Hindi Writing Blog

रविवार, 10 अप्रैल 2022

रामनवमी की हार्दिक बधाई

Happy Ramnavmi



              नौमी तिथि मधु मास पुनिता...

               भए प्रकट कृपला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

               हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥

               लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।

                भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥

पृथ्वी वासियों का प्रभु राम से मिलन कराती रामनवमी, प्रभु के आचार – व्यवहार को मानवजाति के निज जीवन में सम्मिलित किए जाने का संदेश देती है साथ ही हमें इस बात के लिए तैयार करती है कि जीवन में कठिनाई चाहे जितनी आए हम सभी को धर्म के पथ पर अडिग होकर चलना है क्योंकि...

एक तरफ मानव खुद एकल चलेगा

अगर चुना अधर्म का साथ।

वही दूजी ओर मिलेगी धर्म पथ पर

प्रभु राम साथ की सौगात...

तो बोलो प्रभु राम की जय

प्रभु राम का साथ सदैव हम सभी के साथ यूं ही बना रहे इसी कामना संग आप सभी को रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...   




 

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

Happy Holi


प्रकृति के दिए रंगों से सजी

इस रंग-रंगीली दुनिया में

असली होली तो तब होगी

जब बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय

की सहस्त्रों धाराएँ एक बार फिर

जगत मध्य कदम ताल करेंगी।

जीवन का स्पंदन तब

भय के घेरे से मुक्त बहेगा

जब रंगों की बौछार में

मानव जाति का समावेशन भी

खुलकर प्रकृति संग जीवन को

जी लेने की हुंकार भरेगा

असली होली तो तब होगी...

   स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 

आइये इस होली अपने देश संग समग्र संसार में शांति स्थापना और निर्विघ्न जीवन के रंगों की छटा इस धरा पर सदा सर्वदा बिखरते रहने की कामना करते हुए इस रंग महोत्सव को सबके संग मिलकर मनाएँ, आप सभी को सामाजिक सद्भाव और एकता का संदेश देती होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!


मंगलवार, 8 मार्च 2022

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

 

Happy Woman's Day



नारी की महत्ता का गुणगान करती इन पंक्तियों के साथ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की आप सभी को शुभकामनाएँ

 सृष्टि के संयोग से

जब नर संग नारी बनी

चलने लगा ब्रह्मांड तब ये

वसुधा भी पूरित हुई

आकाशगंगा से निकलती

जीवन ज्योति तब कहीं आगे बढ़ी

स्नेह और वात्सल्य का

जब ले समागम

नर संग नारी चली

महक उठा संसार तब ये

हर घर की दहलीज

भी पूरित हुई, सृष्टि के संयोग से... (1)

अश्रुओं के सैलाब को जब

नयनों में रोक रखने

की शक्ति और अधरों पर मुस्कान ले  

जब नारी आगे बढ़ी

संयम और धैर्य का रुख देख

तब राधा और सीता भी

प्रभु कृष्ण और प्रभु राम के

आगे जुड़ी

पूर्ण हुआ दुनिया का स्वप्न

तब ये प्रकृति भी

पूरित हुई, सृष्टि के संयोग से... (2)

 स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

Bollywood पर लगा कोरोना का ग्रहण: हटना है जरूरी

 



Bollwood Vs Corona

दोस्तों, अभी कुछ दिनों पूर्व तक कोरोना के नए variant Omicron ने एक बार फिर से दुनिया में दहशत फैलाने का सिलसिला जारी रखा वहीं दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से निकले इस वायरस ने वक्त के साथ लोगों के जीवन को व्यक्तिगत रूप से किस हद् तक प्रभावित किया है इसका अंदाजा हमें अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी से भली-भांति पता चल ही रहा है बावजूद इसके कोरोना से हुए नुकसान का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना प्रभाव पड़ा है ये पता लगा पाना नामुमकिन है क्योंकि एक तरफ अगर श्रीलंका, पाकिस्तान, वेनेजुएला जैसे देश आर्थिक दिवालियेपन की ओर अग्रसर हैं वहीं दूसरी ओर दुनिया की बड़े देशों की आर्थिक स्थिति भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। कोरोना ने दुनिया के विकास को गति देने वाले ज़्यादातर सेक्टर्स पर अपनी तबाही के निशान छोड़े हैं।

