Hindi Writing Blog

रविवार, 14 मई 2023

Mothers Day

 

मदर्स डे

माँ के आंचल में छुपा बेशुमार प्यार

बस यूं ही नजर आ जाता है हमें,

लेकिन माँ के दिल में छिपे दर्द को

क्या देखा है किसे ने?

बच्चों की करती है जब

दुनिया की बुरी नजरों से हिफाजत वही माँ,

तो उसके इस आंचल को दीवार बनते

तो देखा है हम सब ने,

लेकिन क्या कभी माँ की आँखों में

सूख चुके आंसुओं को देखा है किसी ने?

माँ की मूरत ऐसी है कि

ढूँढने बैठो गम तो भी

खुशियाँ ही मिलती हैं हजार दोस्तों,

लेकिन माँ की खुशियों को

क्या सोचा है किसी ने?

खुले आसमान से फैले माँ के आंचल में

सूरज का उजाला है तो चंदा की चाँदनी भी,

तभी तो जब लोरियां बरसाए माँ प्यारी

गर्म एहसास संग सुकून भरी ठंडक को

महसूस किया है हम सभी ने,

लेकिन क्या तपती धूप और कड़कड़ाती ठंड में भी

थाली में परोसे गए खाने को

गर्मागर्म खा लेने की नसीहत देती,

माँ की आँखों में पलते सपनों को भी

देखा है किसी ने?

कहती नहीं है माँ कुछ भी

बस जीवन की हर बाधाएँ

आसान बना देती है,

पर उसकी राहों में आई मुश्किलों

को क्या देखा है किसी ने?

माँ के आंचल में छुपा बेशुमार प्यार...

                        स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव "कैलाश कीर्ति"

 

मंगलवार, 2 मई 2023

ये करके क्या मिलेगा?

 

Truth of Life


ये करके क्या मिलेगा? यूं तो ये सुनने, पढ़ने और बोलने में बिल्कुल सीधा सा वाक्य है, जिसे अक्सर हमारे द्वारा या हमारे इर्द-गिर्द लोगों द्वारा प्रायः बोला या सुना जाता है, लेकिन क्या कभी हम सब ने इस छोटे परंतु गहराई से भरे वाक्य का अर्थ समझने की कोशिश की है? नहीं ना! क्योंकि ये है ही इतना साधारण। परंतु असाधारण बात तो तब होती है जब इसमें छुपी नकारात्मकता हमारे सामने असफलता का प्रारूप लिए आ खड़ी होती है।

हम जब बाल्यावस्था में होते हैं तो हमारे माता-पिता जब हमसे कहने को कहते हैं तब हम हमेशा यही कहते हैं – “आप ये करने को मुझसे कह तो रहे हैं, पर मुझे ये करके क्या मिलेगा?” ऐसा कहते वक्त तो कभी-कभी तो हम कुछ सोचते भी नहीं, बस कह जाते हैं क्योंकि हम उसे करना नहीं चाहते या फिर उसे करने में हमें हमारा कोई फायदा दिखलाई नहीं देता। शायद, यही कारण है कि कार्य को करने के बाद मिलने वाले सकारात्मक परिणाम को सोचे बिना ही हम पहले से ही हार मान लेते हैं कि अगर मैंने ये कर भी लिया तो मुझे क्या हासिल होगा?

दोस्तों, आज कि उपर्युक्त विषय पर चर्चा मेरे लेखन के अल्पविराम के बाद आप तक पहुँच रही है। कुछ दिनों पूर्व आप मित्रों की मेरे ब्लॉग में अनुपस्थिति और सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त न हो पाने के घटनाक्रम ने मेरे भी मन मस्तिष्क में इस भावना को आकार दे दिया कि “अरे छोड़ो! ये करके क्या मिलेगा?” लिहाजा मैंने छोड़ दिया। लेकिन तत्कालीन वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर आज के इस विषय को चुनना और आपके साथ इससे जुड़े विचारों को साझा करने के पीछे शायद मेरा अभिप्राय अपने अनुभव से आप तक उन बातों को पहुंचाना है जो इस छोटे से वाक्य के पीछे है और सच्चाई जितना ही कड़वा है क्योंकि जिस प्रकार सच सुनने/बोलने की क्षमता हर किसी में नहीं होती उसी प्रकार कुछ कर गुजरने का माद्दा भी ईश्वर सिर्फ इंसानों को ही देता है। ऐसे में लक्ष्य स्पष्ट हो तो पीछे हटना कायरता के सिवा कुछ भी नहीं। कुछ करके हमें क्या मिलेगा, वो तो कार्य की परिणति के बाद का परिणाम तय करता है। परंतु, बिना किए ही उससे हार मान लेना अपनी कमजोरियों को छिपाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम के बीच बस फासला चंद शब्दों का नहीं है बल्कि एक पूरी शृंखला ही इससे जुड़ी है। कार्य को करना, उसे सफलता की ओर लेकर जाना, ये कर्म करने की एक ऐसी कसौटी है जिसकी चेतना सृष्टि में मौजूद सभी जीवंत रचनाओं को प्राप्त है।

