Hindi Writing Blog

सोमवार, 13 जुलाई 2020

आत्महत्या ही क्यों?


Positivity


“जीना अपने ही में एक महान कर्म है!

जीने का हो सदुपयोग या मनुज धर्म है!

अपने ही में रहना प्रबुद्ध कला है!

जग के हित रहने में सबका सहज भला है!

जग का प्यार मिले जन्मों के पुण्य चाहिए!

जग जीवन को प्रेम सिंधु में डूब थाहिए!

ज्ञानी बनकर मत नीरस उपदेश दीजिये!

लोक कर्म भाव सत्य प्रथम सत्कर्म कीजिये!”

 

दोस्तों, महान छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत जी की ये पंक्तियाँ हमारे कानों को अपनी स्वर मधुरिमा से गुंजायमान करती हैं तो हमारे इस जीवन को पाने और उसे जी लेने दोनों के मायने बड़ी ही सरल भाषा में हमें समझा जाती हैं। फिर, आखिर ऐसा क्यों होता है जो हम इस जीवन से मिली हर एक सीख (नसीहत) को पल भर में भूल इस दुनिया से अपने अस्तित्व को मिटा देने पर आमादा हो जाते हैं, माना कि 2020 के जिस दौर को हम जी रहे हैं उसमें धरती पर फैली COVID-19 की इस बीमारी ने दुनिया के अनगिनत लोगों की जीवन शैली में एक बड़ा फेरबदल दर्ज करा दिया है। कहीं किसी ने अपनों को खोया है तो कहीं किसी ने जीवन को सहारा देती आजीविका के साधन(रोजगार और नौकरी) को लेकिन जीवन में घटते इन घटनाक्रमों का ये मतलब तो कत्तई नहीं है कि जैसी जिंदगी हमारी आज है वैसी हमेशा से थी या आगे हमेशा ऐसी बनी रहेगी।

दोस्तों, Lockdown और खुद को COVID-19 से सुरक्षित रखने की इस मुहीम ने जहां एक ओर हमें घरों में रहने को मजबूर कर दिया है वहीं दूसरी ओर हमारे सोचने और समझने की क्षमता पर भी भरपूर असर डाला है, नतीजन डांवाडोल होती इस समकालिक मानसिक स्थिति में हम में से कितनों को आत्महत्या जैसे रास्ते बड़े सहज नज़र आ रहे हैं, चाहे फिर वो Bollywood फिल्म छिछोरे में suicide का विरोध करते एक पिता की भावना का सशक्त किरदार निभाने वाले सुशांत सिंह राजपूत का मामला हो या फिर 16 वर्षीय TikTok स्टार सिया कक्कड़ और संध्या चौहान का, इस कड़ी में शामिल हुए और नामों में कन्नड़ अभिनेता सुशील गौड़ा और सुशांत सिंह राजपूत और वरुण शर्मा की Manager रही दिशा शालियान भी हैं। दोस्तों, इन सभी ने जीवन जीने के इस महान कर्म को बीच धारा में छोड़ खुद को ही इससे अलग कर लिया। ये तो वो चंद नाम हैं जिन्हें हमारा समाज लोकप्रियता के चलते जान पाया और अगर गुमनाम नामों का जिक्र करें तो ये आकड़ें हमें ये सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर क्यों लोग आत्महत्या के रास्ते को इतनी आसानी से सहज मान बैठते हैं और छोड़ जाते हैं अपने पीछे सवालों की वो भंवर जिसमें उत्तर की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती।

आखिर क्यों हम इस जीवन के लिए मिले मूल मकसद को भूल भौतिक संसाधनों की पकड़ और समाज में रुतबा कायम करने की होड़ में अपना सर्वस्व गंवा देते हैं जिसके चलते पूरे विश्व में हर साल 8,00,000 से 10,00,000 लोग हर वर्ष आत्महत्या कर जीवन खत्म कर देते हैं। ये वो अनुत्तरित प्रश्न है जिसका जवाब पाने की इच्छा हम में से कितनों को हर पल व्यग्र (बेचैन) करती रहती है और जब हम इनके उत्तर सकारात्मक ऊर्जाओं (Positive Energy) के वशीभूत होकर ढूंढ़ते हैं तो ही जान सकते हैं कि वास्तविकता चाहे जितनी कड़वी हो उससे हमें लड़कर जीतना चाहिए न कि उसे मिठास में बदलने की चाह में हम आत्महत्या जैसे निरर्थक कदम उठा लें, जिसमें हम हत्या तो मात्र अपने शरीर की कर पाते हैं लेकिन आत्मा वो तो इससे निकलकर न जाने कब तक हमारे द्वारा खुद ही इस सुंदर जीवन को नष्ट करने का उत्तर मांगती रहती है।

दोस्तों, समय, काल, परिस्थिति चाहे जैसी हो उम्मीद का दामन तब तक नहीं छोड़ना चाहिए जब तक हमारे अंदर इनसे लड़ने का हौसला न खत्म हो जाये आ हौसला वो तो तभी खत्म होगा जब हम अपने मन को ही हारने पर विवश कर दें और ऐसा हमें कभी होने नहीं देना है।