दोस्तों, लोगों को इस महामारी के चलते हुए नुकसान से उबरने में एक लंबा अरसा लगेगा और रही बात अपने देश की तो भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ कोरोना की मार सबसे ज्यादा पड़ी है। कोरोना की महामारी ने हमें न केवल शारीरिक रूप से पीड़ा पहुंचाई है बल्कि मानसिक स्तर पर भी काफी आघात दिया है जिसका ताजातरीन उदाहरण भारतीयों के मानसिक सेहत का ख्याल रखने वाले Bollywood पर भी कोरोना के असर से पूर्णतया परिलक्षित होता है क्योंकि ये Bollywood ही तो है जिससे निकलने वाले किरदार हमारे समाज के लोगों को जीवन जीने की राह दिखाते हैं इतना ही नहीं हमारी जिंदगी में शामिल जीवन के प्रत्येक पहलू को छूते रंग-बिरंगे अंदाज से खुशियों को सराबोर करा जाते हैं फिर चाहे वो जज्बा देशभक्ति से जुड़ा हो या फिर शादी-ब्याह के मौकों पर झमाझम बजते संगीत और नृत्यों का सिलसिला हो। हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनीं Bollywood की अनगिनत फिल्में और इनसे जुड़े रिश्ते-नातों को कोरोना की इस महामारी ने कहीं निगल सा लिया है वरना तो नई-नई फिल्मों के गाने आते ही नुक्कड़ और चौराहों पर स्पीकर के माध्यम से बजते गाने हम सभी के जीवन में उल्लास और हर्ष की जो बयार लेकर आते हैं उन्हें हम कभी अकेले में तो कभी सबके साथ मिलकर गुनगुनाते हैं।

दोस्तों, कोरोना पूर्व 2019 का शानदार साल हमारी मुंबइया फिल्मों के लिए भी बेहतरीन रहा जब बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शित की गई फिल्मों में से कुल 17 फिल्में 100 करोड़ रुपये की कमाई करने वाले क्लब का हिस्सा बनीं। इन फिल्मों में तो ऋतिक रोशन अभिनीत फिल्म War ने 318 करोड़, ऊरी, कबीरसिंह, हाउसफुल 4, मिशन मंगल, दबंग 3 और भारत जैसी फिल्मों ने 200 करोड़ कमाएं, लेकिन दिसंबर 2019 में कोरोना के शुरू होने के बाद 2020 में केवल अजय देवगन अभिनीत तानाजी ही 280 करोड़ का बिजनेस कर पाई और ये सिलसिला तब रुक गया जब कोरोना महामारी के तांडव के चलते सुरक्षा कारणों से अधिकतर फिल्मों की सूटिंग बंद हो गई। थिएटर/सिनेमाहाल बंद होने से अँग्रेजी मीडियम और बागी 3 जैसी फिल्मों पर खासा असर पड़ा। 

दोस्तों, Bollywood की फिल्में थियेटर में न हों और उनके गानें आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा ना बनें तो कहीं न कहीं सबकुछ सूना सा ही लगता है क्योंकि हम मानें या न मानें ये गानें, ये फिल्में हमें मनोरंजन के साथ मानसिक खुशी देने का एक अच्छा जरिया हैं, तभी तो कोरोना के बीच आई दक्षिण भारतीय फिल्म “पुष्पा” के हिन्दी वर्जन के गाने और फिल्म ने पूरे उत्तर भारत में धूम मचा दी। अल्लू अर्जुन अभिनीत इस फिल्म के गाने “तेरी झलक अशरफी” और डायलॉग “मैं झुकूँगा नहीं” ने सभी पर अपना अच्छा खासा असर छोड़ा। तभी तो इंस्टाग्राम और यूट्यूब रील से लेकर अलग-अलग प्लेटफार्मों पर अल्लू अर्जुन के डांस की कापी करते लोग बड़े आसानी से आपको दिखाई दे जाएंगे।

