Hindi Writing Blog

रविवार, 21 अप्रैल 2019

Brexit की ज़द में दुनियाई अर्थव्यवस्था

Brexit and World Economy






















आज का दौर भूमंडलीकरण अर्थात Globalisation का है, जहां पूरी दुनिया के लोग न केवल एक दूसरे से अपने-अपने सांस्कृतिक और धर्मिक संस्कारों को साझा कर रहे हैं, अपितु वो आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रमों से भी एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं| ऐसे में किसी भी एक देश द्वारा लिया गया कोई भी एक फैसला अपने साथ जाने-अनजाने बहुत सारी चीजों को प्रभावित कर जाता है और उन्ही में से एक मुद्दा है Brexit का, जो आज पूरी दुनिया में इसलिए भी विशिष्ट हो चला है क्योंकि अपने अमलीकरण के प्रक्रिया के चलते ये पूरी दुनिया के अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने वाला है| ऐसा मानना है, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का जिसने इस बात की आशंका जताई है कि सन् 2019 में दुनिया की अर्थव्यवस्था को Brexit का झटका लग सकता है|

तो आइये आज मैं आपसे वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने वाली इसी Brexit के बारे में कुछ अहम जानकारियों को साझा करती हूँ जो हम सभी को इस घटनाक्रम को समझने में मदद कर सके| वास्तव में ये Brexit है क्या? और इसके पीछे की कहानी क्या है, जिसने स्वयं अपनी देशी की सीमाओं को लांघकर पूरी दुनिया पर अपना प्रभाव डालने में सफलता हांसिल कर रखी है| वास्तव में Brexit का अर्थ है कि यूरोपीय महाद्वीप में रहने के बावजूद यूरोपीय देशों के संघ (European Union-EU) से Britain जैसा राष्ट्र बाहर निकलेगा यानि exit करेगा और ऐसा करने का निर्णय Britain ने अपने देश के नागरिकों के EU में शामिल होने के कारण आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों में आई कमी के चलते किया है|

Britain द्वारा EU छोड़ने के फैसले की वकालत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री David Cameron ने 2015 के आम चुनाव में ये बात कही थी कि अगर वो चुनाव जीतते हैं तो इसके लिए वो जनमत संग्रह कराएंगे और ऐसा करने के लिए उनकी पार्टी लगातार दबाव बना रही थी और इस दबाव के चलते वहाँ जनमत संग्रह हुए भी, जहां EU छोड़ने और EU के साथ रहने वालों का अनुपात 51:49 रहा था क्योंकि उनका मानना था कि अब वक्त आ चुका है कि Britain के लोगों को तरजीह दी जाये| Britain द्वारा EU से बाहर आने का फैसला अब सारी प्रक्रियाओं से गुजर कर अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है, लेकिन world war II के बाद आर्थिक सहयोग के गरज से EU का (यूरोपीय संघ) का निर्माण किया गया ताकि यूरोपीय देशों की सीमाएं व्यापार में एक-दूसरे के लिए बाधक न बनें लेकिन बदले वक्त के बाजारीकरण ने परिस्थितियाँ बदल दी हैं| स्वयं की मुद्रा, स्वयं की संसद रखने वाले इस संघ पर लंबी चौड़ी membership fee वसूलने का दावा करने वाला Britain अब इससे बाहर आना चाहता है और ऐसा हो भी क्यों न, आज के हालात world war II के बाद के हालत से बिल्कुल अलग हो गए हैं|


एक तरफ जहां Britain, EU से निकलने की प्रक्रिया को तवज्जो दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ EU में बने रहने के लिए चीन और अमेरिका जैसे देशों के साथ ही उसके खुद के अधीनस्थ राज्य Scotland और वहाँ की labor party दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि Brexit की प्रक्रिया से United Kingdom (UK) के आर्थिक मुद्दों सहित अन्य विकासात्मक मुद्दों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो कहीं से भी UK और इसके नागरिकों के हित में नहीं है|
आगाज तो शुरू है.......................................................................पर अंजाम अभी बाकी है|
  क्यूंकी Brexit जैसा घटनाक्रम दुनिया की अर्थव्यवस्था को न जाने किस ओर ले जाएगा?