दोस्तों, बड़ा ही दुखद होता है जब हम किसी जीवन को इस तरह असमय खोते देखते हैं और उसके जाने के बाद शुरू होता है हमारा चिंतन क्यों, कब और कैसे का, फिर चाहे क्यों न अभी चंद मिनट पहले हम खुद ही उसी भंवर में उलझे रहे हों। दोस्तों, हमारे मन की सोच और विचार दुनिया की वो 2 प्रबल चीजें हैं जिन्होने ये पूरी दुनिया बना दी है। इसलिए हम चाहे जितनी भी मुश्किल में क्यों ना हों हमें इस धरती के अतीत और वर्तमान दोनों को सकारात्मकता के चश्में से ही देखना चाहिए और अपने अंदर की ऊर्जा को महसूस करते हुए जिंदगी को हरिवंश राय बच्चन जी की इन पंक्तियों जैसा कुछ इस तरह जीना चाहिए –

 

“कभी फूलों की तरह मत जीना

जिस दिन खिलोगे बिखर जाओगे

जीना है तो पत्थर बनकर जियो

किसी दिन तराशे गए तो खुदा बन जाओगे”


रविवार, 28 जून 2020

सोशल मीडिया अक्सर सवालों के घेरे में क्यों खड़ा होता है?


Questions around Social Media

दोस्तों, आज जिस तरह के हालात से होकर हमारी धरती गुजर रही है वह हम सब के लिए चिंता का विषय है। एक तरफ हम वैश्विक महामारी COVID-19 का सामना कर रहे हैं तो दूसरी ओर पूरी दुनियाँ में तेजी से बढ़ती सामरिक गतिविधियां भी हमारे माथे पर चिंता की लकीरें खींचें जा रही हैं। आज हर कोई COVID-19 की वैश्विक आपदा से निपटने के चक्कर में अपनी बड़ी सीमाओं का दायरा दिन पर दिन छोटा करता जा रहा है ताकि वो स्वयं को और अपने परिवार को इस virus की चपेट में आने से बचा सके और जिसका नतीजा ये निकला है कि हमने दूसरे और लोगों से दूरी बनाए रखने के formula को तात्कालिक हालात में जीवन जीने का मंत्र बना लिया है, बावजूद इसके कि हमारी फितरत हमें एक सामाजिक प्राणी बनाए रखने के लिए हमेशा उत्तेजित करती रहती है। शायद, यही कारण है कि 21वीं सदी से उपहार स्वरूप मिले technology के संसाधनों Internet, Computer और Laptop के जरिये ही हमने सारी दुनियाँ से खुद को connect कर लिया है और जब हम connect हो ही गए हैं तो लगे हाथ सोशल मीडिया (Facebook, Twitter, Instagram, WhatsApp) पर क्या चल रहा है वो भी देख लेते हैं। लेकिन हम ये नहीं सोचते कि print और electronic मीडिया के समानान्तर चल रही इस दुनियाँ में एक खेल followers पाने और likes बटोरने का भी है, जिससे मिली सस्ती लोकप्रियता के चलते किसी भी घटना को बिना किसी प्रामाणिकता की कसौटी पर परखे हम आगे बढ़ा देते हैं, लेकिन हमारी ये चूक दिन पर दिन हमारे इस समाज में जहर घोलने का काम कर रही है। अभी हाल ही में जब सुशांत सिंह राजपूत ने बांद्रा स्थित flat पर खुदखुसी की तो बिना घटना की असलियत जाने ही nepotism और favourtism के आरोपों और प्रत्यारोपों की झड़ी लग गयी, जिसका शिकार बनी सलमान खान, करण जौहर, आलिया भट्ट जैसी बड़ी हस्तियाँ जिन पर इल्जाम लगाए गए तो दूसरी ओर इन सब से हाय तौबा करके मिताली ठाकुर, सोनाक्षी सिन्हा, नेहा कक्कड़ जैसे स्टार ने सोशल मीडिया से दूरी बना ली।

दोस्तों, ये सोशल मीडिया आज के इस modern age में एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है जो किसी भी गली-मोहल्ले में घटी घटना को तुरंत नेशनल लेवल तक पहुंचा देता है इसीलिए सिर्फ सुर्खियां बटोरने का जज्बा ही है जो इसे अक्सर सवालों के घेरे में खड़ा करता है। चाहे फिर ये अमेरिका में Donald Trump और Twitter Owner की झड़प हो या फिर सोशल मीडिया के जरिये आए दिन चीन और पाकिस्तान जैसे देशों का कोई नया एजेंडा, जो बढ़ते-बढ़ते उस दौर में पहुँच चुका है जहां लगभग तृतीय विश्व युद्ध (Third World War) के आसार भी बनते नजर आ रहे हैं।

मेरे इस लेख के लिखे जाने तक गलवान घाटी में चीन और भारत के हिंसक झड़प के बाद बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका ने यूरोप से अपनी सेनाएँ मंगानी शुरू की है। चूंकि, मेरा मत सदैव युद्ध विरोधी रहा है, इसलिए मैं ये आशा करती हूँ कि एक बार फिर मानवता जीते और धरती को विनाश की ओर ले जाने वाली सोच का अंत हो। दोस्तों, अभी आपने हाल ही में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया के चलते बढ़ती Rivalary को ज्यादे करीब से महसूस किया होगा; पहले दिल्ली दंगा फिर अमेरिका में George Floyd के चलते पूरे देश का हिंसा में झोके जाना और बॉलीवुड का बिखराव। तभी तो खुद रतन टाटा ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑनलाइन समुदाय एक दूसरे के लिए हानिकारक हो रहे हैं, ये चुनौतियों से भरा साल है, हमें एक होकर ही इनसे लड़ना होगा और शायद ये ही सच भी है क्योंकि सोशल मीडिया की सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये हर वर्ग, हर धर्म, हर समुदाय के लोगों को जिस प्रकार आपस में जोड़ती है उससे हमें एक दूसरे के ज्ञान और कुशलता का लाभ उठाना चाहिए ना कि आधुनिक युग से मिली इस सौगात को मौत के अंधे कुएं में ढकेलना क्योंकि

 

“हौसले जब मिलेंगे साथ,

जमाने में झलक होगी,

न तेरी हो न मेरी हो,

बस खुशियों की परख होगी”

                 स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

बुधवार, 17 जून 2020

श्रद्धांजलि...




