Hindi Writing Blog

रविवार, 30 अगस्त 2020

परमाणु बम की सोच पर बैठी इस दुनिया का क्या होगा?





दोस्तों, जैसा कि हम सब जानते हैं आज हमारी खूबसूरत धरती और इस पर रह रही मानव सभ्यता एक ऐसे खतरनाक दौर से गुजर रही है जहाँ मानव ज़िंदगियों को बचाने के लिए दुनियाभर के warriors कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं, फिर चाहे वो उनकी खुद की जान ही क्यों न हो? लेकिन दूसरी ओर तीव्र गति से लगभग दुनिया के हर देश में पैर पसार चुकी इस महामारी के लिए शुरुआत से लेकर अब तक जो प्रयास दुनिया की ओर से किए जा रहे हैं क्या वो इस समग्र पृथ्वी की उस एकजुटता को दिखा पाने में सक्षम हैं जिसकी इस कठिन समय में जरूरत है? ये एक सवालिया प्रश्न हैं जिसका जवाब दुनियाभर के देशों के बीच इस महामारी के खिलाफ एक होकर लड़ने के आह्वान की गैरमौजूदगी के बीच हमें बार-बार दिखाई पड़ रहा है, फिर चाहे वो दुनिया का नेतृत्व करने वाले बड़े देश America, Russia, Britain या Germany हों या फिर दुनिया की तबाही का हर पल सपना संजोते चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान जैसे देश जिन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी आवाम को जरूरत किस चीज की है, रोटी, स्वास्थ्य, कपड़ा और मकान की या फिर Atom Bomb (परमाणु बम)। उनकी सोच के पीछे सिर्फ और सिर्फ छुपी है एक विध्वंसात्मक सोच, तभी तो आए दिन एक ओर अगर पड़ोसी देश परमाणु हमला करने की धमकी देता रहता है, तो दूसरी ओर 24 May 2020 को आई उत्तर कोरयाई खबर भी इस बात का संकेत देती है कि COVID-19 की इस भयावह तबाही के बीच भी ये देश अपनी परमाणु मारक क्षमता बढ़ाना चाहता है और इसी के चलते दुनिया पर आए दिन इस अनचाहे हमले का खतरा मंडराता ही रहता है, ऐसे देशों की श्रेणी में कमोवेश अब चीन का भी यही हाल है बावजूद इसके इसी August माह की 6 तारीख को ठीक 75 साल पहले सन् 1945 में जापान ने हिरोशिमा में अपने 1,40,000 लोगों और 9 अगस्त को नागासाकी में लगभग 74,000 लोगों की मौत का नजारा क्रमश: Little boy” (लिटिल बॉय) और “Fat Man”(फैट मैन) नामक परमाणु बम के गिराए जाने से देखा है फिर भी लगता है उस महाविनाश से भी दुनिया ने न तब कुछ सीखा था और ना आगे कुछ सीखने के mood में है। कम से कम आज के हालात को देखकर तो बस यही लगता है, सृजन से ज्यादा तबाही ही इस दुनिया के लिए ज्यादा मायने रखती है और इस अग्नि में घी डालती चीन की नीतियाँ आने वाले समय में दुनिया को किस ओर ले जाएंगी ये तो वक्त बताएगा लेकिन विस्फोटक तबाही क्या होती है इसका बहुत छोटा सा उदाहरण है लेबनान की राजधानी बेरुथ में हुआ विस्फोट जिसमें मंशा तो नहीं थी, थी तो केवल आकस्मिकता, फिर सोचिए जिसमें मंशा होगी उसका अंजाम क्या होगा?

दोस्तों, आज दुनिया के 9 देशों के पास लगभग 13,865 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं (रूस: 6,500, अमेरिका: 6,185, फ्रांस: 300, चीन: 290, ब्रिटेन: 200, भारत: 130-140, पाकिस्तान: 150-160, इज़राइल: 80-90) हैं और उनमें से बस कुछ ही इस जीवनदायी ग्रह पृथ्वी को समाप्त करने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए ये बेहद जरूरी है कि दुनिया अपनी सोच बदले और हाल-फिलहाल मानव जीवन के लिए चुनौती बन चुके इस COVID-19 नाम की आँधी को WHO के साथ एकता के सूत्र बंधकर रोकने की तैयारी करें क्योंकि इस धरती का वजूद तब तक है जब तक यहाँ जीवन है और ये जीवन कितना बेशकीमती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी-कभी इस जीवन को बचाने के लिए nature को भी खुद आगे आना पड़ता है क्योंकि उसे पता है happiness सृजन में है विध्वंस में नहीं... 