Bollywood Image
दोस्तों, ये तो रहीं थोड़ी खुशमिजाजी की बातें लेकिन इन सबसे कहीं अधिक चिंताजनक रही Bollywood industry से जुड़े कुछ कलाकारों की स्थिति का डवांडोल होना और उनके जीवन पर असर डालने वाले घटनाक्रमों का हम सभी के सामने खुलकर आना। इन कलाकारों के प्रशंसक भी इन सबसे से कहीं न कहीं खुद को आहत पाते हैं। कोरोना काल में सुरक्षा कदमों के चलते फिल्मों के साथ टीवी चैनल कार्यक्रमों की सूटिंग पर भी काफी असर पड़ा जिससे हमारे रोज़ के रिश्तों को छोटे/बड़े पर्दे पर जीवंत करती ये पूरी इंडस्ट्री इस महामारी से प्रभावित हुए बिना न रह सकी।

दोस्तों, Bollywood फिल्म इंडस्ट्री लगातार निर्बाध गति से चलती रहे और भारतीयों के जीवन को मनोरंजन के धागे से बांधे रखे, यही मेरी कामना है।

सुख-दुख, अच्छे-बुरे सभी की सीख देती ये फिल्में समाज को सदैव आईना दिखाती रहें बस इसी आकांक्षा के साथ अगले अंक में फिर मिलेंगे...

तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत...



बुधवार, 26 जनवरी 2022

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

Republic Day

सिसकियों और खामोशियों के पिंजरे में

सिमटा था कभी देश मेरा

पर सन् सैतालिस की उस नई सुबह

जब सूरज ने अपनी अलसाई किरणों को

धरती पर भेजा

तो रात की मद्धिम होती चाँदनी ने

मेरे भारत के आजादी की कहानी  

उसे भी कह सुनाई ।।1।।

परिंदों की चहचहाहट ने भी

मेरे भारत की आजादी की  

गाथा गगन की अनंत परिधि में

घूम-घूमकर खूब सुनाई

धीरे-धीरे बात बढ़ी

तो विधि-विधान की चर्चा आई

पेश हुआ फिर संविधान मसौदा

मेरे भारत की भूमि पर

विविध बोलियाँ, भाषाओं और धर्मों से

सजे देश को संप्रभु बनाने

हर्षित करती 26 जनवरी आई

आया गणतंत्र मेरे देश में

भारत ने संप्रभुता पाई ।।2।।

सिसकियों और खामोशियों के पिंजरे में...

                  स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

शनिवार, 1 जनवरी 2022

नववर्ष 2022 की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

नववर्ष 2022

कभी खुशियों ने राहों में,

छलकाया था हर्ष |

तो कभी गम से,

छिला देश का सीना था ||

जैसे-तैसे करके गुजरा,

सन् 2021 का बारहवों महीना था |

फिर आई नववर्ष 2022 की अनुपम बेला,

मन में उम्मीदों की कलियाँ मुस्काईं ||

ऐसा हो बस वैसा हो,

इस सोच ने फिर से ली है अंगड़ाई |

आशाओं की मांग यही है,

आसान बनें बस राहें सबकी ||

रोग-व्याध भी पास न आए,

सरहद पर बैठे रक्षक भी सकुशल अपने घर को आएँ |

टनटन बजती स्कूल की घंटी |

अब कभी भी रुकने न पाए  ||

ऊपर-नीचे होता जीवन,

लौट कर अब पटरी को आए |

या यूं कह दूँ जगमगाते दीयों से रोशन,

दुनिया का हर इक हिस्सा हो जाए ||  

ऐसी मधुरिम आशाओं संग,

चलो पुनः नववर्ष मनाएँ... चलो पुनः नववर्ष मनाएँ...

           स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

 

आप सभी को नववर्ष 2022 की हार्दिक शुभकामनाएँ....