गलवान नदी घाटी में, भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प में भारत के भाल पर गर्वानुभूति का एक और तिलक लगा, भारत माँ के चरणों में शीश समर्पित करने वाले वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि...

शनिवार, 16 मई 2020

COVID-19 के बाद हमारे सपनों का भारत कैसा हो?


दोस्तों, जैसा कि हम सब ये देख रहे हैं कि Corona नाम के एक छोटे से विषाणु (Virus) ने अचानक देखते-देखते किस प्रकार Globalization के माध्यम से जुड़ी पूरी दुनियाँ को एक ही झटके में अपने-अपने देशों के सीमाओं तक न केवल सीमित कर दिया है बल्कि उससे ऊपर उठकर अपने देशहित से जुड़े फैसलों को लेने के लिए मजबूर भी कर दिया है ताकि वो अपने-अपने देश के नागरिकों के जीवन को COVID-19 के विनाश लीला के सामने घुटने टेकने से रोक सकें बावजूद इसके इस विषाणु की भयावता इतने बड़े स्तर की है कि दुनियाँ के superpower कहलाए जाने वाले अमेरिका सहित मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) की सूची में ऊंचे पायदानों पर काबिज इटली, फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे देश भी हथियार डाल चुके हैं और यही नहीं अनगिनत ज़िंदगियों ने अपनी जानें भी गंवा दी है| ये विभीषिका मानव इतिहास में छेड़े जा चुके प्रथम विश्व युद्ध (First World War) सन् 1914-1918 और द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) सन् 1939-194) की तुलना में काफी डरावनी नजर आ रही है क्योंकि मेरे इस लेख के लिखे जाने तक अभी भी भारत सहित पूरी दुनियाँ इससे लड़ने का कोई अचूक तरीका नहीं ढूंढ पायी है, लेकिन वो कहते हैं न उम्मीद पर दुनियाँ कायम है| आज नहीं तो कल मानव जाति इस विषाणु पर विजय तो प्राप्त कर ही लेगी फिर उसके बाद क्या होगा? कैसा होगा ये विश्व? कहाँ होगा हमारे राष्ट्र का वैश्विक स्थान? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जो पूरी दुनियाँ के बुद्धिजीवियों को अभी से सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह से तात्कालिक घटनाक्रम से जुड़े समीकरण हर रोज एक नया बदलाव लेकर आ रहे हैं उससे तो ये तय है कि COVID-19 के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुए परिवर्तनों में कुछ अलग सा बदलाव तो जरूर दर्ज होगा, ऐसे में भारत के परिप्रेक्ष से ये सोचना भी अहम हो जाता है कि COVID-19 के बाद कैसा होगा हमारे सपनों का भारत?