Nature के इन्हीं सकारात्मक कदमों पर विश्वास की सोच को आधार देती, अपनी आशाओं के लिए बस इतना ही...

            जय हिन्द, जय भारत...

 

शनिवार, 15 अगस्त 2020

Independance Day - स्वतन्त्रता दिवस

Independance Day
 








मूर्छित पड़ी दिशाओं में

कुछ राग भक्ति भर लो

देशभक्ति की विह्वल धारा

सहज बना दें राहें अपनी

ऐसी सोच कर लो

निज हित से तुम आगे बढ़ कुछ

सर्व हित तो कर लो

मूर्छित पड़ी दिशाओं में......

खुला गगन हो

खुली हवा हो

ऐसी श्वांस भर लो  

लाचारी से हो न नाता

ऐसी जीत कर लो

मूर्छित पड़ी दिशाओं में......

रहे अखंड अक्षुण्ण आजादी

कर्म ऐसे कर लो

वक्त सबल हैं राहें भारी

निश्चय दृढ़ तुम कर लो

मूर्छित पड़ी दिशाओं में

कुछ राग भक्ति भर लो, कुछ राग भक्ति भर लो........

                          स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 

देश की आजादी सदैव अक्षुण्ण रहे और हमारा राष्ट्र प्रगति पग पर अग्रसर...इसी कामना के साथ आप सभी को भारत के 74वें स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

                                    



गुरुवार, 30 जुलाई 2020

प्रभु राम आगमन की प्रतीक्षा पूरी: सज रही अयोध्या




अटकलों पर लगा विराम, पूर्ण हुई प्रतीक्षा और एक बार फिर लौट रहे भगवान राम सरयू तट किनारे बसी अयोध्या नगरी, जी हाँ दोस्तों, मन हर्षित है क्योंकि वर्षों से जिस फैसले का इंतजार सम्पूर्ण भारत राष्ट्र कर रहा था वो घड़ी अब अपने निर्णायक दौर में पहुँच गयी है और अंततः 5 अगस्त सन् 2020 के ऐतिहासिक दिन अयोध्या नगरी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के भव्य मंदिर निर्माण की नींव रखने की तैयारियां हफ्तों पहले से ही शुरू हो गयी है तो वहीं दूसरी ओर सरयू तट पर दीपों की पंक्तिबद्ध लहरियाँ प्रभु आगमन का इंतजार कर रही हैं तो कहीं मार्गों पर सजती रंगलहरें हर दिशा से ये संदेश पहुंचा रही हैं कि प्रतीक्षा पूरी हुई, अब प्रभु श्री राम अयोध्या स्थित अपने जन्म भवन लौट रहे हैं। बड़ा ही मनोरम दृश्य होने वाला है, ऐसा इसलिए क्योंकि वर्षों से अपने जन्म भवन की प्रतीक्षा में प्रभु राम कपड़ों से बने टेंट की छत्र-छाया में बैठकर खुद को मिले एक और वनवास का पालन ही तो कर रहे थे जो बदलते समय चक्र के साथ बढ़ता चला जा रहा था। इससे पहले का वनवास उन्होने अपने धरती निवास के दौरान माता कैकेयी को पिता दशरथ द्वारा दिये गए वचन को पूरा करने के लिए किया था और जिसके परिणामस्वरूप लंका पति रावण को युद्ध में परास्त कर पुनः अयोध्या वापसी सुनिश्चित हो पाई थी और दूसरा ये जब लगभग 5 सदी का सफर तय कर प्रभु राम को भव्य भवन में स्थापित किया जाएगा।

दोस्तों, भगवान राम के आचरण की कर्मठता और सहनशीलता हर युग में हमें प्रेरणा देती आई है, इसके कर्म प्रवाह में बहकर हम सभी ने अपने जीवन के कर्मयुद्ध की नैया पार लगाई है। दोस्तों, त्रेता युग में भगवान विष्णु के 7वें अवतार के रूप में रघुकुल वंश में जन्में भगवान राम की भक्तिमय अविरल धारा आज श्रद्धा के उस दौर तक पहुँच चुकी है जहां उनकी भक्ति से आबद्ध राम भक्तों को वो दिव्य स्थल प्राप्त होगा जहां वो प्रभु के चरणों में शीश झुका आने वाले कल का शुभाशीष पा सकेंगे और उधर दूसरी ओर सर्व धर्म सद्भाव के रंग में रंगी अयोध्या नगरी अखिल विश्व को भाई-चारे का अद्भुत संदेश देती बस 5 अगस्त की शुभ बेला प्रतीक्षा में प्रतीक्षारत है...

