मे पूरी दुनिया मे भारत को एक नयी बुलंदी पर लेकर जा रही है......अच्छा लगता है ये परिवर्तन!!!


शनिवार, 10 नवंबर 2018

भारत राष्ट्र को दरकार किसकी?___________ बुलेट ट्रेन या दो वक़्त की रोटी!

 
Bullet Train Vs Food


उदर की वेदना अब, चीत्कार कर रही है ।
नयनो की अश्रु धारा, विलाप कर रही है ।।
जीवन गति न रोक दे, विकास का अलाप ये । 
सचेतो अब मूर्धन्यों!
उदर की वेदना अब, चीत्कार कर रही है ।
चीत्कार कर रही है ।।
          "कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित

भारत________विश्व के मानचित्र पर अंकित एक ऐसा राष्ट्र जिसकी सशक्तता का इतिहास सदैव से साक्षी रहा है। सनातन काल से चली आ रही परम्पराओं ने तो इसे विश्व गुरु की संज्ञा से भी अलंकृत कर रखा है परन्तु इन सब के बावजूद क्या भारत का वर्तमान सही में ऐसा बन पा रहा है जो पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करने में समर्थ हो? ये प्रश्न शायद आज भी अनुत्तरित है क्योंकि जिस भारत के विकसित होने का हम दम भर रहे हैं वो भारत ये भारत नहीं है जहाँ आज भी इसके नागरिकों को अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (रोटी, कपडा और मकान) में से एक रोटी की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

हाल ही में आयी ग्लोबल हंगर की रिपोर्ट ने इस बात की प्रमाणिकता पर अपनी मुहर भी लगा दी और इस तथ्य को पूर्णतया सत्य भी कर दिया कि कभी विश्व गुरु का दर्जा पाने वाले भारत के वर्तमान में दो रूप हैं, एक तरफ का भारत गगनचुम्बी इमारतों, चकाचौंध से भरी दुनिया का भारत है तो वहीँ दूसरी तरफ का भारत इससे बिलकुल अलग गरीबी, भुखमरी और बेकारी का भारत है।

असंतुलन का ऐसा भद्दा स्वरूप है ये जिसके आधार पर भारत के विश्व पटल पर पुनः विश्व गुरु कहलाये जाने के प्रश्न पर ही एक सवालिया निशान लग जाता है। ये कैसे समाज में हम रह रहे हैं जहाँ हम बुलेट ट्रेन और स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की बात करते हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि देश की 2/3 आबादी को हम दो वक़्त की रोटी तक दे पाने में सक्षम नहीं हैं।

कैसा विकास है ये? किसका विकास है ये? और किसके लिए विकास है ये? जिसे हम हमारे देशवासियों के जीवन को जीवंत रखने वाली दो वक़्त की रोटी के बदले छीन कर हासिल कर रहे हैं।

ऐसे में ये प्रश्न लाजिमी है कि आखिर हमारे देश को आज दरकार किसकी है ________बुलेट ट्रेन की या फिर भूख से बिलख रहे देश वासियों के दो वक़्त के निवाले की?

 

"आखिर हम क्यूँ नहीं समझते सांप्रदायिक सौहार्द की महत्ता को"




न तेरा हो, न मेरा हो ।
सौहार्द का बसेरा हो ।।
शान्ति का प्रकाश हो ।
और विकास का ही डेरा हो ।। ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

आज जब कभी भी मेरे श्रवणेन्द्रियों को धर्म के आधार पर घटी दुर्घटनाओं के श्रवणपान का अवसर प्राप्त होता है, मन उद्विग्न सा हो उठता है कि क्या यही उद्देश्य है इस मानव जीवन का, जब रचयिता ने धरा पर भेजते वक़्त धर्म की कोई मर्यादा तय नहीं की तो आखिर हम यहाँ आकर समाज द्वारा स्वनिर्मित किये गए मानकों को लेकर आपस में द्वेष भाव क्यूँ रखते हैं।