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

वो सन् 1919 की 13 अप्रैल......आज सन् 2019 की 13 अप्रैल























शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले |
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निशां होगा ||

वाकई आज भी भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराकर स्वतंत्रता की नई सुबह का दर्शन कराने वाले देश के वो शूरवीर जो इस लड़ाई को लड़ते -लड़ते अपने प्राणों की आहूति दे इस धरा से हमेशा के लिए विदा ले गये ,लेकिन उनके कर्मो का क्षेत्र बनी भारत की इस भूमि पर आने वाली पीढ़ियां हमेशा उनके दर्द को महसूस करते हुए अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करती रहेंगी यानि दूसरे शब्दों में हम ये कह सकते हैं कि उनकी यादों पर श्रद्धा के पुष्प हाथों में लिये हर शहीद दिवस पर मेले ही तो लगते ही  हैं लेकिन तारीखें गवाह हैं कि मुल्क के लिए अपने प्रेम को दर्शाने वाले शहीदों ने इसके हितों की लड़ाई लड़ते-लड़ते अपने प्राणों को इस मातृ भूमि को अर्पित कर दिया वो भी बिना किसी गिले के|
कुछ ऐसा ही हुआ था आज से ठीक सौ साल पहले सन् 1919 के उस मनहूस दिन जब भारत माँ को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्त कराने का अरमा अपने दिलों में लिए न जाने कितने हिन्दुस्तानियों को कायर ब्रिटिश जनरल डायर ने  अमृतसर के जलियांवाला बाग में मौत की नींद सुला दी थी, उस घटना को घटे आज 100 वर्ष पूरे हो गए और आज के इस सशक्त भारत में उस दिन से लेकर अब तक कितना कुछ बदल गया है आज भारत दुनियां की महाशक्तियों में से एक बन चुका है और उधर कभी पूरी दुनियां पर शासन करने वाले ब्रिटेन का साम्राज्य सिमट कर एक देश तक आ गया और तो और तब से लेकर अब तक ब्रिटेन की “Thames” और भारत की “Ganga”  दोनों में न जाने कितना पानी बह चुका है, तब जाकर आज से लगभग तीन दिन पहले भारत और इसमें रहने वाले  भारतवासियों को कभी अमानवता की क्रूर भट्ठी में झोकने वाले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री “Theresa May” ने इस घटना के प्रति पश्चाताप जताया, वाकई ये देर से हुआ लेकिन आज भारत की जो पहचान बनी है उसके पीछे जरूर उन शहिदों की शहादतें हैं जिनके निशां आज भी देखने वालों को इस घटना के मूक दर्शक बनी 'जलियाँवाला बाग' की दीवारों पर मिलते हैं|

आज जब कभी भी मैं भारत की उन्नति के इस दौर का अवलोकन करती हूँ तो मुझे एक बात स्पष्ट रूप से नजर आती है कि हमारा देश भारत दुनिया का वो देश है जिसने न जाने कितने आघातों को झेला और न केवल पुनः उठ खड़ा हुआ अपितु अपने होने के अस्तित्व का भी परिचय दुनिया को कराया है| मुझे गर्व है एक भारतीय होने पर क्योंकि भारत और भारतीयता ये दोनों ऐसी भावनाएँ हैं जिसकी शक्तियों को हर वक्त न केवल इस संसार ने बल्कि इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड ने भी महसूस किया है|                  

                       जय हिन्द, जय भारत 

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ



























कलयुग की अयोध्या में प्रभु राम को मिले दूसरे वनवास को चरितार्थ करती इन पंक्तियों के साथ आप सभी को प्रभु राम के जन्म पर रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग तक...
कहीं राम का शंख नाद था, वहीं राम की है अब गूंज|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग तक...
कहीं अंत था अहंकार का, वहीं प्रतीक्षा है अब गृह की|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग तक...
कहीं दमन था सृजन के लिए, वहीं प्रविष्टि पर है अब रोक|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग तक...