सोमवार, 20 दिसंबर 2021

लोकतन्त्र की ओर बढ़ाया दुनिया ने एक और कदम

A step towards Democracy

दोस्तों, ये समग्र धरती जिसकी भूमि को बहुत सारे देश न केवल मिलकर साझा करते हैं बल्कि एक दूसरे से बहुत कुछ सीखकर आने वाले भविष्य के लिए फलदायी नीतियों का निर्माण कर पाने में खुद को सक्षम भी बनाते हैं ताकि वो अपनी राष्ट्र सीमा में रह रहे लोगों के जीवन को सही आकार दे सकें।

दोस्तों, जैसा कि हम सब जानते हैं कि यदि शासन और सत्ता की बात की जाए तो प्राचीनकाल से ही इसका स्वरूप समय, काल और परिस्थिति के अनुसार ही तय होता रहा है, कभी राजतंत्रात्मक तो कभी तानाशाही। लेकिन इस तरह के शासन से मिले परिणामों ने दुनिया को हमेशा यही सीख दी कि शासन और सत्ता से यदि सर्वसाधारण यानि आमजन की भागीदारी दूर रहेगी तो समाज में अधिकारों की सुरक्षा और असमानता की भावना चरम पर होगी। ऐसे में दुनिया ने शासन के जिस स्वरूप को बढ़ते समय के साथ मंजूरी दी वो है लोकतन्त्र, जिसमें जनता का शासन, जनता के लिए और जनता के द्वारा होता है - अब्राहम लिंकन; और दुनिया ने अभी तक इस शासन व्यववस्था से जो नतीजे देखे हैं उसमें सर्वसाधारण की खुशहाली और तरक्की ज़्यादातर दिखाई देती है, पर ऐसा नहीं है कि इसकी कुछ शर्तें न हों- लोकतन्त्र की भी अपनी कुछ शर्तें हैं; जैसा कि 26वें अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने कहा था कि महान लोकतन्त्र को प्रगतिशील होना चाहिए अन्यथा जल्द ही ये महान नहीं रह जाएगा।

दोस्तों, किसी भी लोकतन्त्र का प्रगतिशील होना उसे लंबे समय तक उसके मूल्यों से जोड़े रखता है और शायद यही वजह है कि प्राचीन भारत की जनपदीय गणतंत्रात्मक व्यवस्था और योरोप के कुछ हिस्सों से चलकर आई लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनियाभर के देशों को आकर्षित करती आई है और शायद यही एक बड़ा कारण भी है कि दुनिया के बड़े-बड़े देश जैसे अमेरिका, ब्राज़ील, भारत, ब्रिटेन, आदि ने लोकतंत्र को ही तरजीह दी है और वर्तमान में अब इस कड़ी में एक और नया नाम आ जुड़ा है, लगभग 400 वर्षों तक ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा रहे बारबोडस का, जो पहली बार सन् 1625 में ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा बना और जिसके राष्ट्रप्रमुख पद पर अभी तक ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ-II आसीन थीं। लेकिन दक्षिण-पूर्वी कैरिबियन सागर में स्थित इस छोटे से द्वीप जिसकी पड़ोसी सीमाएं उत्तर में सेंट लूसिया, पश्चिम में सेंट विनसेट और ग्रेनेडाइन्स तथा दक्षिण में त्रिनिदाद एवं टोबैको से जुड़ी है और जिसने खुद को 72 वर्षीय राष्ट्रपति डेम सांड्रा प्रुनेला मेसन के अगुवाई में खुद को दुनिया का नया नवेला लोकतन्त्र घोषित कर लिया। मशहूर पॉप सिंगर रियाना को अपना नेशनल हीरो स्वीकारने वाले इस देश ने खुद को प्रिंस चार्ल्स के सामने ही गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर बाहर आने और शासन व्यवस्था के लोकतंत्रात्मक स्वरूप को स्वीकारने का संदेश बारबोडस की जमीन से दुनिया को दिया।

