Hindi Writing Blog: Work Pressure
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मंगलवार, 2 मई 2023

ये करके क्या मिलेगा?

 

Truth of Life


ये करके क्या मिलेगा? यूं तो ये सुनने, पढ़ने और बोलने में बिल्कुल सीधा सा वाक्य है, जिसे अक्सर हमारे द्वारा या हमारे इर्द-गिर्द लोगों द्वारा प्रायः बोला या सुना जाता है, लेकिन क्या कभी हम सब ने इस छोटे परंतु गहराई से भरे वाक्य का अर्थ समझने की कोशिश की है? नहीं ना! क्योंकि ये है ही इतना साधारण। परंतु असाधारण बात तो तब होती है जब इसमें छुपी नकारात्मकता हमारे सामने असफलता का प्रारूप लिए आ खड़ी होती है।

हम जब बाल्यावस्था में होते हैं तो हमारे माता-पिता जब हमसे कहने को कहते हैं तब हम हमेशा यही कहते हैं – “आप ये करने को मुझसे कह तो रहे हैं, पर मुझे ये करके क्या मिलेगा?” ऐसा कहते वक्त तो कभी-कभी तो हम कुछ सोचते भी नहीं, बस कह जाते हैं क्योंकि हम उसे करना नहीं चाहते या फिर उसे करने में हमें हमारा कोई फायदा दिखलाई नहीं देता। शायद, यही कारण है कि कार्य को करने के बाद मिलने वाले सकारात्मक परिणाम को सोचे बिना ही हम पहले से ही हार मान लेते हैं कि अगर मैंने ये कर भी लिया तो मुझे क्या हासिल होगा?

दोस्तों, आज कि उपर्युक्त विषय पर चर्चा मेरे लेखन के अल्पविराम के बाद आप तक पहुँच रही है। कुछ दिनों पूर्व आप मित्रों की मेरे ब्लॉग में अनुपस्थिति और सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त न हो पाने के घटनाक्रम ने मेरे भी मन मस्तिष्क में इस भावना को आकार दे दिया कि “अरे छोड़ो! ये करके क्या मिलेगा?” लिहाजा मैंने छोड़ दिया। लेकिन तत्कालीन वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर आज के इस विषय को चुनना और आपके साथ इससे जुड़े विचारों को साझा करने के पीछे शायद मेरा अभिप्राय अपने अनुभव से आप तक उन बातों को पहुंचाना है जो इस छोटे से वाक्य के पीछे है और सच्चाई जितना ही कड़वा है क्योंकि जिस प्रकार सच सुनने/बोलने की क्षमता हर किसी में नहीं होती उसी प्रकार कुछ कर गुजरने का माद्दा भी ईश्वर सिर्फ इंसानों को ही देता है। ऐसे में लक्ष्य स्पष्ट हो तो पीछे हटना कायरता के सिवा कुछ भी नहीं। कुछ करके हमें क्या मिलेगा, वो तो कार्य की परिणति के बाद का परिणाम तय करता है। परंतु, बिना किए ही उससे हार मान लेना अपनी कमजोरियों को छिपाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम के बीच बस फासला चंद शब्दों का नहीं है बल्कि एक पूरी शृंखला ही इससे जुड़ी है। कार्य को करना, उसे सफलता की ओर लेकर जाना, ये कर्म करने की एक ऐसी कसौटी है जिसकी चेतना सृष्टि में मौजूद सभी जीवंत रचनाओं को प्राप्त है।

जब एक चिड़िया तिनका-तिनका जोड़कर अपना घोसला बनाती है तो ये नहीं सोचती कि ये करके क्या मिलेगा? जब तलहटी में लगे पानी को ऊपर लाने के लिए कौआ किसी पात्र (बर्तन) में कंकड़ के अनगिनत टुकड़े डालता है तो वो ये नहीं सोचता की उसे ये करके क्या मिलेगा, उसके सामने तो बस एक ही लक्ष्य होता है कि पानी बाहर आए और उसे पी कर वो अपनी प्यास बुझाए।

दोस्तों, कर्म और कर्महीनता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम कर्म को स्वीकार करते हैं तो ये संसार हमें कर्मठ कहकर हमारी प्रशंसा करता है और अगर हम कर्महीनता को स्वीकारते हैं तो आलसी कहकर हमें धिक्कारा जाता है। चुनाव हम पर ही है, क्योंकि सृष्टि ने हमें विवेकशीलता का एक मूर्धन्य आवरण का चोला हमारे मस्तिष्क पर डालकर हम इन्सानों को ही इस संसार को चलायमान रखने का भार सौंपा है। ऐसे में घर के छोटे कामों से लेकर जिंदगी के बड़े फैसलों के लेने तक अगर ये वाक्य कि “ये करके क्या मिलेगा?” जिंदगी में शामिल हुआ तो समझ लीजिये इसने हमारी चेतना और हमारे वजूद को चुनौती दे डाली है क्योंकि ये वही सोच है जो हमारे कर्म का रास्ता रोकने को तैयार बैठी है।

इसीलिए, गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कर्म को परिभाषित करते हुए कहा –

        कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

           मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्तवकर्मणि॥2.47॥

 

गीता के संदेश को जब-जब हम अपने मस्तिष्क से जोड़ेंगे तब-तब हम ये पाएंगे

“करके ही सब मिलेगा वरना कुछ न मिलेगा”  

दोस्तों, आपसे अपने विचार साझा करके मुझे हार्दिक प्रसन्नता होती है। आपकी सकारात्मक टिप्पणी मेरी प्रेरर्णा है, इन्हें बनाए रखिए। आज के अंक में बस इतना है। अगले अंक में फिर मिलेंगे तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत!!!