                           ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

रविवार, 7 अप्रैल 2019

कहानी उनकी जिनकी सफलताओं ने रचा इतिहास




सफलता एक ऐसा शब्द जिसको हांसिल करने का लक्ष्य शायद हम सभी निर्धारित करते हैं, लेकिन इससे मिलने वाला परिणाम हम सभी को एक समान संतुष्ट नहीं कर पाता, किसी को सफलता आसानी से और अथाह मिल जाती है तो कोई न जाने कितने असफलताओं का स्वाद चखने के बाद सफलता को प्राप्त करता है और उसकी सफलता देख हम सभी ये सोचने लग जाते हैं कि कैसे इतनी आसानी से इन्हे सबकुछ मिल गया, पर शायद हमारी ये सोच उस तात्कालिक घटनाक्रम को देखकर ही प्रभावित हो जाती है, उससे जुड़े पिछले वाकयों को न हम देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं क्योंकि वास्तविकता में सच्चाई इससे कोसों दूर होती है| आज जिनकी शोहरत पर हम अपना शीश झुकाते हैं वो भी हमारे-आप जैसे ही अपने जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए एक लंबे संघर्ष का सामना करके ही यहाँ तक पहुंचे हैं| यदि हम इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो सारी बड़ी शख्सियतें जिन्होने आज सफलता के नये आयाम तय किए हैं वो सभी असफलता की सीढ़ियों से होकर ही गुजरें हैं, बस उनमें और असफल कहे जाने वालों के बीच फर्क बस इस बात का होता है कि सफल इंसान सफलता हांसिल करने को अपनी जिद्द और असफल इंसान उसे किस्मत से मिला मात्र एक मौका समझकर हार मानकर बैठ जाता है|

बस आज मैं आपको  सफलता और असफलता के कशमकश से उबरकर सामने आई उन महान शख्सियतों की प्रेरक कहानियों से रूबरू कराऊँगी जो अपने कर्मों के बल पर आज सम्पूर्ण संसार को एक नयी दिशा दे रहे हैं और इस कड़ी में पहला नाम आता है "Bill Gates" का, जिनको कभी उनकी टीचर ने क्लास की performance अच्छी न होने पर ट्रक ड्राईवर बनने की सलाह दी थी, तो वहीं दूसरा नाम है "Dhirubhai Ambani" का जिन्होने अपने जीवन की शुरुआत में मिली असफलताओं के बावजूद एक रेवड़ी चलाने से लेकर अरबों का साम्राज्य तक खड़ा किया| इतना ही नहीं इस कड़ी में जो अगला नाम है, वो है "Thomas Alva Edison" जिन्होने 1000 प्रयोगों के बाद दुनिया को रोशन करने वाला मानव रचित आविष्कार बल्ब के रूप में दिया| सफलता की कहानी लिखने वाली जो अगली पंक्ति है वो है चार साल तक न बोल पाने और सात साल तक न पढ़ पाने वाले "Albert Einstein" की जिन्होने E=mc2 की रचना कर न केवल विज्ञान जगत अपितु पूरी दुनिया को नयी दिशा दी और इन सबसे भी आगे बढ़कर जो नाम आता है वो है बच्चे-बच्चे की जुबान पर छाए "Disney" का जिसके कर्ता-धर्ता "Walt Disney" को एक अखबार ने उनकी कल्पनाशीलता के कमी के चलते नौकरी से निकाल दिया था, इनके अलावा Britain के पूर्व प्रधानमंत्री "Winston Churchill" का, जो दो बार Britain के प्रधानमंत्री बनें, लेकिन इससे पहले हुए सारे चुनाव में उनकी हार हुई थी| इन कहानियों की शृंखला में जो अन्य नाम है वो हैं, Narendra Modi, Nelson Mandela, Mahatama Gandhi, Jack Welch, आदि|