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दोस्तों, 130 करोड़ की विशाल आबादी वाले देश ने संकट के इस घड़ी में जैसी एकजुटता दिखाई है उससे दुनियाँ ने भारत की एक अलग छवि तो जरूर महसूस की होगी फिर वो चाहे हमारे प्रवासी श्रमिक भाइयों का बिना किसी हिंसा का सहारा लिए शांतिपूर्ण तरीके से अपने घरों की ओर पलायन हो या फिर देवदूत बने Corona Warriors का जंग से लड़ने और उसे जीत लेने का हौसला, ये सभी बदलते भारत का ही संकेत हैं बस जरूरत है तो इन्हें दिशा देने की जो हमारे नीति निर्माताओं से आने वाले भविष्य में सकारात्मक पहलों के साथ हांसिल होता ही रहेगा क्योंकि अब हमारे सपनों का जो भारत होगा वो पूरी तरह बदला हुआ होना ही चाहिए, वजह साफ है COVID-19 जैसी आपदाएँ कभी भी कोई signal देकर नहीं आतीं, ये आती हैं तो अपने साथ लाती हैं बस तबाही का मंजर, जिन्हें दुनियाँ अपनी खौफनाक यादों की आलमारी में बस किसी तरह समेट भर लेती है |
दोस्तों, हमारा देश दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है, यहाँ की आबादी ज्यादा है तो समस्याएँ भी ज्यादा, इस बीमारी ने हमें जो सिखाया है उसके अनुसार अब हमारे देश में सर्वप्रथम जीवन के लिए जरूरी मूलभूत आवश्यकताओं पर देश के हर नागरिक को समान अधिकार दिये जाने की सुनिश्चितता तय करनी होगी ताकि ऐसे संकट की घड़ी अगर दोबारा भविष्य में आए तो हम पूरी तरह तैयार हों, शायद इसी चीज का जिक्र 12 मई को रात 8:00 बजे राष्ट्र के नाम अपने दिये गए संदेश में प्रधानमंत्री जी ने भी किया था और कहा था कि “अब हमें आत्मनिर्भर बनना ही होगा” क्योंकि COVID-19 ने हमें ये सीखा दिया है कि ऐसी आपदाएँ अगर आती हैं तो देश के सीमाओं के भीतर की मजबूती ही हमें इनसे निपटने में सहायता दे सकती है और ये मजबूती हमें लानी कहाँ-कहाँ है तो सीधा सा उत्तर है कि आने वाले समय में भारत को अपनी स्वास्थ्य सेवाएँ 130 करोड़ की आबादी को देखते हुए व्यवस्थित करनी होगी ताकि हम केवल  इटली की मेडिकल सेवाओं की उत्कृष्टता से स्वयं को न आँकते रह जाएँ बावजूद इसके कि इटली की आबादी मात्र 6 करोड़ है और अब हम जो भी सोचें वो भारत के गांवों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के संघीय ढांचे को ध्यान में रखकर क्योंकि आंकड़ों के अनुसार भारत के गांवों में जो आबादी है वो देश की कुल आबादी का लगभग 68% है और उसपर चिकित्सक मात्र 2%, ऐसे आंकड़े अब बदलने ही होंगे, इनके अलावा हमें हमारी सीमाओं की सुरक्षा भी इस लहजे में करनी होगी जो न केवल दुनियाँ के लिए अनुकरणीय बनें बल्कि दुश्मनों के लिए अभेद्य भी हो ऐसा इसलिए है कि कोरोना के इस संकटकाल में भी जम्मू-कश्मीर में जैसे हमारे जवान शहीद हो रहे हैं वो चिंतनीय है| इन बदलावों के साथ अब राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में गाँव और शहरों दोनों की भूमिका में समानता का एक स्पष्ट संदेश हो, जिसमें गावों के समग्र विकास के साथ देश के शहरीकरण के लिए चुनौती बन चुकी धारावी जैसी झुग्गी झोपड़ियों का भी भारत के नीति निर्माताओं द्वारा की जाने वाली नयी पहल के तहत इनके पुनर्स्थापन की भी आवश्यकता है ताकि इनको भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मदद मिल सके और भविष्य में पुनः अगर इस तरह की कोई वैश्विक महामारी आती है तो राष्ट्र को इस तरह सशंकित न होना पड़े| इनके अलावा कृषिगत ढांचे में भी अभूतपूर्व परिवर्तन लाये जाएँ क्योंकि COVID-19 ने हमें हमारी मुख्य जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान तक ही सीमित बताकर, बेकार के दिखावे से भी दूरी बनाने की सोच को जन्म दिया है, जो वाकई इस आपदा से मिला एक अवसर ही तो है|


उम्मीद है COVID-19 के बाद आने वाला भारत हमारे सपनों का भारत बनें और अपनी बहुसांस्कृतिक, बहुभाषीय और बहुधार्मिक समाज की ताकत को सकारात्मक परिणामों में बादल पाये| बस इसी आकांक्षा को लिए.....जय हिन्द जय भारत... 

शनिवार, 2 मई 2020

COVID-19 पर कविता




COVID-19 के चक्रव्यूह में फंसी दुनियाँ जल्द ही इस वैश्विक महामारी पर विजय प्राप्त कर इस संकट से बाहर निकल आए ताकि मानवता एक बार फिर झूमकर गाए| इसी आकांक्षा में वर्तमान को समर्पित कुछ पंक्तियाँ:

है कैसा वक्त ये आया,
डरा इंसान से, इंसान का साया |
सूनी पड़ी गलियों में,
मंजर खौफ का छाया ||
है कैसा वक्त ये आया...
कहीं लाचार है जनता,
कहीं बेबस प्रशासन है |
ली है धर्म ने छुट्टी,
लगी विज्ञान की ड्यूटी ||
है कैसा वक्त ये आया...
कितना विस्मित नजारा है,
घरों में कैद बैठे हम |
सड़कों पर अब,
 जंगल ये सारा है |
रची धरती विधाता ने,
बनाया स्वर्ग से सुंदर ||
बिगाड़ा खेल ये सारा,
इन्सानों के दिमागों ने |
उबर जाए ये जग सारा,
अब बस उम्मीद इतनी है ||
है कैसा वक्त ये आया...
                      स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

वैश्विक महामारी: COVID-19 से हम क्या खो रहें...क्या पा रहें...