जब एक चिड़िया तिनका-तिनका जोड़कर अपना घोसला बनाती है तो ये नहीं सोचती कि ये करके क्या मिलेगा? जब तलहटी में लगे पानी को ऊपर लाने के लिए कौआ किसी पात्र (बर्तन) में कंकड़ के अनगिनत टुकड़े डालता है तो वो ये नहीं सोचता की उसे ये करके क्या मिलेगा, उसके सामने तो बस एक ही लक्ष्य होता है कि पानी बाहर आए और उसे पी कर वो अपनी प्यास बुझाए।

दोस्तों, कर्म और कर्महीनता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम कर्म को स्वीकार करते हैं तो ये संसार हमें कर्मठ कहकर हमारी प्रशंसा करता है और अगर हम कर्महीनता को स्वीकारते हैं तो आलसी कहकर हमें धिक्कारा जाता है। चुनाव हम पर ही है, क्योंकि सृष्टि ने हमें विवेकशीलता का एक मूर्धन्य आवरण का चोला हमारे मस्तिष्क पर डालकर हम इन्सानों को ही इस संसार को चलायमान रखने का भार सौंपा है। ऐसे में घर के छोटे कामों से लेकर जिंदगी के बड़े फैसलों के लेने तक अगर ये वाक्य कि “ये करके क्या मिलेगा?” जिंदगी में शामिल हुआ तो समझ लीजिये इसने हमारी चेतना और हमारे वजूद को चुनौती दे डाली है क्योंकि ये वही सोच है जो हमारे कर्म का रास्ता रोकने को तैयार बैठी है।

इसीलिए, गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कर्म को परिभाषित करते हुए कहा –

        कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

           मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्तवकर्मणि॥2.47॥

 

गीता के संदेश को जब-जब हम अपने मस्तिष्क से जोड़ेंगे तब-तब हम ये पाएंगे

“करके ही सब मिलेगा वरना कुछ न मिलेगा”  

दोस्तों, आपसे अपने विचार साझा करके मुझे हार्दिक प्रसन्नता होती है। आपकी सकारात्मक टिप्पणी मेरी प्रेरर्णा है, इन्हें बनाए रखिए। आज के अंक में बस इतना है। अगले अंक में फिर मिलेंगे तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत!!!



बुधवार, 8 मार्च 2023

पैरों के वो निशां जो इतिहास रच गए - महिला दिवस विशेषांक

 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस


दोस्तों, सन् 2023 की होली, पूरे देश में लगातार 2 दिनों, 7 और 8 मार्च को मनाई जा रही है पर इस खास उत्सव के भीड़-भाड़ के बीच एक और स्पेशल डे हम सब का इंतज़ार कर रहा है। हम इस खास दिन को उन्हें स्पेशल फ़ील कराएं या ना कराएं पर इस दिन हम सभी अपने आप से एक वादा जरूर करते हैं कि सिर्फ ये एक दिन ही क्यों? हमें उनके पूरे साल के हर एक दिन को स्पेशल फ़ील कराना चाहिए, पर कितना हम कर पाते हैं ये तो हमारा दिल ही जानता है, इसलिए अगला-पिछला सब भूलकर आइए इस महिला दिवस दूसरों के वजूद को बनाने वाली उस नारी को सलाम करें जो रोज़मर्रा की अपनी जिंदगी में खुद कहीं न कहीं अपना ही वजूद तलाश करती आपको नजर आ जाएगी।