        जय श्री राम...


मंगलवार, 28 जुलाई 2020

COVID-19 के लिए हमारी AWARENESS क्यों जरूरी है?





दोस्तों, वर्तमान परिस्थिति में आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रह रही समग्र मानव सभ्यता COVID-19 नाम की विश्वव्यापी महामारी के भयानक दौर से गुजर रही है और अब इस कड़ी में हमारे राष्ट्र भारत का नाम भी काफी प्रमुखता से जुड़ता जा रहा है (आकड़ों के परिप्रेक्ष्य से), जो कहीं से भी उपयुक्त नहीं है। ऐसे में अब हम देशवासियों के कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी के निर्वहन का भार आन पड़ा है, ताकि हम ना केवल अपने देश को इस भयानक आपदा से मुक्ति दिला सकें बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति को इस संकट से उबार सकें।

     ये प्रयास बड़ा जरूरी है लेकिन इसे शुरू करना खुद हमें अपने आप से है, और इसके लिए  करना क्या है------

·       COVID-19 से खुद का भी बचाव करें और दूसरों को भी जागरूक करें ताकि एक ऐसी शृंखला बनें जो इस virus की chain को break कर दे।

·       - खुद भी मास्क लगाएँ और दूसरों को भी प्रेरित करें। 

·      -  सोशल distancing के नियमों का पालन करें और दूसरों को भी इसके लिए जागरूक करें।

·       -   अगर आवश्यक न हो तो घर से बाहर न निकलें stay home stay safe

-  दोस्तों हम सब की पहल देश की सरकार को इस भयावह संकट से लड़ने की शक्ति प्रदान करेगी।

    तो आइये राष्ट्र प्रेम को अपना फर्ज बनायें और जन-जन में COVID-19 से लड़ने की जागरूकता का अभियान चलाएं।  


सोमवार, 13 जुलाई 2020

आत्महत्या ही क्यों?


Positivity


जीना अपने ही में एक महान कर्म है!

जीने का हो सदुपयोग या मनुज धर्म है!

अपने ही में रहना प्रबुद्ध कला है!

जग के हित रहने में सबका सहज भला है!

जग का प्यार मिले जन्मों के पुण्य चाहिए!

जग जीवन को प्रेम सिंधु में डूब थाहिए!

ज्ञानी बनकर मत नीरस उपदेश दीजिये!

लोक कर्म भाव सत्य प्रथम सत्कर्म कीजिये!”

 

दोस्तों, महान छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत जी की ये पंक्तियाँ हमारे कानों को अपनी स्वर मधुरिमा से गुंजायमान करती हैं तो हमारे इस जीवन को पाने और उसे जी लेने दोनों के मायने बड़ी ही सरल भाषा में हमें समझा जाती हैं। फिर, आखिर ऐसा क्यों होता है जो हम इस जीवन से मिली हर एक सीख (नसीहत) को पल भर में भूल इस दुनिया से अपने अस्तित्व को मिटा देने पर आमादा हो जाते हैं, माना कि 2020 के जिस दौर को हम जी रहे हैं उसमें धरती पर फैली COVID-19 की इस बीमारी ने दुनिया के अनगिनत लोगों की जीवन शैली में एक बड़ा फेरबदल दर्ज करा दिया है। कहीं किसी ने अपनों को खोया है तो कहीं किसी ने जीवन को सहारा देती आजीविका के साधन(रोजगार और नौकरी) को लेकिन जीवन में घटते इन घटनाक्रमों का ये मतलब तो कत्तई नहीं है कि जैसी जिंदगी हमारी आज है वैसी हमेशा से थी या आगे हमेशा ऐसी बनी रहेगी।