रविवार, 27 जनवरी 2019

क्यूँ बोझ बन गयी है नौकरी पेशा जिंदगी ...?





अभी हाल ही में #MeToo Campaign के चलते एक प्रतिष्ठित प्राइवेट कंपनी के एक नौकरी पेशा शख्स की आत्महत्या और तदोपरांत(subsequently) अपनी पत्नी को लिखे सुसाइड नोट में स्वीकारी गयी ये बात कि "अगर मैं निर्दोष भी साबित हुआ तो भी ऑफिस मे मुझे संदेह के दृष्टि से देखा जाएगा और मेरा जीना दूभर हो जाएगा" कही गयी ये उक्ति क्या इस बात की ओर इशारा नही करती कि आज के इस प्रतिस्पर्त्धात्मक (Competitive)  युग में काम  काजी दफ्तरों में जिस तरह का माहौल होना चाहिए क्या वो नौकरी पेशा लोगों को मिल पा रहा है? तो उत्तर हमें अपने इर्द-गिर्द नज़र घुमाने पर ही मिल जाएगा, क्योंकि जैसा माहौल हम आज संस्थानों मे काम करने वाले नौकरीशुदा लोगों की जिंदगी में देख रहे हैं उसे देखकर तो यही लग रहा है कि आज इस क्षेत्र को सकारात्मक(Positivity) परिवर्तन  की सख्त जरूरत है ताकि नौकरी पेशा लोग तनाव रहित होकर अपने कार्यों द्वारा संस्थान की छवि को और आगे ले जाएँ|
 क्यूंकी आज जब भी हम समाज मे नौकरी करने वालों की जिंदगी में झाकते हैं तो यही पाते हैं कि उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक जीवन-परिवर्तनीय नौकरी का स्वप्न लिए संस्थानों में दाखिल हुआ युवा जब जिंदगी की सच्चाई से रुबरु होता है तो वास्तविकता कुछ और ही होती है, ये वास्तविकता उन्हे आर्थिक रूप से सबल तो जरूर बनाती है परंतु बहुत कुछ खोने पर मजबूर कर देती है| कई दफ्तरों मे तो समय को लेकर अनुशासन के लिए जानी जाने वाली नौकरी में अब समय सीमा का ही उलंघन होने लगा है| काम के नाम पर आठ घंटे का दायरा बढ़ाकर लगभग दस से बारह घंटे कर दिया गया है जिसके चलते नौकरी पेशा लोग न परिवार मे अपनी उपस्थिति दर्ज करा पा रहे हैं और न ही समाज में, उनकी इस व्यथा का जो परिणाम निकलकर सामने आ रहा है वो न उन्हे स्वस्थ बना रहा है और न ही उनसे जुड़े तमाम रिश्तों को और न ही इन्ही रिश्तो पर टिके समाज को|
मैं ये नहीं कहती कि चहुँ ओर नकारात्मकता(Negativity) ही पसरी है परन्तु फिर भी अगर सकारात्मकता(Positivity) की बात करें तो नकारात्मकता उसपर ज्यादा भारी पड़ती दिख रही है| जिस नौकरी की चाह में वर्षों हम लम्बी शिक्षा ग्रहण करते हैं सैकड़ों इंटरव्यू से होकर गुजरते हैं वही नौकरी हमें चंद वर्षों में ही बोझिल क्यूँ लगने लगती है? तो वजह साफ है सिस्टम मे आई उदासीनता क्यूंकी आज के इस माहौल में सिस्टम इस ओर ध्यान ही नही देता और अगर देता भी है तो सैलरी में चंद रुपयों की बढ़ोतरी तक जाके ये सीमित हो जाता है|
हमारे समाज में बैठे उच्च प्रशासन को क्यूँ ये चीजें नहीं समझ आती कि जिन नौकरी पेशा लोगों पर हम देश की उन्नति का धागा बुन रहे हैं उनकी मनः स्थिति का भी खुशहाल होना जरूरी है क्योंकि एक स्वस्थ मन ही एक स्वस्थ परिवेश का निर्माण कर सकता है| हमारे देश की अमूल्य धरोहर नौकरी पेशा लोग मानसिक द्वंद के चलते असमायिक होने वाली शारीरिक बीमारियों से घिर जाएँगे तो वो कैसे हमारे राष्ट्र के विकास में अपनी उपयोगी सहभागिता दर्ज करा पाएंगे|
इस लेख के माध्यम से मेरा सम्माननीयों(honourable) से सिर्फ और सिर्फ इतना निवेदन है कि अगर हमारे राष्ट्र के उन्नति के इस महत्वपूर्ण पहलू पर एक बार वो उदारता के दृष्टिकोण(Attitude)  से नज़र डालें तो जरूर इस दिशा में परिवर्तन की राह आगे का मार्ग प्रशस्त करने में सफल हो पाएगी|
क्यूंकी अपने उच्च्स्थ को कुछ न बताने की विडम्बना में घुलता ये वर्ग हमारे राष्ट्र की पूंजी है और इनकी खुशहाली हमारी धरोहर....