जी हाँ, आज का दिन उस नारी का है जिसे माना तो दुनिया की आधी आबादी जाता है लेकिन क्या बतौर बेटी, बतौर पत्नी, बतौर माँ या बतौर सहकर्मी उनको दी जा रही खुशियों और अधिकारों में वो न्याय होता दिखाई दे रहा है जिसकी उन्हें दरकार है? दोस्तों, ये वो सवाल है जिसे दुनिया के किसी भी हिस्से में पूछा जाए, उसका जवाब हाँ और ना दोनों में होगा क्योंकि कहीं अगर नारी ने पुरानी जड़ता से मुक्ति पा कर खुले आसमान की उड़ान भरी है तो कहीं वो आज भी डूबती सिसकियों के बीच घुटती अपनी आवाज के बीच बेहतर भविष्य के लिए दुनिया के कुछ एक हिस्सों में बाहें फैलाए खड़ी है।

दोस्तों, आज भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इस अवसर पर स्त्री-पुरुष की समानता ही इस संसार का एक मात्र मार्ग है जो एक घर से एक मोहल्ले, एक मोहल्ले से एक शहर, एक शहर से एक राज्य और एक राज्य से एक राष्ट्र को सशक्त बनाने का माद्दा रखता है ताकि हमारा आज और कल दोनों बेहतर हो सके। इतिहास गवाह है कि नारी की असीमित शक्ति किसी राष्ट्र को दिशा देने में सदैव अतुलनीय भूमिका निभाती आई है, इसलिए इस खास दिन आइए भारत की उन नारी शक्तियों का एक बार पुनः अभिवादन करें जिनके हौसले आज की आधुनिक नारी के लिए अनुकरणीय हैं। इनकी कहानियाँ संघर्ष की बिसात पर लड़ी वो लड़ाइयाँ हैं जो किसी भी स्त्री के मनोबल को पाताल के गर्त से निकालकर आसमान के पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करा जाएँ। समाज के लिए मिसाल बन चुकी इनकी कहानियों की इस कड़ी में पहली कहानी जो मैं साझा करूंगी वो है –

भारत की प्रथम महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी की जिनका जन्म ब्रिटिश भारत के ठाणे राज्य में मार्च 1865 को हुआ था। घर में आई लक्ष्मी के लिए भी तत्कालीन समाज में व्यापात कुप्रथाओं ने आने वाले भविष्य के लिए कुछ खास नहीं रख छोड़ा था। लिहाजा 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह, उम्र में बीस साल बड़े गोपालराव जोशी से कर दिया गया। चौदह वर्ष की आयु में वो माँ बनी पर मात्र 10 दिनों में ही अपनी संतान के प्राण गँवा देने वाली आनंदीबाई ने ऐसी असमय मौतों को रोकने के लिए डॉक्टर बनने का फैसला लिया। अमेरिका के वुमन्स कॉलेज ऑफ पेंसिल्वेनिया से उन्होने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की। दोस्तों भारतीय महिलाओं के भविष्य को रास्ता दिखाने वाली इस अद्वितीय नारी शक्ति ने यूं तो अल्पायु (इक्कीस वर्ष की अवस्था) में ही अपने प्राण त्याग दिए पर डॉक्टर बनने का उनका वो फैसला तब से लेकर आज तक इस समाज को न जाने कितनी महिला डॉक्टरों से रूबरू करा रहा है।

महिलाओं की ये कहानी कुछ और नामों के बिना अधूरी रह जाएगी, अगर मैं वकालत के पेशे को महिलाओं के लिए खुलवाए जाने की लड़ाई लड़ने वाली भारतीय वीरांगना कोर्नेलिया सोराबजी की बात न करूँ, जिन्हें भारत की प्रथम महिला वकील कहलाए जाने का भी सम्मान प्राप्त है। कोर्नेलिया ने उस समय के समाज में व्याप्त पर्दा प्रथा जैसी भारी भरकम कुरीति का सामना करते हुए आज की भारतीय नारी के लिए तरक्की के द्वार खोले। उनके दिखाए रास्ते पर चलकर नारी शक्ति आज न्याय क्षेत्र में भी अपभूतपूर्व प्रदर्शन कर रही है।