                     माना की समाज के बंधे दायरे में हम जन्म लेते हैं, फिर भी क्या हममे इतनी भी इच्छाशक्ति नहीं कि हम दुराभाव से परिपूर्ण तथ्यों को एक सिरे से नकार दें, सम्पूर्ण सृष्टि ने हम सभी को जीवन रूपी अनमोल उपहार देकर अलंकृत किया है तो फिर क्या हमारा ये कर्तव्य नहीं बनता कि हम अपनी अच्छाइयों से इस सृष्टि के वातावरण में अनुकूलता का ऐसा भाव घोल दें कि वैमनस्य के अंधकार से ये धरा मुक्त हो जाए। हम सभी कुदरत की अनमोल कृति हैं लिहाजा हम सभी को धर्म की मर्यादाओं से ऊपर उठकर इस दुनिया को देखना होगा 
तभी हमारी ये मानवीय दुनिया एक ऐसी दुनिया बन पाएगी जिसकी कल्पना शायद सृष्टि के निर्माता ने इसे बनाते वक़्त सोची होगी।

                       सोच के देखिये! कितना अच्छा होता यदि समाज में चारों तरफ शांति, सौहार्द और विकास का प्रकाश व्याप्त होता तो हम सभी का जीवन एक समान आकर्षक होता, अगर हम सामाजिक कुरीतियों से परे हटकर अपने समाज की संकल्पना भर कर लें तो हमारा मन आह्लाद के झूले में बैठकर आकाश की असीम ऊंचाइयां छूने लग जाता है।
क्या रखा है इस संप्रदाय, जाति, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच को आधार मानकर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों में, अंत में हमें हाँसिल क्या होता है? सिर्फ और सिर्फ बरबादी। तो क्या आप को नहीं लगता इन सबसे परे हटकर हम सभी को सौहार्द की ऐसी गंगा इस समाज में प्रवाहित करनी चाहिए जिसकी बहती अविरल धारा में हम कागज़ से बनी उस नाव को भी तैरा सकें जिसमे इस संमाज का, उसमे रहने वाले सामाजिक प्राणियों का सिर्फ और सिर्फ कल्याण छुपा हो ताकि इतिहास इस बात का साक्षी बने कि हम गतिशील हैं न कि गतिहीन।

"बच्चों की गूँज से सूनी हैं क्यों गलियां"



कहाँ गए वो गिल्ली-डंडे, कहाँ गयी वो आँख मिचौली
कहाँ गया वो हँसता बचपन, कहाँ गए वो गुड्डे-गुड़ियाँ
सूनी हैं आँगन गलियां अब, 
मैदानों की परिधियाँ तो, कमरों तक ही सिमट गयीं
रंग बिरंगे खिलौने अब, कम्पूटर से बदल गए
गूंज नहीं है बच्चों की अब
सन्नाटा सा पसरा है....सन्नाटा सा पसरा है!!
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

“बचपन”_____कुदरत द्वारा मानवीय जीवन को मिली एक अमूल्य धरोहर जिसको हम सभी जी भर के जीते हैं और ताउम्र न भुलाने वाली निधियों के रूप में संयोजित कर अपने अंतरमन में समेट कर रख लेते हैं और इन्ही निधियों की कोठरी में से एक-एक कर किस्सों को निकालते हैं और बचपन के प्रवाह वेग से आगे निकल चुके युवा जीवन को सजाते और सवांरते रहते हैं, इतना ही नहीं हम सभी हमारे बचपन में हमें मिली दादी-नानी की सीख से इतना कुछ सीख जाते हैं कि उसी आधारशिला पर अपने भविष्य का ताना बाना बुन लेते हैं और तो और बचपन में संगी-साथियों के साथ हंसी ठिठोली में की गयी बातें भी हमारे चेतन व अवचेतन मन को उम्र के हर पड़ाव में गुदगुदाती रहती है और एकांत में बैठे हमारे उदासीन चेहरे को भी मुस्कान रूपी किरणों की चंचलता से शोभायमान कर देती हैं।