COVID-19 Environment

दोस्तों आज पूरी दुनियाँ संकट के उस दौर से गुजर रही है जहां इंसानी वजूद पर ही लगभग प्रश्न चिन्ह(?) लगता दिखाई दे रहा है, November 2019 को चीन के Wuhan से शुरू हुई COVID-19 नाम की इस महामारी ने जिस तरह इंसानी ज़िंदगियों को लीलना शुरू किया उससे पूरी दुनियाँ के सामने इन्सानों के शरीर की अंतिम प्रक्रिया यानि दफनाए जाने/ जलाए जाने के लिए भी एक चुनौती पैदा कर दी है, इसमें कोई शक नहीं| दुनियाँ भर के विकसित और विकासशील देशों ने इस महामारी के सामने घुटने टेक दिये लेकिन इन सब के बीच Medical Treatment के अभाव में इस बीमारी से निपटने के जो तरीके दुनियाँ ने निकाले वो बढ़ती आबादी और पर्यावरण असंतुलन की मार झेल रही इस धरती के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है| इस महामारी से लड़ने के लिए Social Distancing और Country Lockdown के जिस formula को दुनियाँ भर के देश तरजीह दे रहे हैं वो दुनियाँ पर मंडराए इस संकट के बादल में रिमझिम फुहार जैसा है बावजूद इसके कि इस संकट के चलते हम जन और धन हानि की भयानक मार झेल रहे हैं|
दोस्तों ये सिलसिला नया नहीं अपितु लगभग 400 सालों से हर 100 के अंतराल पर दुनियाँ को झकझोरने वाली प्लेग(1720), कालरा(1820), Spanish Flu (1920) जैसी महामारियों की शृंखला की अगली बीमारी है COVID-19 (2020) जिसने दुनियाँ भर के लोगों को भले ही आज चार दीवारों में कैद रहने को मजबूर कर दिया हो लेकिन वक्त के साथ मानवीय सभ्यता इस पर जीत अवश्य हासिल कर लेगी बावजूद इसके मानव प्रजाति को बचाने में आज भले ही पूरी दुनियाँ COVID-19 नाम के इस अदृश्य ताकत से लड़ रही हो लेकिन इससे पहले इस धरती पर पर्यावरण असंतुलन की दृश्य चुनौती को यही मानव प्रजाति पूरी तरह ignore भी करती आई है क्योंकि उसका परिणाम आने में थोड़ी देर जो थी|
Corona Environment

दोस्तों, Corona Virus नाम के इस virus ने भले ही आज पूरी दुनियाँ को negative energy से घेर रखा हो लेकिन इन सब के बीच positive घटनाक्रम इतने ज्यादा फलदायी हैं कि दुनियाँ भर के पर्यावरण विद् ये कहने को मजबूर हैं कि अब तो हर साल पूरी दुनियाँ में 2 weeks का lockdown होना ही चाहिए क्योंकि Corona virus से चली इस लड़ाई में nature ने खुद को heal करना शुरू कर दिया है इतना ही नहीं धरती के कंपन तक में लगभग 30% से 50% की कमी दर्ज की गयी है, Ozone परत में भी सुधार हुआ है, प्रदूषण स्तर कम होने पर हवाएँ शुद्ध हैं तो बहती नदियां भी स्वच्छ हो चली हैं| दोस्तों, प्रकृति की ये वो धरोहरें हैं जिनके बिना मनुष्य जीवन की कल्पना ही बेमानी है और यहाँ ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि मौत की वजह मात्र एक virus ही नहीं होता और भी वजहे हैं जो जीवन को खत्म करने की ओर इस समग्र मानवीय सभ्यता को ढकेले जा रही थी| ऐसे में विकास की कीमत चुकाती ये धरती अभी सबकुछ सहती जा रही थी लेकिन ये बाद में हमें ब्याज सहित वापस भी कर देगी लिहाजा अब तो आने वाले वक्त की यही जरूरत है कि इंसान गलतियों से सबक ले और COVID-19 की इस चुनौती से लड़ने में “Stay Home, Stay Safe” की policy अपनाकर अपना योगदान दे क्योंकि ये virus हमसे सबकुछ छीन ही नहीं रहा बल्कि हमें बहुत कुछ दे भी रहा है, जिसमें प्रकृति के संतुलन से लेकर, अपनों का साथ, मुश्किल हालत में लड़ने की ताकत, समग्र भारत के माथे सजती एकता की गर्वानुभूति, वैश्विक स्तर पर हमारे राष्ट्र की नयी पहचान और पूरी दुनियाँ से सीधा संवाद करती ये सोच की विकास और प्रतिस्पर्धा की वेदी पर पर्यावरण और मानवीय जीवन की बलि बस अब और नहीं, ये वो सकारात्मक परिवर्तन हैं जो हमें COVID-19 पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देंगे और शायद तभी हम वास्तव में ये समझ पाएंगे कि वैश्विक महामारी: COVID-19 से हम क्या खो रहें...क्या पा रहें...
                                            जय हिन्द, जय भारत....

सोमवार, 30 मार्च 2020

COVID-19 (SARS-CoV-2): अब बस ऐसा ही हो...



अयम निज: परो वेति गणना लघु चेत्र साम् |
उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुंबकम् ||

भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में अंकित महोपनिषद अध्याय 4 के श्लोक संख्या 71 में लिखा गया यह श्लोक मात्र श्लोक भर नहीं बल्कि ये हम भारतीयों की वो सोच है जिसका पालन हम भारतीय अपने जीवन के हर आचरण में पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं और कामना करते हैं कि