भारतीय नारियों के शौर्य, साहस और पराक्रम का नजारा देख रही इस दुनिया को वर्षों पहले भारत की प्रथम महिला IAS अन्ना राजम मल्होत्रा, प्रथम महिला इंजीनियर अय्योला सोमायाजुला ललिता (ए.ललिता), प्रथम महिला IPS किरण बेदी, प्रथम महिला हाई कोर्ट जज अन्ना चांडी, प्रथम महिला चुनाव प्रतिभागी कमला चटोपाध्याय जैसी और न जाने कितनी अनगिनत महिला शक्तियों की अविस्मरणीय कर्म गाथा देखने को मिली है। इनके कर्मक्षेत्र के कार्यों के बदौलत केवल हमारा समाज ही नहीं बल्कि हमारा राष्ट्र भी दुनिया की आधी आबादी के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर खुद की नई पहचान बनाता नजर आया है और सदैव बनाता रहेगा।

भारत की नारी की ये यात्रा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यूं ही अनवरत चलती रहे, बस इसी कामना के साथ दुनिया के प्रत्येक नारी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकानाएँ। 


Happy Holi

 

Holi Masti

मतवारी फागुन की बयरिया

छेड़े है तान मनोहर, होली रंग बरसाने को,

मन का पपीहा बन मयूर

नाचे फागुन के रंग में रंग जाने को,

मेरी प्यारी सखियों

अब तुम सब मोहे इतना बता दो,

नीला, पीला, लाल लगाऊँ

या खेलूँ हरियाली होली,

कान्हा संग मोहे कौन जंचेगी

ब्रज की होली या मथुरा, वृन्दावन, बरसाने की,

मतवारी फागुन की बयरिया...

राधा संग सब करें ठिठोली

कान्हा रंग लगाने को,

अबकी होली रंग जा राधा

प्रीत रंग में कान्हा के,

प्रीत रंग से बढ़कर दूजा

रंग नहीं मन भाने को,

मतवारी फागुन की बयरिया...     

               स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 

 

 


मंगलवार, 17 जनवरी 2023

इंसानियत का जिंदा रहना जरूरी...

 

Humanity

जब एक यार ने दूजे से पूछा और बता,

बड़ी शिद्दत से निभा रहा है जिंदगी को

तो दूसरे ने हालिया जिंदगी के पन्ने पलटते हुए कहा

हाँ, यार! जिंदगी हर बदलते पल

बस यही सिखला रही है

असली नकली के बीच का फर्क बतला रही है

इंसानियत है जिंदा तो बस कुछ एक दिलो में

वरना ये बहुतों से तो दूर जा रही है

जिंदगी हर बदलते पल बस यही सिखला रही है...

दौलत गुम हो जाएगी सारी

शोहरत भी सुपर्दे खाक होगी

मिट जाएगी इंसान की हर एक हसरत

अगर इंसानियत उसके पास न होगी

जिंदगी हर बदलते पल बस यही सिखला रही है...

अभी भी वक्त है, चलो बचा लें इसे

वरना एक दिन ऐसा भी ले आएगी ये जिंदगी

जब मुर्दों के शहर में ही इन्सानों का घर होगा

जिंदगी हर बदलते पल बस यही सिखला रही है...

 

 

शनिवार, 31 दिसंबर 2022

आजादी के बाद का भारत और आज का डिजिटल भारत: बदलती तस्वीर पर एक परिचर्चा

 

Digital India






















दोस्तों, 2023 की इस पूर्वसंध्या पर जहां एक ओर हम 2022 को विदा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर हम नूतन वर्ष के आगमन की प्रतीक्षा में प्रतीक्षारत हैं। ऐसे में आने वाला नवीन वर्ष हम सभी के जीवन में खुशहाली और तरक्की के नित नए आयाम रचे, ईश्वर से मेरी यही कामना है। अब अगर बात नए वर्ष के आगमन की हो तो हम सब के जेहन में खुद की समृद्धि के साथ एक और इच्छा जो बलवती होती है, वो है हम सबके प्यारे देश के नूतन वर्ष में संपूर्ण जगत में नई बुलंदियों तक पहुँचने की और ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि जब-जब दुनिया के मानचित्र पर हमारा देश आगे बढ़ता है तो हम हिंदुस्तानियों का माथा गर्व से ऊंचा हो जाता है।