दोस्तों, Lockdown और खुद को COVID-19 से सुरक्षित रखने की इस मुहीम ने जहां एक ओर हमें घरों में रहने को मजबूर कर दिया है वहीं दूसरी ओर हमारे सोचने और समझने की क्षमता पर भी भरपूर असर डाला है, नतीजन डांवाडोल होती इस समकालिक मानसिक स्थिति में हम में से कितनों को आत्महत्या जैसे रास्ते बड़े सहज नज़र आ रहे हैं, चाहे फिर वो Bollywood फिल्म छिछोरे में suicide का विरोध करते एक पिता की भावना का सशक्त किरदार निभाने वाले सुशांत सिंह राजपूत का मामला हो या फिर 16 वर्षीय TikTok स्टार सिया कक्कड़ और संध्या चौहान का, इस कड़ी में शामिल हुए और नामों में कन्नड़ अभिनेता सुशील गौड़ा और सुशांत सिंह राजपूत और वरुण शर्मा की Manager रही दिशा शालियान भी हैं। दोस्तों, इन सभी ने जीवन जीने के इस महान कर्म को बीच धारा में छोड़ खुद को ही इससे अलग कर लिया। ये तो वो चंद नाम हैं जिन्हें हमारा समाज लोकप्रियता के चलते जान पाया और अगर गुमनाम नामों का जिक्र करें तो ये आकड़ें हमें ये सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर क्यों लोग आत्महत्या के रास्ते को इतनी आसानी से सहज मान बैठते हैं और छोड़ जाते हैं अपने पीछे सवालों की वो भंवर जिसमें उत्तर की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।

आखिर क्यों हम इस जीवन के लिए मिले मूल मकसद को भूल भौतिक संसाधनों की पकड़ और समाज में रुतबा कायम करने की होड़ में अपना सर्वस्व गंवा देते हैं जिसके चलते पूरे विश्व में हर साल 8,00,000 से 10,00,000 लोग हर वर्ष आत्महत्या कर जीवन खत्म कर देते हैं। ये वो अनुत्तरित प्रश्न है जिसका जवाब पाने की इच्छा हम में से कितनों को हर पल व्यग्र (बेचैन) करती रहती है और जब हम इनके उत्तर सकारात्मक ऊर्जाओं (Positive Energy) के वशीभूत होकर ढूंढ़ते हैं तो ही जान सकते हैं कि वास्तविकता चाहे जितनी कड़वी हो उससे हमें लड़कर जीतना चाहिए न कि उसे मिठास में बदलने की चाह में हम आत्महत्या जैसे निरर्थक कदम उठा लें, जिसमें हम हत्या तो मात्र अपने शरीर की कर पाते हैं लेकिन आत्मा वो तो इससे निकलकर न जाने कब तक हमारे द्वारा खुद ही इस सुंदर जीवन को नष्ट करने का उत्तर मांगती रहती है।

दोस्तों, समय, काल, परिस्थिति चाहे जैसी हो उम्मीद का दामन तब तक नहीं छोड़ना चाहिए जब तक हमारे अंदर इनसे लड़ने का हौसला न खत्म हो जाये आ हौसला वो तो तभी खत्म होगा जब हम अपने मन को ही हारने पर विवश कर दें और ऐसा हमें कभी होने नहीं देना है।

दोस्तों, बड़ा ही दुखद होता है जब हम किसी जीवन को इस तरह असमय खोते देखते हैं और उसके जाने के बाद शुरू होता है हमारा चिंतन क्यों, कब और कैसे का, फिर चाहे क्यों न अभी चंद मिनट पहले हम खुद ही उसी भंवर में उलझे रहे हों। दोस्तों, हमारे मन की सोच और विचार दुनिया की वो 2 प्रबल चीजें हैं जिन्होने ये पूरी दुनिया बना दी है। इसलिए हम चाहे जितनी भी मुश्किल में क्यों ना हों हमें इस धरती के अतीत और वर्तमान दोनों को सकारात्मकता के चश्में से ही देखना चाहिए और अपने अंदर की ऊर्जा को महसूस करते हुए जिंदगी को हरिवंश राय बच्चन जी की इन पंक्तियों जैसा कुछ इस तरह जीना चाहिए –

 

“कभी फूलों की तरह मत जीना

जिस दिन खिलोगे बिखर जाओगे

जीना है तो पत्थर बनकर जियो

किसी दिन तराशे गए तो खुदा बन जाओगे”


रविवार, 28 जून 2020

सोशल मीडिया अक्सर सवालों के घेरे में क्यों खड़ा होता है?