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे संतु निरामया: |
सर्वे भद्राणि पश्यंतु
मा कश्चिद्दु:खभाग्मवत् |
ऊँ शांति: शांति: शांति: ||
अर्थात,
सभी सुखी होवें, सभी रोग मुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को दुख का भागी ना बनना पड़े|
लेकिन दोस्तों, जैसा कि हम सब जानते हैं मौजूदा हालात में हमारी इन भावनाओं को जैसे ग्रहण लग गया है और ग्रहण का कारण बनी है COVID-19 नाम के virus से फैली ये वैश्विक महामारी जिसने धीरे-धीरे कर पूरी दुनियाँ को अपनी जद में ले लिया है| दुनियाँ भर की मानव जाति आज खतरे में है और विश्व स्तर पर इस आपदा से निपटने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन कोई सटीक Vaccine या टीके की अनुपलब्धता और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में transfer होने के गुण के चलते इस महामारी ने जहां पूरी दुनियाँ में लगभग 7,01,525 से ज्यादा लोगों को संक्रमित किया है वहीं लगभग 33174 लोगों को मौत की नींद सुला दी है|
ऐसे में हम सभी का ये दायित्व बन जाता है कि इस जानलेवा बीमारी की जद में ना ही हम खुद आएँ और ना ही दूसरों को आने दें और अलग-अलग देशों में सरकार और system द्वारा जारी की गयी advisory का पालन करें ताकि इस virus के आतंक से पूरी दुनियाँ मुक्त हो सकें|
दोस्तों, ये तो थी आज की स्थिति लेकिन क्या आज जैसे जो हालात पूरी दुनियाँ में बनें हैं उसे बदला जा सकता था? तो मेरी राय में इसका बिल्कुल सीधा सा उत्तर है—जी हाँ| जब चीन के Wuhan शहर में इस virus ने अपना असर दिखाना शुरू किया और देखते ही देखते पूरे शहर को घरों में कैद हो जाने के लिए मजबूर कर दिया तो ठीक उसी वक्त अगर पूरी मानव जाति और दुनियाँ के नक्शे में अंकित देशों ने धैर्य और संयम से काम लिया होता और अपने-अपने देश की अंतराष्ट्रीय सीमाओं को कुछ समय के लिए सील कर लिया होता तो शायद आज हालात कुछ और होते क्योंकि चीन ने जब 6 जनवरी को इस बीमारी के बारे में पूरी दुनियाँ को बताया तब से लगभग 2 महीने के कम समय में ही उसने इस बीमारी पर जीत हांसिल कर ली| मेरे लेख लिखे जाने तक चीन इस बीमारी से बाहर आ चुका है, वहाँ जन-जीवन सामान्य हो चुका है लेकिन बाकी दुनियाँ पर संकट बना हुआ है| ऐसे में हमारी तत्परता और wait and watch की नीति ने शायद इस बीमारी को पूरी दुनियाँ तक फैलने से रोकने में अहम भूमिका निभाई होती, बावजूद इसके आज भी जब दुनियाँ भर की सरकारें और system हम सभी से हाथ जोड़कर ये appeal कर रहे हैं कि इस virus के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई में हम stay home, stay safe के formula को अपनाकर इस चुनौती से लड़ने में उनका साथ दें तो भी हम में से कुछ लोग आज भी वो तत्परता दिखाते नजर नहीं आ रहे हैं जिसे शुरुआती दौर में ना दिखाने की कीमत हम इतना कुछ गवांकर आज चुका रहे हैं|

इसलिए दोस्तों, आप सब से मेरी यही appeal है कि अभी भी वक्त है आगे बढ़कर system द्वारा जारी advisory का सटीक पालन करें और अपनी इस प्यारी सी धरती को इस deadly virus के चंगुल से मुक्त कराने में अपने सहयोगात्मक भूमिका निभाएँ ताकि हमारी धरती फिर से मुस्कराए (😊), तो आइये हम सब मिलकर एक बार फिर से बस यही कामना करें “सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वेसंतु निरामया:....”

मंगलवार, 10 मार्च 2020

होली की शुभकामनाएँ

Happy Holi


होली पर अनमोल वचन लें, जीवन को अब तोल-मोल लें,
रंगों की भरी पिचकारी में, प्रेम-सौहार्द का रंग भी घोल लें,
दुश्मन आँख गड़ाए बैठा, सीमाओं पर देश की,
घर के अंदर खेल रहे हम, होली अपनों के खून की,
कैसी कटुता भरी पड़ी है, आज हमारे सीनों में,
भूल गए क्यों इतनी जल्दी, आजादी के छालों को,
नासूर बन गए जाति-धर्म का, दहन-होलिका हो जाए,
बहे राष्ट्र में प्रेम की गंगा, उन्नति भी खूब लहराए,
फूले-फले भारत माँ का आँचल, रंग तिरंगा चढ़ जाए,
होली पर अनमोल वचन लें...
             स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

आप सभी को मेरी तरफ से होली की हार्दिक शुभकामनाएँ...

रविवार, 8 मार्च 2020

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 
International Women's Day


अखिल विश्व की नारी शक्ति को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

दोस्तों, भारत सहित दुनियाँ भर के 68 देशों में लोगों को अपना शिकार बना रहे Corona Virus के साथ देश कि  राजधानी दिल्ली में हुई हिंसा ने भी मानव धन क्षति के चलते अन्तर्मन को काफी व्यथित कर दिया है| ऐसे में स्वयं एक महिला होने के नाते मेरा दुनियाँ के आधी आबादी को यही संदेश है कि जिस तरह मुश्किल घड़ी में वो पुरुषों के साथ खड़ी होकर सदा से इस सृष्टि चक्र को पूर्ण करने वाली परंपरा हेतु अपना अमूल्य योगदान देने में अपनी महती भूमिका निभाती आई हैं वो आगे भी इस क्रम को जारी रखें क्योंकि निर्भीकता, निडरता और ममता की प्रतिमूर्ति नारियां ही विधाता की बनाई वो कृति हैं जिन्होने अपने हौसलों के उड़ान से सदैव इस दुनियाँ को नयी दिशा दी है|
 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