बारबोडस द्वारा लोकतंत्र का ये जश्न हमें हमेशा सन् 1947 में मिली आजादी और बाबा भीमराव अंबेडकर जी द्वारा 1950 में दिये गए संवैधानिक उपहार लोकतंत्र के उन मूल्यों की याद दिलाता है जहां बहुजन सुखाय और बहुजन हिताय की बात सत्य सिद्ध होती है, इसलिए मित्रों हम सभी को लोकतंत्र की गरिमा को अनवरत स्वीकारते हुए अपने मतदान के अधिकार का सही और उचित इस्तेमाल सदैव करते रहना चाहिए क्योंकि यही वो अधिकार है जिससे हमें अपने देश का भविष्य चुनने की ताकत मिलती है। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था सम्पूर्ण दुनिया में निरंतरता के साथ आगे बढ़ती रहे इसी आकांक्षा के साथ आज के लिए बस इतना ही, अगले अंक में फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए जय हिन्द, जय भारत। 

 

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

Happy Deepawali


कार्तिक मास की स्वर्णिम बेला

पुनः द्वार पर आयी है,

दीपावली पर प्रभु राम सिया

की अयोध्या वापसी

संग सीख बहुत कुछ लायी है ।

कहने को हो जब घनघोर अंधेरा

जीवन में,

तब अविचल होकर कंटक

भरे पथों पर कैसे चले वो

सहजता से ।

प्रभु राम का दिया यहीं प्रण

अब हम सबको दोहराना है,

पुनः द्वार पर आई इस दीपावली को

जगमगाती दीयों की रोशनी,

घर-द्वार पर सजी वंदन-वार की

हिलती-डुलती लहरियों,  

खिड़कियों के पीछे से झाकती

झालरों की टिमटिमाहट,

अधरों पर बिखरी मुस्कान से

जीवन से ही नहीं

इस समग्र संसार से,

तमस के हर एक प्रकार को

दूर भगाना है ।

बस जीवन में अब यही

प्रभु राम का दिया प्रण

दोहराना है...

    स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”

   


शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

Happy Dussehra


आदि से अनंत तक यह धरा बुराई से अच्छाई के जीत की साक्षी सदा सर्वदा बनी रहे। इस मंगलकामना के साथ विजयादशमी के पावन पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ...

                                                                    रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)


गुरुवार, 30 सितंबर 2021

आलोचनाएँ भी कैसे संवार सकती हैं आपका जीवन

Critcism

इस जग में निंदा के हैं, रूप कई,

कहीं खोट वश, कहीं चोट वश,

कहीं प्रेम वश, कहीं द्वेष वश,

रूप गिनाती अलग-अलग पर,

अर्थ बताएं एक समान,

एक तरफ परिभाषित हैं तो,

दूजी ओर अपरिभाषित,

निर्भर करते कैसे लेंगे लोग इसे,

मंन अधीर कर या फिर हो संयमित,

इस जग में निंदा के हैं रूप कई....

दोस्तों, आज हम 21वीं सदी के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां से आगे का रास्ता तकनीकों के माध्यम से लाई गई आधुनिकता द्वारा सफलता की बुलंदी की ओर इस प्रकार बढ़ रहा है जहां पहुँचने से पहले हम में से अधिकतर लोग अपने जीवन में किसी भी तरह की आलोचनाओं को दर किनार करते दिखलाई दे जाते हैं, लेकिन अतीत के बीते साक्ष्य और वर्तमान को आगे लेकर बढ़ता भविष्य आलोचनाओं की महत्ता को उसी प्रकार घोषित करता है जैसे कि हमारी अधीरता प्रशंसा को सुनने की ओर हमें हर पल अग्रसर दिखाई देती है। ऐसे में, इस प्रश्न का उठना अवश्यसंभावी हो जाता है कि क्या हमारे जीवन में लक्ष्य तक पहुँचने की क्षमता केवल प्रशंसा की पास ही सीमित है? तो इसका सीधा सा उत्तर है कि बिल्कुल नहीं। आमतौर पर साक्ष्यों पर आधारित तथ्य तो इसी ओर इशारा करते हैं कि प्रशंसा के विपरीत की गई आलोचनाओं ने भी इस धरा को अभूतपूर्व और अनमोल रत्न प्रदान किए हैं जिनके पदचिह्नों पर चलकर आज ये समग्र विश्व मानवता का एक लंबा सफर तय कर पाने में सफल हो पाया है।