Questions around Social Media

दोस्तों, आज जिस तरह के हालात से होकर हमारी धरती गुजर रही है वह हम सब के लिए चिंता का विषय है। एक तरफ हम वैश्विक महामारी COVID-19 का सामना कर रहे हैं तो दूसरी ओर पूरी दुनियाँ में तेजी से बढ़ती सामरिक गतिविधियां भी हमारे माथे पर चिंता की लकीरें खींचें जा रही हैं। आज हर कोई COVID-19 की वैश्विक आपदा से निपटने के चक्कर में अपनी बड़ी सीमाओं का दायरा दिन पर दिन छोटा करता जा रहा है ताकि वो स्वयं को और अपने परिवार को इस virus की चपेट में आने से बचा सके और जिसका नतीजा ये निकला है कि हमने दूसरे और लोगों से दूरी बनाए रखने के formula को तात्कालिक हालात में जीवन जीने का मंत्र बना लिया है, बावजूद इसके कि हमारी फितरत हमें एक सामाजिक प्राणी बनाए रखने के लिए हमेशा उत्तेजित करती रहती है। शायद, यही कारण है कि 21वीं सदी से उपहार स्वरूप मिले technology के संसाधनों Internet, Computer और Laptop के जरिये ही हमने सारी दुनियाँ से खुद को connect कर लिया है और जब हम connect हो ही गए हैं तो लगे हाथ सोशल मीडिया (Facebook, Twitter, Instagram, WhatsApp) पर क्या चल रहा है वो भी देख लेते हैं। लेकिन हम ये नहीं सोचते कि print और electronic मीडिया के समानान्तर चल रही इस दुनियाँ में एक खेल followers पाने और likes बटोरने का भी है, जिससे मिली सस्ती लोकप्रियता के चलते किसी भी घटना को बिना किसी प्रामाणिकता की कसौटी पर परखे हम आगे बढ़ा देते हैं, लेकिन हमारी ये चूक दिन पर दिन हमारे इस समाज में जहर घोलने का काम कर रही है। अभी हाल ही में जब सुशांत सिंह राजपूत ने बांद्रा स्थित flat पर खुदखुसी की तो बिना घटना की असलियत जाने ही nepotism और favourtism के आरोपों और प्रत्यारोपों की झड़ी लग गयी, जिसका शिकार बनी सलमान खान, करण जौहर, आलिया भट्ट जैसी बड़ी हस्तियाँ जिन पर इल्जाम लगाए गए तो दूसरी ओर इन सब से हाय तौबा करके मिताली ठाकुर, सोनाक्षी सिन्हा, नेहा कक्कड़ जैसे स्टार ने सोशल मीडिया से दूरी बना ली।

दोस्तों, ये सोशल मीडिया आज के इस modern age में एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है जो किसी भी गली-मोहल्ले में घटी घटना को तुरंत नेशनल लेवल तक पहुंचा देता है इसीलिए सिर्फ सुर्खियां बटोरने का जज्बा ही है जो इसे अक्सर सवालों के घेरे में खड़ा करता है। चाहे फिर ये अमेरिका में Donald Trump और Twitter Owner की झड़प हो या फिर सोशल मीडिया के जरिये आए दिन चीन और पाकिस्तान जैसे देशों का कोई नया एजेंडा, जो बढ़ते-बढ़ते उस दौर में पहुँच चुका है जहां लगभग तृतीय विश्व युद्ध (Third World War) के आसार भी बनते नजर आ रहे हैं।

मेरे इस लेख के लिखे जाने तक गलवान घाटी में चीन और भारत के हिंसक झड़प के बाद बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका ने यूरोप से अपनी सेनाएँ मंगानी शुरू की है। चूंकि, मेरा मत सदैव युद्ध विरोधी रहा है, इसलिए मैं ये आशा करती हूँ कि एक बार फिर मानवता जीते और धरती को विनाश की ओर ले जाने वाली सोच का अंत हो। दोस्तों, अभी आपने हाल ही में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया के चलते बढ़ती Rivalary को ज्यादे करीब से महसूस किया होगा; पहले दिल्ली दंगा फिर अमेरिका में George Floyd के चलते पूरे देश का हिंसा में झोके जाना और बॉलीवुड का बिखराव। तभी तो खुद रतन टाटा ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑनलाइन समुदाय एक दूसरे के लिए हानिकारक हो रहे हैं, ये चुनौतियों से भरा साल है, हमें एक होकर ही इनसे लड़ना होगा और शायद ये ही सच भी है क्योंकि सोशल मीडिया की सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये हर वर्ग, हर धर्म, हर समुदाय के लोगों को जिस प्रकार आपस में जोड़ती है उससे हमें एक दूसरे के ज्ञान और कुशलता का लाभ उठाना चाहिए ना कि आधुनिक युग से मिली इस सौगात को मौत के अंधे कुएं में ढकेलना क्योंकि