सफलता और असफलता की इन कहानियों की फेहरिस्त में हर रोज नए-नए चेहरे शामिल होते जा रहे हैं पर उन सभी का नाम इस छोटे से लेख में शामिल कर पाना मुश्किल है, लेकिन इन शख़्सियतों की कहानियों से जुड़े किस्सों का जिक्र बार-बार लेकर आना हमें वो मनोबल दे जाता है जिसकी आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में सबसे ज्यादा दरकार है|


आज वक्त तेजी से बदलता जा रहा है औरों को मिली सफलताएँ कभी-कभी हमारी असफलता पर हमें ग्लानि से भर देती हैं लेकिन यदि हम इन वेत्ताओं की ज़िंदगियों पर नज़र डालें तो शायद वो हमारे जीवन की दिशा ही बादल दें, क्योंकि प्रेरणाओं का जरिया चाहे जो हो बस हमारी इच्छा शक्ति को हमेशा बल मिलते रहना चाहिए| तभी तो हम आज नहीं तो कल सफलता को जरूर हांसिल कर पाएंगे| 

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

नवरात्रि की आपको बधाई



द्वि खुशियों के आह्वान से, झूम रहा संसार |
एक तरफ है नया वर्ष तो, दूजा है नवरात्र ||
                            ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)


नववर्ष की पावन बेला पर माँ दुर्गा के स्नेहाशीष के आकांक्षी सभी मानव जन को हिंदी नववर्ष और चैत्रीय नवरात्र  की मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं

शनिवार, 30 मार्च 2019

अखंड भारत___एक दर्शन (Monolithic India___A Philosophy)

Monolithic India

भारत____हमारा गर्व, हमारा अभिमान

आज हम भारतवासी पूरी दुनिया में सफलता के परचम लहरा रहे हैं, ऐसे में अपनी मातृभूमि पर तो गर्व करने का हक तो बनता ही है और हो भी क्यों न हमारा देश है ही ऐसा जिसने शायद दुनिया में सबसे ज्यादा आक्रांताओं के आक्रमण झेले लेकिन शायद ही दुनिया के किसी देश को जीतने की लालसा मन में पाली हो| इतिहास गवाह है कि हमारे देश के ज्ञानविद सिर्फ और सिर्फ विदेशों में अपने ज्ञान और संस्कृति का प्रसार करने गए, जहां पहुँचकर उन्होने  दुनिया को अपनी गर्वीली सभ्यता और संस्कृति से अवगत कराया जिनकी झलकियाँ आज भी दुनिया के अनेकों देशों में दिखाई देती हैं| आज मैं आप से अपने भारत के उस अतीत की चर्चा करूंगी जिसमे भारतीय सीमाएं इतनी दूर तक फैली थीं जिसकी वर्तमान में हम सिर्फ और सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं|




भारत जिसे प्राचीन काल से लेकर आज तक जंबू दीप, भारत खंड, आर्यावर्त, अजनाभखंड और हिंदुस्तान के नामों से जाना जाता है| हमारा भारत जैसा आज है वैसा पहले नहीं था| ब्रिटिश शासन से कई वर्षों पहले इस राष्ट्र में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, लंका(सिंहल द्वीप), बांग्लादेश, तिब्बत(त्रिविष्टप), म्यांमार, इन्डोनेशिया जैसे अनेकों देश शामिल थे और तब के सम्पूर्ण भारत का नाम जिस महामना के नाम पर पड़ा था वो थे ऋषभ देव के सौ पुत्रों में से एक "भरत" और बस यहीं से शुरू हुई थी हमारे देश की गौरव गाथा, लेकिन बदलते इतिहास ने बहुत कुछ बदला और धीरे-धीरे भौगोलिक सीमाओं में कटौती होती गयी और एक-एक कर भारत माता से उसके बहुत से महत्वपूर्ण अंग अलग कर दिये गए, चाहे फिर वो 1876 में अफगानिस्तान का अलगाव या 1904 में नेपाल व 1907 में भूटान या फिर 1937 में म्यांमार का, इन सभी विभाजनों ने भारत माँ को तो पहले ही छिन्न-भिन्न कर रखा था, परंतु हिमालय जैसा उच्च मस्तक धारण करने वाले भारत को विखंडन का असली दंश उस समय झेलना पड़ा जब 1947 में धर्म के नाम पर विभाजन कराके अंग्रेजों ने माँ भारती से पाकिस्तान को अलग कर दिया और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका| ये अपने बढ्ने के चेष्टा को जारी रखे है और आज जब कभी भी हमारे देश में समाहित 29 राज्यों को भी खंड-खंड कर देने की बातें सुनाई पड़ती हैं तो मन वेदना से भर उठता है, क्योंकि हम सबकी असली ताकत तो सदियों से हम भारतवासियों की एकता ही है और बस वक्त के साथ हम इसे जब-जब छोड़ आगे बढ़े तब-तब हमने और हमारे राष्ट्र दोनों ने विध्वंस  के साये को अपने सिरहने खड़ा देखा है|