दोस्तों, आज जब देश की विजयगाथाओं पर परिचर्चा शुरू ही हो गई है तो आइये एक नजर डालें बदलते भारत की उस तस्वीर पर जिसको साथ मिला भारत सरकार के 1 जुलाई, 2015 को शुरू किए गए डिजिटलाइजेशन अभियान का। दोस्तों आज के अपने इस अंक में हम जो चर्चा कर रहे हैं उसमें भारत की प्रगति के पन्नों को अतीत से जोड़कर विश्लेषित करना शामिल है यानि हम कहाँ थे और कहाँ आ गए...कैसी थी ये यात्रा जो 15 अगस्त 1947 से शुरू होकर अब यहाँ पहुंची है, एक लंबा सफर जहां से आगे अगर भारत साल दर साल यूं ही बढ़ता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब दुनिया के लिए “सपेरों का देश” कहा जाने वाला भारत अपनी बीन की धुन पर पूरी दुनिया को नचाएगा।

सन् 1947 में मिली आजादी से पूर्व जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था तो भी हमारे प्यारे देश ने संपन्नता और समृद्धि के ऐसे दौर देखे हैं जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती थी। सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू हुई भारत की उन्नति ने सत्रहवीं सदी के आते-आते खुद को मध्ययुगीन विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित करवा लिया था परंतु उसके बाद आए सत्ता परिवर्तन ने एक लंबे समय तक भारत को विकास के पहिये से नीचे उतारकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के लिए मजबूर कर दिया, वजह साफ थी भारत की बचत का यहाँ से बाहर जाना और देश में होने वाले निवेश में भारी कमी का आना। इन सबके बावजूद 1947 में मिली आजादी के बाद हर मोर्चे पर मुंह की खाए भारत और भारतीयों के लिए आगे का रास्ता काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन हम सभी के विश्वास को तब और बल मिला जब बार-बार विदेशी आक्रांताओं का शिकार बन चुके भारत ने उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ा और खुद को एक बार फिर खड़ा करना शुरू किया। 30 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था (जो उसे 1950 में मिली थी), 2022 आते-आते 3 हजार अरब डॉलर तक पहुँच गई बावजूद इसके की क्रमश: 1962, 1965, 1971 और 1999 में इस देश ने कई बार युद्धों का दंश भी झेला तथा इसके साथ ही दुनियाभर में हो रहे उतार-चढ़ाव का भी सामना किया।

दोस्तों, इस बात का हमें गर्व है कि जो देश 75 वर्ष पूर्व सिर्फ आयात पर निर्भर हो चला था वो अपने देश की विधिवेत्ताओं, विशेषज्ञों और नागरिकों के दृढ़ इच्छा शक्ति एवं कर्तव्यनिष्ठा के पथ पर चलते हुए आज दुनियाभर की जरूरतें पूरी करने में सक्षम बना है, भले ही तब कि 36 करोड़ की आबादी में सीधे-सीधे 1 अरब 4 करोड़ का इजाफा दर्ज हुआ हो। आबादी बढ़ी लेकिन तरक्की बाधित नहीं हुई इसकी गवाही प्रति व्यक्ति आय दर के ये आंकड़े भी देते हैं जिसके अनुसार 1950-51 की प्रति व्यक्ति आय 265 रुपये के लंबा-चौड़ा बदलाव लेकर वैश्विक महामारी कोविड-19 के संकट के बावजूद लगभग 91,481 रुपये तक पहुँच गई। आज का भारत निश्चित ही विकास के नित नए आयाम रच रहा है पर एक चीज जो पूरी तरह स्पष्ट है वो है भारत के साथ कंप्यूटर, इंटरनेट और डिजिटलाइजेशन का समागम, जिसने भारत की छवि को दुनिया के सामने न केवल एक अभूतपूर्व अंदाज में प्रस्तुत किया बल्कि बढ़ते डिजिटलाइजेशन ने देश के सुदूर इलाकों को शहरों से जोड़कर आम लोगों की जिंदगी को सहज बनाने का भी उम्दा कार्य किया है। भारत की प्रगति में शामिल ई-शिक्षा, ई-स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, ई-साइन जैसी सेवाओं ने नागरिकों की रोज़मर्रा की जरूरतों को थोड़ा आसान बना दिया। यहाँ थोड़े शब्द का इस्तेमाल मैंने इसलिए किया क्योंकि डिजिटलाइजेशन का जितना फायदा विकसित देश उठा रहे हैं उतना फायदा भारत को उठाने में बस थोड़ा ही वक्त लगेगा, पर यह होगा अवश्य और ये जब होगा तब भारत दुनिया के साथ बराबर कदम से कदम मिलाकर चलता नजर आएगा।