 

“हौसले जब मिलेंगे साथ,

जमाने में झलक होगी,

न तेरी हो न मेरी हो,

बस खुशियों की परख होगी”

                 स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

बुधवार, 17 जून 2020

श्रद्धांजलि...




गलवान नदी घाटी में, भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प में भारत के भाल पर गर्वानुभूति का एक और तिलक लगा, भारत माँ के चरणों में शीश समर्पित करने वाले वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि...

शनिवार, 16 मई 2020

COVID-19 के बाद हमारे सपनों का भारत कैसा हो?


दोस्तों, जैसा कि हम सब ये देख रहे हैं कि Corona नाम के एक छोटे से विषाणु (Virus) ने अचानक देखते-देखते किस प्रकार Globalization के माध्यम से जुड़ी पूरी दुनियाँ को एक ही झटके में अपने-अपने देशों के सीमाओं तक न केवल सीमित कर दिया है बल्कि उससे ऊपर उठकर अपने देशहित से जुड़े फैसलों को लेने के लिए मजबूर भी कर दिया है ताकि वो अपने-अपने देश के नागरिकों के जीवन को COVID-19 के विनाश लीला के सामने घुटने टेकने से रोक सकें बावजूद इसके इस विषाणु की भयावता इतने बड़े स्तर की है कि दुनियाँ के superpower कहलाए जाने वाले अमेरिका सहित मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) की सूची में ऊंचे पायदानों पर काबिज इटली, फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे देश भी हथियार डाल चुके हैं और यही नहीं अनगिनत ज़िंदगियों ने अपनी जानें भी गंवा दी है| ये विभीषिका मानव इतिहास में छेड़े जा चुके प्रथम विश्व युद्ध (First World War) सन् 1914-1918 और द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) सन् 1939-194) की तुलना में काफी डरावनी नजर आ रही है क्योंकि मेरे इस लेख के लिखे जाने तक अभी भी भारत सहित पूरी दुनियाँ इससे लड़ने का कोई अचूक तरीका नहीं ढूंढ पायी है, लेकिन वो कहते हैं न उम्मीद पर दुनियाँ कायम है| आज नहीं तो कल मानव जाति इस विषाणु पर विजय तो प्राप्त कर ही लेगी फिर उसके बाद क्या होगा? कैसा होगा ये विश्व? कहाँ होगा हमारे राष्ट्र का वैश्विक स्थान? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जो पूरी दुनियाँ के बुद्धिजीवियों को अभी से सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह से तात्कालिक घटनाक्रम से जुड़े समीकरण हर रोज एक नया बदलाव लेकर आ रहे हैं उससे तो ये तय है कि COVID-19 के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुए परिवर्तनों में कुछ अलग सा बदलाव तो जरूर दर्ज होगा, ऐसे में भारत के परिप्रेक्ष से ये सोचना भी अहम हो जाता है कि COVID-19 के बाद कैसा होगा हमारे सपनों का भारत?