आज हम सिर्फ सोच सकते हैं कि हमारा भारत ऐसा था....... वैसा था........ लेकिन आज भी जो हमारे पास बचा है उसके लिए हमारा उत्तरदायित्व यही है कि बस और नहीं हम जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सदा एक रहें क्योंकि यही एकता हमारी ताकत है और ये राष्ट्र हमारा अभिमान| 
               जय हिन्द, जय भारत... 

बुधवार, 20 मार्च 2019

आप सभी को मेरी तरफ से रंगों भरे त्योहार होली की हार्दिक शुभकामनाएँ



























बह रही मदमस्त बयार,
होकर फागुन के रथ में सवार |
छलक रही रंगों की धार,
कर जीवंत ऋतु का शृंगार ||
कहीं होलिका की दुविधा है,
कहीं प्रह्लाद की प्रभु की भक्ति |
ऐसी पुलकित बेला में भी,
छलक रही रंगों की धार ||
कर जीवंत ऋतु का शृंगार, कर जीवंत ऋतु का शृंगार

                              ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

रविवार, 17 मार्च 2019

ऑटोमेशन (AUTOMATION): वरदान या अभिशाप?


























आज जब कभी भी हम काम करते-करते थक जाते हैं तो सोचते हैं कि काश! कोई ऐसी मशीन होती जो चुटकी बजाते ही हमारा सारा काम कर देती, बस मनुष्य के इसी सोच कि कार्य परिणीति है ऑटोमेशन (AUTOMATION) अर्थात स्वचालन, जहां आप कुछ कामों को ऑटोमैटिक मोड पर सेट कर देते हैं ताकि आपको उन्हे बार-बार करने की जरूरत न पड़े, वो काम खुद ब खुद पूरा हो जाये|

कुछ समय पूर्व आयी विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई गयी कि बढ़ते ऑटोमेशन (AUTOMATION): वरदान या अभिशाप?के चलते भारत से लगभग 69%, चीन से लगभग 77% और इथोपिया से लगभग 85% जॉब को खतरा हो सकता है, बस यही मुद्दा चिंता का विषय बन जाता है कि क्या व्यापार और कार्य क्षेत्र की तमाम मुश्किलें आसानी से और कम खर्च से सुलझाने वाला ऑटोमेशन (AUTOMATION) वरदान है या अभिशाप?

आज मैंने अपने इस लेख में परिचर्चा के लिए इस विषय को इसलिए चुना क्योंकि लगभग 7.6 अरब की आबादी वाले इस विश्व में कामकाजी हाथों की कमी नही और समाज की रचना के अनुसार मानव जीवन की सम्पूर्ण भौतिक, सामाजिक, आर्थिक जरूरतों को पूरा करने वाले उसके रोजगार की जिसकी उसे सख्त जरूरत है| ऐसे में बढ़ते ऑटोमेशन(AUTOMATION) के प्रचलन ने कार्य क्षेत्र के लगभग सभी विधाओं जैसे Accounting and Invoicing, Data Backup, स्टाफ ड्यूटी चार्ट बनाना, email मार्केटिंग, Software Testing व अनेकों वेबसाइट में अपनी पैठ बना ली है जिसके चलते हाथों से काम करने वालों के कार्य क्षेत्र पर काफी प्रभाव पड़ा है जो ऑटोमेशन(AUTOMATION) के नकारात्मक प्रभाव का प्रस्तुतिकरण करता है|