                             बचपन में हम सभी ने जी भर कर गिल्ली-डंडे, बैट-बाल, लुका-छिपी, आँख-मिचौली जैसे अनगिनत खेलों को खेलकर अपना बचपन जीया है, मिट्टी के बने वो रंग-बिरंगे खिलौने, वो दादी-नानी के साथ मेलों में जाकर घूमना ऐसी न जाने कितनी बाते हैं जो हम सभी के मन को संगीत की उस अनसुनी झंकार से झंकृत कर देती हैं जो कभी हमने सुनी थी।
परन्तु आज हम अपने वत्सल ह्रदय पर सच्चे मन से हाथ रख कर सोचें तो क्या हम ये तय कर पाएंगे कि वर्तमान परिस्थिति में हमारे स्नेह से सिंचित किये जा रहे आज के बालमन को क्या हम वही बचपन दे पा रहे हैं; जिनकी यादें उन्हें उम्र भर गुदगुदा पाएंगी। क्या है? उनके यादों के खजानो में जो वे आने वाली पीढ़ियों से हमारे तरह ही बांट पाएंगे।
ये हमने उन्हें आधुनिकता और विकसित कहलाने की चाह में क्या दे दिया है___कंप्यूटर और मोबाइल! अधाधुंध बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने हमारे जीवन को तो पहले ही उद्वेलित कर रखा था और उसी उद्वेग को हमने अपने बच्चों में प्रेषित कर दिया है। ये संसाधन भले ही उन्हें कुछ अच्छी और उपयोगी चीजें सीखा रहे हैं परन्तु उसके बदले वे उस बचपन, उस संग-साथ, उस परिवार की भावना को भी उनसे छीन रहे हैं जो सदियों से बच्चों की अनमोल धरोहर रही है।
वो साथियों की टोलियां बनाकर घूमना, त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार और आने पर उसके एक-एक पल को जी लेना, दादा-दादी के गोद की सानिध्य में बैठकर किस्से कहानियों का सुनना, नाना-नानी के घर जाने का इंतज़ार, वे मस्तानी गर्मी की छुट्टियों का बर्फ के गोले खाने का इंतज़ार, बाल कहानियों से पुस्तकों और कॉमिक्स के लिए माता-पिता से मिलने वाली पॉकेट मनी का इंतज़ार ऐसी ही न जाने कितनी बातें जो अब सिमटकर कंप्यूटर और मोबाइल के कीबोर्ड तक ही रह गयी हैं।

                            अब न मैदानों में वो हलचल है, न ही कमरों के बाहर बच्चों की वो गूँज और न ही उनके पीछे आनेवाली दादा-दादी और नाना-नानी के सख्त तल्खियां हैं---सब कुछ बदल सा गया है____बच्चों की गूँज में छाए सन्नाटे के साथ अब सब सूना-सूना सा है!!!!

"सहमा सा शहर क्यों है"



चल उठ पथिक ! अब डोर सम्हाल |
नहीं वक़्त है सोने का ||
कब तक रहेगा दीर्घा में तू |
कभी उतर मैदान में आ || ("कैलाश-कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचिंत )

"शहर" जिसका जिक्र आते ही हम सभी के चक्षु पटल को चकाचौंध करती एक ऐसी दुनिया का दर्शन प्राप्त हो जाता जो परी लोक के दिव्य स्वरुप को साकार करता प्रतीत होता है, किन्तु हक़ीक़त इससे परे है| झिलमिल करती रोशनी से नहाये वर्तमान शहर आज मानव और मानवीय जीवन के मूल्यों की ऐसी धज्जियाँ उड़ा रहे हैं जो पूरे ब्रम्हांड को ही शर्मसार कर दे|
शहर जिनकी परिकल्पना ग्रामों से ऊपर उठ कर इस लिए की गयी ताकि मानवीय जीवन की ग्राम रूपी आत्मा को विकास की नैय्या में बिठाकर गगन छू लेने की आकांक्षा की प्रतिपूर्ति की जा सके, पर क्या पता था कि जिस विकास के जरिये मानवीय अंश अपनी खुशहाली कि नयी इबारत लिखना चाहता था वही आज उसकी मायूसी का कारण बन गया है| आज जब भी हम गावों से निकलकर शहरों की तरफ आते हैं तो इन शहरों की आकर्षित करने वाली भूल-भुलैय्या में खो से जाते हैं परन्तु वर्तमान में जिस तरह की तस्वीर शहरों ने प्रस्तुत की है वो मानवता के उस वीभत्स स्वरुप को प्रदर्शित कर रहा है जो इस सृष्टि के सर्जक को भी रोने के लिए मजबूर कर दे|
                           शहरों में आज की जिंदगी इस बात का पर्याय बन चुकी है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को परे रख लोग अपना हित साधने में लगे हैं और तो और आये दिन शहरों में हो रहे अपराध अनगिनत मानवीय जिंदगियों को दावं पर लगाकर अपनी चमक को कायम रखने का वास्ता दे रहे हैं| हाल ही में मुंबई शहर से आयी इस घटना सूचना ने मेरे अंतर्मन को एकदम से झकझोर दिया| जब एक प्राइवेट संस्था में कार्यरत कर्मचारी को सिर्फ कुछ पैसों के लिए मौत के घाट उतार दिया गया और उसके परिवार को ताउम्र न भूलाने वाला एक जख्म दिया गया जिसकी आहट से हर शहरी नागरिक हतप्रभ है| क्यूँ आखिर हम शहरों में सुरक्षित रहने के लिए ही जंग लड़ रहे हैं? क्या होगा इन भौतिक मूल्यों वाली इन सुख सुविधाओं का जब इन्हे भोगने के लिए हम ही न होंगे| क्यों हर दिन इन शहरों में बढ़ते अपराध क्रम दिन और रात के संतुलन को भी धराशायी करने में सफल हो रहे हैं|
                             क्या हुआ उस भाई चारे का जो शहरों में आकर कहीं खो सा गया है| क्यों हमारे गावं से निकली प्रेमालाप के गंगा शहरों के वहशीपन का शिकार हो रही है|