दोस्तों, ये ही धरती है जहां भगवान बुद्ध, भगवान राम और भगवान कृष्ण को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन क्या उन्होने इन आलोचनाओं से सहम कर या क्रोध या नफरत वश कोई विनाशकारी फैसले लिए? नहीं न? बल्कि उन्होने हम सभी को जीवन जी लेने की वो सीख दी जिसपर चलकर हम इन आलोचनाओं को अपना शस्त्र बनाएँ और सफलता के नए आयाम रच सकें। हमने ये अक्सर देखा और परखा है कि हमें अपनी रोज़मर्रा जीवनचर्या में कहीं न कहीं लगभग प्रतिदिन आलोचनाओं का सामना करना ही पड़ता है, फिर चाहे हम छात्र जीवन जी रहे हों या उससे एक कदम आगे बढ़ जिंदगी के नए प्रांगण में कदम रख चुके हों, हमारा सामना प्रशंसाओं के साथ आलोचनाओं से भी होता ही है और ऐसी परिस्थिति में हम करते क्या हैं – हम प्रशंसा को तो गले लगा लेते हैं लेकिन आलोचना सुनते ही हमारे शरीर की नकारात्मक ऊर्जा न केवल सक्रिय हो जाती है बल्कि हमारे चारो ओर एक ऐसा घेरा बना देती है जिसमें हम मेहनत से हासिल की गई अपनी सारी सफलता को एक पल में त्यागने के लिए खुद को मना लेते हैं। लेकिन क्या ऐसा करना सही है? यदि इस सवाल का जवाब आप अपने आप से पूछेंगे तो इसका आपका उत्तर भी वहीं मिलेगा जहां से ये सवाल आया है, क्या आपने प्रशंसा सुनते वक्त भी यही किया था? अगर नहीं, तो फिर आप आलोचना के लिए ऐसा दोहरा रवैया क्यों अपना रहे हैं?

दोस्तों, मेरा मानना है कि जिस प्रकार प्रशंसा हमें नित नए लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है उसी प्रकार आलोचना हमें अंदर पनप रहे अवगुणों को समझने और उन्हें दूर कर प्रशंसा का पात्र बनाने का रास्ता भी दिखलाती है। फिर ऐसे में आलोचना से मिलने वाली हमारी ये प्रतिक्रिया ऐसी क्यों है? क्यों नहीं हम आलोचना को अपनी तरक्की के काम आने वाली वो सीढ़ी बना लेते जिससे हमें खुद में सुधार लाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा अनवरत मिलती रहे।

दोस्तों, तभी तो महान संत कबीरदास जी ने भी आलोचना की महत्ता को स्वीकारते हुए समाज को ये संदेश दिया:

                      “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

         बिना पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाए॥

जी हाँ दोस्तों, ये निंदक ही हैं जो आपकी निंदा (आलोचना) कर आपको आपकी कमियों से रूबरू कराते हैं और हमारे अंदर की ये कमियाँ ही तो हैं जो बिना आलोचना के कालिदास को महाज्ञानी कालिदास कहलाने और तुलसीदास को महापंडित तुलसीदास कहलाने से रोकती रही हैं। इसलिए कभी भी घर, दफ्तर या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर किसी के द्वारा आपकी आलोचना की जाए तो आप फिर समझ लीजिये कि ये वो संकेत है जो आप में सकारात्मक ऊर्जा जागृत करने के लिए आपको प्रेरित कर रहा है। आलोचनाओं को लेकर एक चेतावनी ये भी है कि नकारात्मकता के साथ ग्रहण की जाने वाली आलोचना आपकी स्थिति भी अँग्रेजी भाषा के महान कवि “जॉन कीट्स” और “शैली” की भांति बना सकती है, जिन्होने अपनी रचनाओं के लिए मिलने वाली झूठी आलोचनाओं के चलते जीवन को ही दांव पर लगा दिया।