हालांकि ऑटोमेशन(AUTOMATION) के चलते कार्य में तीव्रता आयी है और human error की गुंजाइश भी कम हो गयी है और इस नयी तकनीक को अपनाकर समाज विकास की एक नयी परंपरा को लेकर आगे बढ़ना चाहता है और ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि समय-समय पर आने वाली तकनीकों ने हमारे समाज के विकास में अहम भूमिका निभाई है लेकिन यदि यही तकनीकें मानवीय कार्य क्षमता को प्रभावित करने के बदले मिल रहीं हो तो आगे के समाज के लिए शायद ही ये उतनी सार्थक सिद्ध हो सकें जितना हम सोचते हैं, ऐसे में अंत इस आरंभ पर आधारित होकर इस बात के संशय को और भी गहराता जा रहा है कि मानवीय तरक्की के लिए लाया गया ये ऑटोमेशन(AUTOMATION) वाकई वरदान है या अभिशाप? जो एक तरफ अपनी द्रुत गति और human error से परे होकर कार्यों को निष्पादित कर रहा है वहीं दूसरी ओर कार्य क्षेत्र में मानवीय बल को भी चुनौती दे रहा है... 

शनिवार, 9 मार्च 2019

सरहदों की विध्वंसात्मक पटकथा (Borders Disruptive Story)

सरहदों की विध्वंसात्मक पटकथा (Borders Disruptive Story)
























ये तेरा है… ये मेरा है, बस इसी मानवीय सोच के कारवां का एक मूर्त रूप है सरहद जिसके मायाजाल ने आज सम्पूर्ण विश्व को उलझाकर रख दिया है| आज से लगभग 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व जब हमारी पृथ्वी का निर्माण हुआ तब विधाता ने इस  धरा को सरहदों से मुक्त बनाया था परन्तु धीरे-धीरे मानवीय सभ्यता के विकास ने सरहदों अर्थात सीमाओं का निर्माण प्रारम्भ किया, जिनमें से कुछ अगर प्रकृति प्रदत्त रहीं तो कुछ को मनुष्य ने जन्मा और इसी सृजन के साथ शुरू हुआ सरहदों की विध्वंसात्मक पटकथा का सिलसिला जो आज तक जारी है| वैसे तो हमारा विश्व अतीत से आधुनिक तक एक लम्बा सफर तय कर चुका है और विश्व के इस सफर के साक्षी बने हैं दुनिया के मानचित्र पर अंकित 193 देश जिनका वर्गीकरण ही सरहदों के बंटवारे पर आधारित है|

आज पूरी दुनिया में भारत-पाकिस्तान (India-Pakistan) की सरहदों का मुद्दा मानव निर्मित इस समाज को नयी दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर रहा है क्योंकि जिन सरहदों को इंसान ने विकास की पटकथा लिखने के लिए निर्मित किया था वही सरहदें आज विध्वंस का कारण बन चुकी हैं, फिर वो चाहे अमेरिका और मेक्सिको (America and Mexico) हो या फिर उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया (North Korea and South Korea) या फिर इजराइल और फिलिस्तीन (Israel and Palestine) की सीमाएं, या भारत और चीन (India and China) की सीमाएं सभी के इतिहास का अगर हम अवलोकन करें तो हमारे सामने जो तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं वो ये हैं कि इन सरहदों अर्थात सीमाओं के चक्कर में उलझकर इंसान ने पूरे विश्व को हिंसा के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया जहाँ से शान्ति का मार्ग निकल पाना एक असंभव लक्ष्य बन चुका है|