बस बहुत हो चूका ! अब हम सभी को अपनी-अपनी इस निर्णायक भूमिका को स्वीकारना ही होगा क्योंकि कब तक हम सभी घुट-घुटकर और सहम-सहमकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त मानवीय जीवन कि इस अमूल्य निधि के साथ दुर्भाव करते रहेंगे|

"राजनैतिक पार्टियों द्वारा उदघोषित भारत बन्द में पिसता आम जनमानस"


पिछले कुछ दशकों से लोकतंत्र में मिले अभिव्यक्ति के अधिकार का जिस तरह से दुरूपयोग भारतीय परिवेश में हो रहा है उसे अवलोकित करने के बाद हम आम जन की चेतन मन: स्तिथि जिस प्रकार से छिन्न-भिन्न हो रही है उससे इस तथ्य का अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो गया है कि भारत का आम नागरिक स्वयं को संगृहीत और संगठित बनाये रखने के लिए आवश्यक मन बल जुटाए या फिर समृद्धवान और शक्तिशाली बनाने के लिए शारीरिक बल|

                          लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह से घनघोर हिंसा का प्रदर्शन राजनीतिक दल अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहे हैं उसे देख कर तो यही लगता है कि भारत सिर्फ और सिर्फ इन राजनीति के पहरेदारों की कठपुतली बनकर नाचने वाले एक देश के रूप में स्वयं को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत कर पा रहा है क्योंकि राजनैतिक दलों द्वारा बुलाया गया बंद हमारे राष्ट्र की एक भयावह तस्वीर ही दुनिया के सामने प्रस्तुत कर पा रहा हैं जो कभी "विश्व गुरु" रहे भारत के लिए काफी शर्मनाक है| यही नहीं इनके जनता के बुलाये जा रहे अचानक भारत बंद से आम जनमानस किन तकलीफों से स्वयं को दो-चार कराता है इसका भी इन्हे ज्ञान नहीं, ऐसा बंद भी किस काम का जो पूरे राष्ट्र की गति को ही रोकने की एक नाकाम कोशिश भर हो इसके अलावा कुछ नहीं| क्या यही है भारतीय गणराज्य के संविंधान द्वारा जनता को, जनता के लिए, जनता के द्वारा समर्पित किये गए अधिकार, क्या ये राष्ट्र और इसके राजनेता इन तथ्यों को क्यूँ नहीं सोचते की सभी एक साथ मिलकर ऐसी सामान विचारधारा बनाये जिसमे धर्म, मजहब, जाति, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब सबके फैसले ख़त्म हो जाएँ और एक नए भारत का नवनिर्माण हो|