दोस्तों, आज अपने इस लेख के लिए आलोचना जैसे संवेदनशील विषय चुनने का मेरा अभिप्राय बस इतना है कि जब भी आप अपने जीवन में आलोचनाओं को सुनें तो उसपर अपना ध्यान केन्द्रित करने की बजाय अनवरत अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें क्योंकि आप सभी ने एक बात तो सुनी ही होगी कि जब वृक्ष फलों से लद जाता है तभी उसपर पत्थर फेंके जाते हैं, तो फिर क्या बस इतना समझ लीजिये कि आप में जरूर कुछ अच्छाइयाँ हैं जो आपको आलोचना सुननी पड़ती है। सीधे शब्दों में अगर कहूँ तो आलोचना का महत्व आपके जीवन को सफल बनाने के लिए उसी भांति है जिस भांति प्रशंसा का क्योंकि आलोचना और प्रशंसा दोनों जीवन में आगे कैसे बढ़ें इसी विकल्प को तैयार करने का मार्ग दिखलाती हैं।

बस इन्हीं शब्दों के साथ आज के लिए इतना ही, अगले अंक में किसी रोचक विषय के साथ फिर मिलूँगी तब तक के लिए...

जय हिन्द, जय भारत। 


 

रविवार, 15 अगस्त 2021

स्वतंत्रता दिवस विशेषांक: इतिहास के पन्नों में दर्ज माँ भारती के अनमोल रत्न खुदी राम बोस की जीवन गाथा

 

स्वतंत्रता दिवस

 दोस्तों, आज देश 75वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहा है ऐसे अवसर पर जश्न-ए-आजादी के इस पावन दिन देश को आजादी दिलाने वाले उन सभी शहीदों के चरणों में मेरा सादर नमन सहृदय समर्पित है आज के इस दिन को मैं उन्हीं शहीदों में से एक खुदीराम बोस की जीवन गाथा द्वारा समस्त भारतीयों के जेहन में एक बार फिर दोहराना चाहूंगी ताकि 1947 में मिली आजादी की उस कीमत को हम सदैव याद रखें।  

दोस्तों, खुदीराम बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे सिपाही जिन्होने अपनी नन्ही सी उम्र में देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दे डाला। कहा जाता है महज 19 वर्ष की उम्र में देश के लिए बलिदान देने वाले वे प्रथम युवा क्रन्तिकारी थे (हालाँकि इस तथ्य में इतिहासकारों में मतभेद है,  कुछ इतिहासकार इससे पूर्व 16 जनवरी 1862 ईस्वी में घटित 68 युवाओं के नरसंहार में एक 13 वर्षीय बालक के बलिदान को प्रथम शहीद होने का दर्जा देते हैं,  कहते है कि इस देशभक्त के जज्बे में गहराई तक डूबे बालक का 50वां नंबर था  जब उसे मारने के लिए तत्कालीन डिप्टी कमिशनर "कावन" के समक्ष लाया गया तब उसने उनकी दाढ़ी पकड़ ली और तब तक पकड़ी जबतक उसके हाथ उसी तलवार से काट नहीं दिए गए)।

                           स्वाधीनता संग्राम के इन क्रांतिकारियों ने इस गीत को वाकई सार्थकता प्रदान कि___________

" सरफ़रोशी कि तमन्ना

अब हमारे दिल में है।

देखना है जोर कितना

बाजुए कातिल में है।।"

 

भारत माता को अंग्रेजों कि गुलामी कि बेड़ियों से मुक्त कराने वाले भारत माँ के इस सपूत का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के "मिदनापुर" जिले के "बहुवैनी" नामक गांव में "बाबू त्रैलोक्यनाथ  बोस" के यहाँ हुआ था। इनकी माता का नाम "लक्ष्मी प्रिया" था। खुदीराम ने जब होश सम्हाला तो उन्होंने अपने इर्द-गिर्द के माहौल में ब्रिटिश शासन के द्वारा भारतीय जनमानस पर ढाये जुल्मों को ही देखा लिहाजा उनके कोमल मन में ये बात घर कर गई कि अपने देश को इन जालिम अंग्रेजों के शासन से मुक्त कराना है लिहाजा उन्होंने 9वीं कक्षा कि पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े।

                                स्कूल छोड़ने के बाद खुदीराम बोस" रिवोल्यूशनरी पार्टी" के सदस्य बने और वन्देमातरम पैम्पलेट वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाये गए आंदोलन में उन्होंने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।