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दोस्तों, 130 करोड़ की विशाल आबादी वाले देश ने संकट के इस घड़ी में जैसी एकजुटता दिखाई है उससे दुनियाँ ने भारत की एक अलग छवि तो जरूर महसूस की होगी फिर वो चाहे हमारे प्रवासी श्रमिक भाइयों का बिना किसी हिंसा का सहारा लिए शांतिपूर्ण तरीके से अपने घरों की ओर पलायन हो या फिर देवदूत बने Corona Warriors का जंग से लड़ने और उसे जीत लेने का हौसला, ये सभी बदलते भारत का ही संकेत हैं बस जरूरत है तो इन्हें दिशा देने की जो हमारे नीति निर्माताओं से आने वाले भविष्य में सकारात्मक पहलों के साथ हांसिल होता ही रहेगा क्योंकि अब हमारे सपनों का जो भारत होगा वो पूरी तरह बदला हुआ होना ही चाहिए, वजह साफ है COVID-19 जैसी आपदाएँ कभी भी कोई signal देकर नहीं आतीं, ये आती हैं तो अपने साथ लाती हैं बस तबाही का मंजर, जिन्हें दुनियाँ अपनी खौफनाक यादों की आलमारी में बस किसी तरह समेट भर लेती है |
दोस्तों, हमारा देश दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है, यहाँ की आबादी ज्यादा है तो समस्याएँ भी ज्यादा, इस बीमारी ने हमें जो सिखाया है उसके अनुसार अब हमारे देश में सर्वप्रथम जीवन के लिए जरूरी मूलभूत आवश्यकताओं पर देश के हर नागरिक को समान अधिकार दिये जाने की सुनिश्चितता तय करनी होगी ताकि ऐसे संकट की घड़ी अगर दोबारा भविष्य में आए तो हम पूरी तरह तैयार हों, शायद इसी चीज का जिक्र 12 मई को रात 8:00 बजे राष्ट्र के नाम अपने दिये गए संदेश में प्रधानमंत्री जी ने भी किया था और कहा था कि “अब हमें आत्मनिर्भर बनना ही होगा” क्योंकि COVID-19 ने हमें ये सीखा दिया है कि ऐसी आपदाएँ अगर आती हैं तो देश के सीमाओं के भीतर की मजबूती ही हमें इनसे निपटने में सहायता दे सकती है और ये मजबूती हमें लानी कहाँ-कहाँ है तो सीधा सा उत्तर है कि आने वाले समय में भारत को अपनी स्वास्थ्य सेवाएँ 130 करोड़ की आबादी को देखते हुए व्यवस्थित करनी होगी ताकि हम केवल  इटली की मेडिकल सेवाओं की उत्कृष्टता से स्वयं को न आँकते रह जाएँ बावजूद इसके कि इटली की आबादी मात्र 6 करोड़ है और अब हम जो भी सोचें वो भारत के गांवों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के संघीय ढांचे को ध्यान में रखकर क्योंकि आंकड़ों के अनुसार भारत के गांवों में जो आबादी है वो देश की कुल आबादी का लगभग 68% है और उसपर चिकित्सक मात्र 2%, ऐसे आंकड़े अब बदलने ही होंगे, इनके अलावा हमें हमारी सीमाओं की सुरक्षा भी इस लहजे में करनी होगी जो न केवल दुनियाँ के लिए अनुकरणीय बनें बल्कि दुश्मनों के लिए अभेद्य भी हो ऐसा इसलिए है कि कोरोना के इस संकटकाल में भी जम्मू-कश्मीर में जैसे हमारे जवान शहीद हो रहे हैं वो चिंतनीय है| इन बदलावों के साथ अब राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में गाँव और शहरों दोनों की भूमिका में समानता का एक स्पष्ट संदेश हो, जिसमें गावों के समग्र विकास के साथ देश के शहरीकरण के लिए चुनौती बन चुकी धारावी जैसी झुग्गी झोपड़ियों का भी भारत के नीति निर्माताओं द्वारा की जाने वाली नयी पहल के तहत इनके पुनर्स्थापन की भी आवश्यकता है ताकि इनको भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मदद मिल सके और भविष्य में पुनः अगर इस तरह की कोई वैश्विक महामारी आती है तो राष्ट्र को इस तरह सशंकित न होना पड़े| इनके अलावा कृषिगत ढांचे में भी अभूतपूर्व परिवर्तन लाये जाएँ क्योंकि COVID-19 ने हमें हमारी मुख्य जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान तक ही सीमित बताकर, बेकार के दिखावे से भी दूरी बनाने की सोच को जन्म दिया है, जो वाकई इस आपदा से मिला एक अवसर ही तो है|


उम्मीद है COVID-19 के बाद आने वाला भारत हमारे सपनों का भारत बनें और अपनी बहुसांस्कृतिक, बहुभाषीय और बहुधार्मिक समाज की ताकत को सकारात्मक परिणामों में बादल पाये| बस इसी आकांक्षा को लिए.....जय हिन्द जय भारत...