                           क्यूँ और कब तक भारत और भारतीय जनमानस को मुठ्ठी भर राजनेताओं का एक कुनबा अपने इशारों पर नाचता रहेगा| अहिंसक रहने की सलाह देने वाले नेता आखिर क्यूँ देश की गति को रोककर अपनी बात मनवाने में विश्वास रखते हैं, ऐसे तो नहीं है की इनके लिए भारत बन्द एक ऐसा जुमला बन गया है जिसके जरिये ये अपने राजनितिक दलों का प्रचार करते हैं क्योंकि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भारत बन्द की कवरेज बड़े पैमाने पर टेलीकास्ट करता है और लोकतंत्र के चक्रव्यूह में पिसते आम जन तक इनकी बात आसानी से पहुँच जाती है जो वोट के अधिकार को गुमराह करने का काम करती हैं|

भारत बंद से दफ्तर बन्द, स्कूल बन्द, काम-काज बन्द, रेलवे बन्द, दुकान बन्द, अस्पताल बन्द, इलाज बंद, व्यापर बंद, सबकुछ बन्द - ये कैसा बन्द? जिसमे नारा तो होता है जनता की भलाई लेकिन पिसती जनता ही है और न जाने कितने मासूमों की बलि लेने के बाद भलाई की ये दुकान बन्द होती है और भारत चालू होता है|

क्या मानवाधिकार की बात करते-करते हम मानवता से ही दूर नहीं हो गए?



वर्तमान भारतीय परिवेश में जब भी हमारे कानों में भीड़ द्वारा हत्या किये जाने की ध्वनि का संचार होता है उसी वक़्त हमारे जेहन में ये बातें तीव्र गति से चलायमान हो जाती हैं कि क्या मानवाधिकार को सुरक्षित रखने कि दुहाई देने वाला ये जनमानस मानवता से ही तो दूर नहीं हो गया| आखिर क्यूँ सिर्फ कही सुनी बातों में आकर हम एक इंसान कि हत्या का जघन्य अपराध करने पर आमदा हो जाते हैं, क्या ये लोकतंत्र है और हम आजाद है? क्या यही इन जैसे शब्दों को परिभाषित करता है?

अतीत और वर्तमान दोनों गवाह है कि जब भी कहीं मानवता शर्मसार हुई है दुनिया भर के मानवतावादी हितसंरक्षकों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है और भरसक कोशिश भी की है की पीड़ितों को न्याय और इन्साफ मिले और इन्ही हितवादियों को सारता प्रदान करती सोच को हम अपने जीवन के प्रत्येक पहलू में स्वयं के लिए भुनाने की कोशिश करते हैं और जब बात दूसरों की आती है तो हम स्वयं क्यूँ तैयार हो जाते हैं उस भीड़ का हिस्सा बनने के लिए जो दूसरों के मानवाधिकारों को रौंदने पर आमदा होती है, अभी हाल ही में बच्चा चोर समझ कर की गयी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या हो या पशु चोर समझ कर की गयी दूसरी हत्यायें- इन सभी हत्याओं को भीड़ ने ही अंजाम दिया है|

इस देश में क़ानून व्यवस्था के रहते हुए भी आखिर भीड़ ने क्यूँ ऑन द स्पॉट फैसला सुनाते हुए इनकी जान ले ली, क्या इन्हे ये मौलिक अधिकार भी नहीं था कि वो अपनी बात रख सकते, आखिर क्यूँ हम इतना भटक गए हैं? क्या डिजिटल क्रांति को हथियार बनाकर भीड़ तंत्र द्वारा ऐसे ही मानवता कि धज्जियाँ उड़ाई जाती रहेंगी|

क्योंकि अगर इस देश में इसके खिलाफ कोई कानून बन जाये तो भी उसे अमलीकृत करने में कानून प्रतिनिधियों के साथ-साथ हम सब की भी उतनी ही जवाबदेही है जितनी सरकार की, लिहाजा अगर हम मानवाधिकारों को स्वयं के लिए मांगते हैं तो हमें दूसरों के अधिकारों का भी ख्याल रखना होगा और ईश्वर द्वारा प्रदत्त मानवता यानि इंसानियत के उपहार का भी निजी जीवन में पालन करना होगा तभी हमारा समाज, हमारा देश, हमारा विश्व समग्र और समृद्ध बन पाएंगे|