इसके बाद 1906 में मिदनापुर कि औद्योगिक और कृषि प्रदर्शनी में क्रन्तिकारी "सत्येंद्र नाथ" द्वारा लिखे "सोनार बांग्ला" कि प्रतियां बांटी।

पुलिस कि नजर इन पर पड़ी और वो बाकी पत्रक लेकर भाग गए परन्तु देशद्रोह के आरोप में सरकार ने उनपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया और सरकार द्वारा गवाही न मिलने पर निर्दोष छूट गए और 2 महीने बाद पुनः 16 मई 1906  को पकड़े गए लेकिन फिर रिहा कर दिए गए। 6 दिसम्बर 1907 में बंगाल गवर्नर की ट्रेन पर हमला कर दिया यही नहीं क्रांति के पुजारी बोस ने 1908 में दो अंग्रेज अधिकारियों "वाटसन" और "पैम्फॉल्ट फुलर" पर बम से हमला किया लेकिन वे बच गए।

                              खुदीराम बोस ने देश कि आजादी को और जोर देने के लिए मिदनापुर के "युगान्तर" नाम कि संस्था के माध्यम से पहले ही स्वयं को क्रांतिकारियों से जोड़ दिया था। उसके बाद 1905 में बंग-भंग आंदोलन (लार्ड गर्जन) के विरोध में सड़कों पर उतरे। उस समय भारत के अनेकों विरोधकर्ताओं को कोलकाता में मजिस्ट्रेट "किंग्जफोर्ड" ने क्रूर दंड दिया। इसी वजह से ब्रिटिश शासन ने उसकी पद्दोनति कर उन्हें मुज्जफ्फरपुर का सत्र न्यायधीश बना दिया। युगांतर समीति कि गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड (जिसने बंग-भंग आंदोलन के विरोदियों को क्रूरता से दंड दिया था) को मारने का निश्चय किया। इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु खुदीराम तथा "प्रफुल्ल चाकी" का चयन किया गया,  उन्होंने "किंग्जफोर्ड" कि गाड़ी पर बम फेंका जिसमे दो यूरोपीय स्त्रियों ने अपने प्राण गवायें परन्तु किंग्जफोर्ड बच गया।

            अंग्रेजी पुलिस प्रफुल्ल चाकी व खुदीराम बोस के पीछे पड़ गयी, गिरफ़्तारी से बचने के लिए प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश सिपाही कि गोली से मरने कि बजाय स्वयं को गोली द्वारा मारना पसंद किया और  इसी भावना के चलते प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली और देश पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए, चूँकि भागते समय दोनों ने अपने-अपने रास्ते अलग कर लिए थे और जिसके चलते अलग हुए खुदीराम को पुलिस ने पकड़ लिया और 11 अगस्त 1908 को 18+ कि उम्र में उन्हें फांसी दे दी गयी।

           इस प्रकार भारत माँ का ये वीर सपूत नन्ही से उम्र में इस दुनिया से विदा हो गया। परन्तु उनकी मौत ने उन्हें बंगाल में इतना लोकप्रिय बना दिया कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे जिसके किनारों पर खुदीराम बोस लिखा होता था  और ये धोती भारतीय युवाओं में काफी प्रचलित हो गई।

                   दोस्तों आजादी के महासंग्राम में अपनी अमर आहुति देकर खुदीराम बोस जैसे युवाक्रांतिकारी ने इस देश को आज ये दिन दिखलाए हैं कि हम सभी आज आजाद भारत की तरक्की और खुशहाली का एक सजा सजाया मंच देख पा रहे हैं यहाँ से अभी इस राष्ट्र को एक लंबा सफर तय करना है जिसमें देश की एकता के साथ समग्र भाईचारे की भावना का संयोग अनिवार्य है क्योंकि तभी बनेगा हमारे सपनों का वो नया भारत जो अतीत से लेकर आने वाले भविष्य तक सम्पूर्ण विश्व को मार्ग दिखलाएगा।

 आज के लिए इतना ही अगले अंक में आप से फिर मुलाक़ात होगी। जाते-जाते एक बार फिर  आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ!!!