दोस्तों, किसने सोचा था कि जब 1940 के दशक में दुनिया ने अपना पहला कंप्यूटर पाया तो भारत तक पहुँचने में इसे 16 साल का लंबा इंतज़ार करना पड़ा यानि 1956 का वो वर्ष जब भारत ने पहली बार HEC-2M को दस लाख की कीमत पर खरीदा और यह आगे बढ़ते इस सिलसिले ने 1966 में भारत की दो संस्थाओं: भारत सांख्यिकी संस्थान तथा जादवपुर यूनिवर्सिटी द्वारा मिलकर बनाए गए पहले कंप्यूटर ISIJU-1 ने भारत को इन्फॉर्मेशन टेक्नालॉंजी के दुनिया में कदम रखवाया तो किसी ने नहीं सोचा था कि आगे चलकर ये कंप्यूटर देश की तस्वीर दुनिया के सामने बदलकर रख देगा। देश बदल रहा है, दुनिया भी भारत की क्षमताओं को देखकर दंग है। उतार-चढ़ाव कहाँ नहीं होते, हमारा देश भी ऐसा ही है और अगर बात सक्षमता की करें तो वो इसमें इतनी है जिसके जरिए अतुलनीय नवनिर्माण को संभव बनाया जा सके। भारत के सँवरते भविष्य की आकांक्षा लिए हुए अगले अंक में फिर मिलेंगे, तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत... 


मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

दीपावली विशेषांक - कलयुग की आधुनिकता पर भारी त्रेतायुग की प्राचीनता

 

दीपावली  की शुभकामनाएँ


दोस्तों, सबसे पहले आप सभी को प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

जैसा कि इस आर्टिकल के विषय से ही आपको यह पता चल गया होगा कि आज के मेरे इस दीपावली विशेषांक की यात्रा काफी कुछ आपको आध्यात्म की ओर ले जा रही है बावजूद इसके अगर हम इस विषय से मिली सीख पर थोड़ा सा भी ध्यान दें तो यह शायद बेहद जरूरी है कि आज के इस भौतिकतावादी और लिप्सा से भरे जिस दौर को हम जी रहे हैं उसमें अगर कलयुग हमें आधुनिकता की ओर धकेल रहा है तो कहीं न कहीं त्रेतायुग की प्राचीनता से मिलती सकारात्मक ऊर्जा आज भी हमारे कल को सँवारने का माद्दा रखती नजर आ रही है। जी हाँ दोस्तों, एक तरफ आधुनिकता के लबादे को ओढ़े हम मोबाइल फोन पर अपनी उँगलियों को फेरते हुए अक्सर ये दावा करते हैं कि हम खुद को पूरी दुनिया से जोड़ रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि अपने घर की चारदीवारी में ही अपने आस-पास रह रहे रिश्तों को ही हम अच्छी तरफ संभाल पाने में असफल साबित हो रहे हैं। इसे बताने या इसपर चर्चा करने की भी जरूरत अब शायद शेष नहीं बची है फिर भी इन सबके बीच जब हम अपनी प्राचीन संस्कृति से उपलब्ध कराए गए कुछ उत्सवों/ त्योहारों को मनाते हैं तो एक बार फिर हम मिलजुल कर रहने और साथ-साथ त्योहारों को एक आँगन, एक मोहल्ले, एक गली, एक शहर और एक देश के साथ मनाने का जज्बा हासिल कर लेते हैं, जो कहीं न कहीं हमारी उस प्राचीन सभ्यता और संस्कृति से हमें जोड़ता है जो केवल कुछ वर्षों से नहीं बल्कि सदियों से हमारे इस समाज का अमूल्य हिस्सा रही है।