साइबर क्राइम: आधुनिक तकनीकी युग की नयी चुनौती

Cyber Crime

दोस्तों, आज एक तरफ जहां चीन सहित दुनियाँ भर के 28 देश कोरोना वाइरस के कहर से कुदरत प्रदत्त इंसानी शरीर को बचाने की जंग लड़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर पूरी दुनियाँ को एक-दूसरे से जोड़कर रखने वाली आधुनिक तकनीकों से लैस मोबाइल और कम्यूटर की साइबर दुनियाँ भी हर रोज नए-नए खतरों का सामना कर रही है| आलम ये है कि इस दुनियाँ से जुड़े अपराध लोगों को इस हद तक अपना शिकार बना रहे हैं कि लोग ये समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इंसानी तरक्की में मददगार बनी इन चीजों का इस्तेमाल वो करें या ना करें| दोस्तों, जैसा कि आए दिन हमें समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के जरिये ये खबरें पढ़ने को मिल ही जाती हैं कि लोग कितनी तेजी से online धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं और इतना ही नहीं इसके चलते लोगों को जिन दूसरी और समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उसके अनुसार कहीं लोगों के personal information से जुड़े डाटा चोरी हो रहे हैं तो कहीं लोगों की मेहनत से जमा किए गए पैसे उनके ही bank account से एक झटके में ही गायब कर दिये जा रहे हैं|

दोस्तों, ये घटनाएँ इस तकनीकी युग से जुड़ी दुनियाँ का वो काला सच है जिसे हम अपने modern technique से लैस इस era में मात्र एक click से पूरी दुनियाँ को मुट्ठी में कर लेने की सोच के बदले face कर रहे हैं और हमारी इसी सोच को अंजाम देते-देते इस तकनीक में अपराधियों ने किस हद तक जगह बना ली है उसका अंदाजा तो हमें International Judicial Conference में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कही इस बात से ही लगा सकते हैं जिसमें उन्होने डाटा सुरक्षा और साइबर क्राइम को न्यायपालिका के लिए नई चुनौती बताया|
दोस्तों, प्रधानमंत्री जी की ये चिंता जायज भी है क्योंकि साइबर क्राइम के आंकड़ों में दिन पर दिन हो रही बढ़ोत्तरी भी यही संकेत दे रही है हालांकि इस तरह के क्राइम के लिए artificial intelligence की मदद काफी कारगर है लेकिन चिंताजनक बात ये है कि जब सन् 2011 national crime records bureau ने इस तरह के अपराधों में 85% वृद्धि के साथ यह बताया कि इसमें शामिल अपराधियों की आयु 18 से 30 वर्ष के बीच की है यानि इस तरह के अपराधों को करने वाले अधिकतर युवा हैं जो hacking, web hijacking, cyber stocking, cyber bullying, service attack, software attack, virus attack, pornography, बाल यौन शोषण, software piracy, salami attack, phishing जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर इस तरह के अपराधों को न केवल अंजाम दे रहे हैं बल्कि समाज में युवाओं की भूमिका को भी सोचनीय बना रहे हैं|
दोस्तों, जैसा की हम सब जानते हैं कि आज हम वैश्वीकरण के जिस युग में जी रहे हैं उसमें हमें दुनियाँ के हर हिस्से से जोड़े रखने में internet ने कितनी अहम भूमिका निभाई है और तो और आज internet के बदौलत ही हम सभी के लिए सामाजिक नेटवर्किंग, ऑनलाइन purchasing, जानकारी का आदान-प्रदान, गेमिंग, ऑनलाइन एजुकेशन, ऑनलाइन जॉब जैसी अनेकों सुविधाएं घर बैठे आसानी से हासिल हो रही है जिसके बारे में आज से पहले हम सिर्फ कल्पना कर सकते थे| आज वो हमारी पहुँच में आसानी से आ गयी है लेकिन हमारी ये सुविधाएं अब कुछ लोगों के निशाने पर आ चुकी हैं और जिसकी भयावहता इस स्तर की है जो आम लोगों के साथ देश की सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों तक को अपना निशाना बना रही है बावजूद इसके दुनियाँ भर के अनुमानत: 4.33 billion active internet users जहां इस technology का इस्तेमाल कर रहें वहीं world population के लगभग 57% लोग internet access रखते हैं जो आकड़ों के लिहाज से दुनियाँ के एक बड़े हिस्से को जोड़े रखता है लेकिन इनमें से ज़्यादातर लोग आज भी साइबर क्राइम की दुनियाँ के खतरों से अंजान होते हैं| ऐसे में इससे जुडने के साथ ही ये जरूरी हो चला है कि समय-समय पर इस दुनियाँ को Commwarrior-A, Welchia, Blaster,  Slammer, NIMDA, Code Red, ILOVEYOU, The Morris Worm, Elk Cloner, Creeper जैसे viruses का सहारा लेकर अपराधियों द्वारा नए-नए तरीकों से दुनियाँ को दहलाने की कोशिश करने वाले अपराधियों और उनके द्वारा किए जाने वाले अपराधों से सतर्क रहें साथ  ही इससे निपटने हेतु हमारी जागरूकता इस तथ्य में निहित है कि इस आपराधिक दुनियाँ से निपटने के लिए हम कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करें और इस तकनीक से जुड़ी सुविधाओं का इस्तेमाल करते वक्त सावधानी बरतें ताकि साइबर क्राइम से जुड़े इन अपराधों पर लगाम लगाई जा सके|
दोस्तों, आने वाले भविष्य के लिए चुनौती बन चुके जन जागरूकता से जुड़े इस विषय पर ये थी मेरी सोच के साथ साझा की गयी जानकारियाँ| इस समस्या का हल भी मानवीय सभ्यता अवश्य ढूंढ लेगी| इसी कामना के साथ जय हिन्द जय भारत...