अतीत से निकलकर आयीं गाथाएं सरहदों के  माध्यम से  बनने वाले दुनिया के विनाशकारी स्वरुप को देख चुकी हैं, लिहाजा अब जरुरत इस बात की है कि सरहदों की दुनिया से निकलकर मनुष्य अपने देशहित और लोकहित के बारे में सोचे और “वसुधैव कुटुम्बकम”‘ की भारतीय अवधारणा को सत्य सिद्ध करें क्योंकि आजतक इन सरहदों की विनाश लीला ने हमें सिवाये खून-खराबे के दिया ही क्या है? जबकि दूसरी ओर विधाता ने इस धरा पर कभी भी मात्र सरहदों के आधार पर बंटवारा  नहीं किया| उसने तो एक रंग-बिरंगी प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण धरती मनुष्य को सौंपी है जिसको मात्र सजाने संवारने  का कृत्य ही इस मानवीय सभ्यता को शोभा देता है न कि इसे विध्वंस के गर्त में धकेलने का| 

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस






नारी हूँ मैं, नारी हूँ मैं
निस्तेज का भी तेज मैं
उद्वेग का हूँ वेग मैं
सानिध्य का भी स्नेह मैं
स्वालम्बन का आधार मैं
पीड़ा का हूँ प्रहार मैं
विरह की वेदना से परे, वात्सल्य का उपहार मैं
सृष्टि का भी आरम्भ मैं
अन्धकार का प्रकाश मैं
फिर भी समय की धार में, बह रही निर्बाध मैं
बह रही निर्बाध मैं...
              ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)


मेरी तरफ से आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं!!!

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

भारतीय वीरांगनाओं की अनसुनी दास्तान (Unheard Braveries of Indian Women)

























सशक्त थीं, सतेज थीं,
समुन्द्र का वो वेग थीं |
पराक्रम की जोत थीं,
निर्मूल में भी मूल थीं |
निरिहता का त्याग थीं,
वो वीरता का राग थीं |
देश भूमि से जुड़ी, वो भारत का ताज थीं,
वो भारत का ताज थीं…
                       ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

समय साक्षी है कि सृष्टि ने इस धरती को अपनी दो अनमोल कृतियों नर और नारी से संवारा है, जो बदलते वक्त के साथ एक दूसरे का पूरक बन मानव संरचित इस समाज के नवनिर्माण में अपनी अतुलनीय भूमिका निभा रहे हैं जिसके चलते इस समाज में कभी-कभी विरोध के स्वर भी गूँजते हैं, परंतु इनसे निपटने में पुरुषों के साथ स्त्रियॉं द्वारा कंधा मिलकर निभाई कर्तव्य पूर्ति ने न केवल पुरुषों को बल दिया है अपितु इस समाज को भी नारी गर्व की गाथा सुनने पर मजबूर कर दिया है|

आज मेरा ये लेख भारत की उन वीरांगनाओं को समर्पित है जिन्होने अपने कृत्यों द्वारा न केवल भारत की माटी को धन्य किया अपितु अपने ऋणों के तले सारे भारतीय जनमानस को समावेशित कर लिया जिसे न केवल समकालिक इतिहास सँजोता है अपितु आने वाला इतिहास भी उनकी गाथाएँ सुनने के सपने देखता है|

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसमे बसे वीरों का लोहा तो पूरी दुनिया मानती है और इसी कड़ी को आगे ले जाती हैं हमारी भारतीय वीरांगनाएँ जिनके शौर्य और बलिदान ने देश को नयी दिशा दी है| हम सभी जानते हैं कि हमारा राष्ट्र भारत दुनिया का एक ऐसा देश है जिसे सबसे ज्यादा विदेशी आक्रांताओं का न केवल सामना करना पड़ा अपितु एक लंबे समय तक गुलामी की जंजीरों में भी जकड़े रहना पड़ा| इन जंजीरों को तोड़ने में भारत के वीरों का अगर किसी ने साथ दिया तो वो थीं भारतीय वीरांगनाएँ जिनके अदम्य शौर्य और साहस की तेजस्विता ने बुलंदी की एक नई तस्वीर दुनिया को दिखाई| इन वीरांगनाओं ने ये सिद्ध किया कि "महिला सशक्तता (Women Empowerment)"  मात्र एक शब्द नहीं ये एक भावना है जिसपर भविष्य में आने वाले स्त्री समाज को चलना ही होगा|