दोस्तों, बात जब हमारी प्राचीन सीख और आचार संहिताओं की हो तो त्रेतायुग में जन्में प्रभु राम और उनके इर्द-गिर्द घूमते वो सभी पात्र जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना सिखलाते हैं, आज के इस कलयुग में भी हम सभी के लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। जिस प्रकार प्रभु राम ने रावण वध के उपरांत चौदह वर्षों का वनवास पूरा कर कार्तिक अमावस्या (दीपावली) के शुभ दिन अयोध्या नगरी में अपनी वापसी की तो अयोध्या वासियों को हर्ष और उल्लास के आनंदमयी वातावरण में लाखों नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद जीवन को कैसे जीया जाए इसकी अनमोल सीख मिल गई जिसकी आवश्यकता आज के इस आधुनिक परिवेश में हम सभी को कहीं न कहीं हर पल महसूस होती है। हम माने या न माने त्रेतायुग से मिली इन बातों तक आज भी हमारी पहुँच हमारे घरों में रह रहे बूढ़े बुजुर्गों के माध्यम से रोज़मर्रा की जिंदगी में हो ही जाती है।

कहते हैं दोस्तों कि जब प्रभु राम 86 दिनों का युद्ध समाप्त कर लंका से पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या जाने के लिए निकले तो वे सबसे पहले अयोध्या नहीं गए अपितु वो एक-एक कर उन सभी के पास गए जिन महर्षियों, योगियों (सर्वप्रथम वो भारत भूमि पर कुंभज ऋषि कहे जाने वाले ऋषि अगस्त्य के सुंदर दण्डकवन में स्थित आश्रम में उतरे) पशु-पक्षियों,नदियों (सुंदर दण्डक वन के बाद वो चित्रकूट पहुँचें वहाँ से उन्होने माँ यमुना और माँ गंगा के दर्शन हेतु तीर्थराज प्रयाग का रुख किया जहां वे बंदरों और ब्राह्मणों को दान देने के लिए रुके साथ ही वे ऋषि भारद्वाज के आश्रम भी गए) के पास गए जो उनकी इस विजयगाथा में कहीं न कहीं से शामिल थे और जिन्होने उनकी कठिन परिस्थितियों में किसी भी प्रकार सहायता की थी। प्रभु राम का ये चरित्र आज के इस कलयुग में उनकी कृतघ्नता  की उस भावना का संकेत देता है जिसे हम सभी अपनी दैनिक दिनचर्या में अगर शामिल कर लें तो एक दूसरे को दिए जाने वाले सम्मान से ही हमारी काफी मुश्किलें कम हो जाएंगी।

त्रेता युग में प्रभु राम के चरित्र में ऐसी ही अनगिनत विशेषताएँ थीं जो कलयुग भी में भी मर्यादा पुरुषोत्तम बने रहने की उन प्राचीनताओं की ओर हमें आकर्षित करती हैं जिनमें शांतचित्तता, विनम्रता, वचन निभाने की क्षमता, आज्ञाकारिता, त्याग और बलिदान की भावना तथा स्वार्थ से कोषों दूर रहने की उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति उन्हें रामायण कालीन पात्रों में न केवल सर्वोत्तम स्थान प्रदान करती है अपितु आज के इन मौजूदा हालात में स्वयं साक्षात पूर्ण ब्रह्म होते हुए भी सुख-दुख को बराबर से सहन करते हुए मानव जीवन को किस प्रकार संयमित होकर जिया जाए इसकी भी शिक्षा दे जाती है। त्रेता युग में प्रभु राम के किरदार से अलग होकर अगर हम माता सीता और बंधु लक्ष्मण के चरित्र की प्रासांगिकता आज के इस युग में विश्लेषित करें तो हमें हर रोज बहुत कुछ नया ग्रहण करने को मिलेगा। फिर चाहे सीता और लक्ष्मण के साथ उर्मिला का बलिदान हो या भातृ प्रेम पर न्योछावर भरत का जीवन। ये सभी भले ही आज के आधुनिक कहे जाने वाले समाज में सही न बैठें पर अगर हमने इन्हें मन और वचन से अंगीकार कर लें तो इतना सुनिश्चित है कि आज के इस कलयुग में न केवल हमारा खुद का चरित्र सुदृढ़ और बलवान होगा बल्कि उनके विचारों और आदर्शों को लेकर हम अपने आने वाले कल की नयी तस्वीर चित्रित कर सकेंगे।