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

खेत-खलिहान से जुड़ी भारतीय उन्नति: एक सार्थक सोच


दोस्तों, जहां एक ओर पूरी दुनियाँ में Corona virus के चलते global health emergency declare की गयी है वहीं दूसरी ओर आज भारतीय संसद, आजाद भारत से जुड़े एक और बजट का गवाह बनी जिसमें वर्तमान सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़ी कई नई भावी योजनाओं से देश को अवगत कराया| दोस्तों, 130 करोड़ आबादी वाले इस विशाल देश में यूं तो प्रतिवर्ष भारतीय नीति निर्माताओं द्वारा किसानों और खेत-खलिहानों की खुशी के लिए अनेकों योजनाएँ बनाई जाती हैं लेकिन क्या वो पर्याप्त हैं? ये सवाल आज हर किसी के मन में इसलिए कौंध रहा है क्योंकि मौजूदा दौर में जब भारत सहित पूरी दुनियाँ की अर्थव्यवस्थाओं में मंदी के कयास लगाए जा रहे हैं ऐसे में कभी अतीत के आर्थिक superpower रहे भारत की ओर पूरी दुनियाँ की निगाहें होना लाजिमी है क्योंकि पूरे विश्व के लिए ये मायने रखता है कि भारत कैसे और किस प्रकार भारतीय economy को आने वाले सालों में 5 trillion dollar economy बनाने के लक्ष्य को पूरा कर सकेगा| दोस्तों, विशेषज्ञों की अगर मानें तो इस उन्नति का रास्ता जाता है भारतीय खेत-खलिहानों से होकर दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे जीवन को जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक अन्न उपजाने वाले किसानों और उनके खेत-खलिहानों का विकास कर ही सरकार हमारे देश को तरक्की की राह पर पुनः ले जा सकती है|
मैं ये नहीं कहती कि सरकार के प्रयासों में कोई कमी होती है पर सरकार द्वारा लागू अनेकों योजनाओं के बावजूद storage और transportation के समस्याओं के चलते किसानों को direct इन सुविधाओं का लाभ अभी भी नहीं मिल पा रहा और तो और आम आदमी की महंगी होती खाने की थाली का सटीक मूल्य भी उन्हें नहीं मिल पाता ऐसे में कृषि कार्यों से दूरी बनाये रखना भारतीय युवाओं की पहचान बन चुकी है जिसे हर हाल में रोकना ही होगा| दोस्तों, जैसा कि हम सब जानते हैं कि बीते वर्ष का economic sciences का Nobel prize share करने वाले good economics for hard times के लेखक और भारतीय मूल के economist अभिजीत बनर्जी को मिला था और उनका भी यही मानना है कि भारत की तरक्की का रास्ता भारत के खेतों से ही होकर गुजरता है और हो भी क्यों न हम भारतीय आज इतनी समस्याओं से घिरे होने के बावजूद दुनियाँ के सबसे बड़े कृषि प्रधान राष्ट्र का दर्जा जो रखते हैं यही नहीं दोस्तों, मनुष्य को जीवन देती अन्न उपजाने की परंपरा की शुरुआत कर उसे इस विकसित स्वरूप में लाने वाले इस विशाल देश में खेती आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व सिंधु सभ्यता से ही प्रारम्भ हो चुकी है जो निरंतर विकास के दौर से गुजरते हुए इस रूप में हमारे सामने मौजूद है| ऐसे में कृषिक्षेत्र को अगर हम  भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहें तो गलत न होगा और शायद यही कारण भी रहा है कि भारत पर निरंतर हुए विदेशी हमलों के बावजूद भारत आज भी इतना सम्पन्न है| दोस्तों, हमारे देश में खेल-खलिहानों की खुशिहाली लोगों के जीवन को किस हद तक प्रभावित करती है कि हमारे तीज त्योहारों से लेकर हमारे शास्त्रो जैसे ऋग्वेद, अथर्ववेद, गृह सूत्र, श्रोत सूत्र और पाणिनी की अष्टाध्यायी तक में इनका वर्णन प्राप्त होता है और रही रोज़मर्रा के जीवन में इसके शामिल होने की बात तो इसका सीधा उदाहरण है पद्मश्री से सम्मानित बीजमाता राहीबाई पोपरे, जिन्होने मात्र अपने जीवन के अनुभवों से कृषि जगत को अनुपम भेंट सौपी है जो ये prove करने के लिए काफी है कि भारतीय जनमानस के बीच कृषि क्षेत्र से जुड़ी परम्पराओं की जड़ें कितनी गहरी हैं बस जरूरत है तो इन्हें सींच कर पुष्पित और पल्लवित करने की ताकि भारत की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सके साथ ही भारतीय खेत-खलिहानों से सदैव राष्ट्र तरक्की की गाथा आने वाले भविष्य में लिखी जाती रहे इसी आशा में जय जवान जय किसान जय विज्ञान...