दोस्तों, इन दिनों दुनिया के मानचित्र पर काफी उतार-चढ़ाव चारों तरफ दिख रहा है – कहीं युद्ध की विभीषिका है (रूस-यूक्रेन युद्ध), तो कहीं सूखा और अकाल (पश्चिमी देश और समस्त यूरोप), तो कहीं मंदी की आहट है। परंतु, इन सबके बीच संभावनाओं के कमियों के बावजूद हालात बेहतर बनाने की ओर अगर इस विश्व का रुख आने वाले समय के साथ सकारात्मक होता जाए और प्राचीनता से निकली सीख को अपनाकर यह समस्त संसार मानव हित के बारे में सोचना प्रारम्भ करें तो इससे बेहतर शायद ही कुछ होगा।

देश और दुनिया में सकारात्मक ऊर्जाओं का संचार निर्बाध गति से चलता रहे, ऐसी कामना कहीं न कहीं हम सबके अन्तर्मन में समाई रहती है हम सभी की यह आकांक्षा इस नववर्ष में दीपपर्व दीपावली के साथ पूरी हो इसी आशा के साथ इस विशेषांक में आज के लिए बस इतना ही। अगले अंक में फिर मिलेंगे तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत!!!   


बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

Happy Dussehra

 

दशहरा


राम-रावण युद्ध की,

रणभेरियाँ ललकारती।

दसों दिशाएँ प्रभु राम के,

तेज को निहारती।

धर्म का स्वरूप ही,

अद्भुत, अलौकिक, अदम्य है।

सृष्टि का संदेश ये,

वो हर दिशा में भेजती।

अधर्म के माया तले,

रावण का ज्ञान धूमिल हुआ।

युगों-युगों से ये गाथा,

सभी के अन्तर्मन को है भेदती।

फिर भी तम से भरी,

अधर्म की यह राह,

हर नित हमें,

धर्म के मुख से है मोड़ती।

ईर्ष्या, लोभ, मोह, मद जैसी बुराइयाँ,

कलयुग में भी सतयुग के रावण,

की याद से हर किसी को है झिंझोरती।

आइये इस दशहरा एक बार फिर,

मिलकर करें प्रभु राम का उद्घोष हम।

हमारी अंतरकाया में पल रही बुराइयों को,

दे दें अब विराम हम।

आज और अभी से,

अधर्म विरुद्ध छिड़े,

इस युद्ध को अंजाम दें।

फिर बजेंगी रणभेरियाँ,

राम रूपी धर्म की,

होगी पुनर्स्थापना।

राम-रावण युद्ध की रणभेरियाँ ललकारती...

                      स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 

दोस्तों, धर्म के पथ पर चलने के लिए साहस और धैर्य की हर पल आवश्यकता हमें अपनी रोज की दिनचर्या में महसूस होती जिसके लिए प्रभु राम का चरित्र और आचरण हम सभी को हर पल दिशा दिखलातें हैं। ऐसे प्रभु राम द्वारा दिये गए इस शुभावसर की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ


बुधवार, 14 सितंबर 2022

हिन्दी दिवस

 

हिन्दी दिवस

दोस्तों, आज हिन्दी दिवस की इस शुभ बेला को प्रतिवर्ष दोहराए जाने का अर्थ बस इतना है कि हिन्दी भाषा की गरिमामयी यात्रा स्वयं में समृद्ध साहित्य की ऐसी परंपरागत शुभकामनाओं का अध्याय जोड़ती जाए जिससे आदिकाल से चली आ रही अभिव्यक्तियों को जब कभी भी शब्दों में बांधने का प्रयास हो तो कोई कोना छूटा ना रह जाए। हिन्दी की ये प्रगति हमेशा यूं ही अनवरत चलती रहे, इसी आकांक्षा के साथ... “हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ”

 गागर में सागर सम्हाले,

अनवरत प्रगति प्रशस्त किए ।

साहित्य सम्पदा अनंत सँजोये,

बढ़ते समय को साथ लिए ।

जोड़े जन-जन को भाषा का,

अद्भुत रूप लिए ।

गागर में सागर सम्हाले...

हम सबकी हिन्दी बस बढ़ती चले,

अलंकृत साहित्य स्वरूप लिए ।  

विशिष्ट बनकर विशिष्टतम का भान कराए,

जब जब व्याकरण संग मिले ।

सहज हो चले जब करनी हो बात हमें,

ऐसी मीठी भाषा के अभिमान की बिंदी ।

भारत माता के भाल सजे,

अनंत काल की गति लिए ।

साहित्य संपदा और सादगी का,

ये अप्रतिम मेल बस यूं ही चला चले ।

गागर में सागर सम्हाले... (स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”)