इस कड़ी को जोड़ने वाली वो वीरांगनाएँ जिन्होने अतीत बदलकर भविष्य सँवारने की पहल की उनमे प्रथम नाम जो आता है वो है कित्तूर की रानी "चेन्नम्मा" का जिन्होने 1857 गदर से 33 वर्ष पूर्व ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय नारी के सशक्त इरादों को प्रस्तुत किया था| दूसरा नाम “रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmi Bai)” का है, जिनकी शख्सियत और अप्रतिम शौर्य की गाथाएँ आज भी पूरा हिंदुस्तान गाता है| इस कड़ी में अगला नाम है "बेगम हज़रत महल" का, जिन्होने तो धर्म की विभेदकारी दीवार ढहाकर अपनी सूरता दिखाई थी| शौर्य गाथा की ये कहानी यहीं नही रुकती, ये चरम पर तो तब पहुंची जब आयरलैंड की "Annie Besant" ने अपने उसी देश के खिलाफ होकर हमारे राष्ट्र का साथ दिया जिसमे वो जन्मी थीं| इन कड़ियों में अन्य नाम जो हैं वो हैं "महारानी पद्मिनी", "रानी दुर्गावती", "रानी कर्णावती", "महारानी तपस्विनी", "पन्ना धाय", "भीकाजी कामा", "सुचेता कृपलानी", "सरोजिनी नायडू", "अरुणा आसफ अली", "कमला नेहरू", "अमृता देवी", "डॉक्टर लक्ष्मी सहगल", "दुर्गाभाई देशमुख", आदि| इनके नामों की लंबी सूची इस बात का आंकड़ा उपलब्ध कराती है कि भारत कि माटी ने न जाने कितने अनमोल नगीने जन्मे थे और ये सिलसिला आज भी कायम है और इसी भारत के इतिहास में भारतीय वीरांगनाओं से जुड़े पन्ने नित-प्रतिदिन जुड़ते जा रहे हैं|

अंत में मैं बस यही कहूँगी कि धन्य है ये माटी जहां के शौर्य और साहस की दास्तान पूरी दुनिया को स्तब्ध करने का माद्दा रखती है| नमन है मेरा देश की धरती में जन्में इन माँ भर्ती के वीर सपूतों और वीर सुपुत्रियों को जिनके बलिदानों के कर्ज तले भारत सदैव ऋणी रहेगा|


                                    जय हिन्द, जय भारत...

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

दम तोड़ती इंसानियत (Humanity)...



सिसकती है ये धरती क्यूँ,

सिसकता आसमां क्यूँ है|

भुलाकर प्यार की भाषा,

सुबकता ये जहां क्यूँ है||

सुबकता ये जहां क्यूँ है…

            ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)              

 आज एक बार फिर मन अपने इर्द-गिर्द घटी घटनाओं से अशांत है, न जाने क्यूँ ये हो रहा है, जैसे विचार विद्युत सी तीव्र गति लिए एक-एक कर कौंधते जा रहे हैं और मन की व्याकुलता लेखनी को रोके जा रही है, फिर भी अपने अन्तर्मन की पुकार को आप सबसे बांटने की इच्छाशक्ति ने मुझे ये लेख लिखने पर विवश कर दिया|

 इर्द-गिर्द घटी ये घटनाएँ हमारे अंदर रोष (Wrath) पैदा कर रही हैं और ऐसा एक बार नही हो रहा बार-बार हो रहा है जिससे न केवल कोई एक देश अपितु इस धरा (Earth) पर मौजूद अनेकों देश मानव प्रदत्त विध्वंसात्मक गतिविधियों के दंश को झेल रहे हैं और इनसे उठी भयावहता की ज्वाला में अगर कोई एक चीज दम तोड़ रही है तो वो है इंसानियत (Humanity) जिसे हम चाहे जिस नाम से बुला लें| ऊपर वाले ने इतनी खूबसूरत दुनिया बनाई है, उसे तरह-तरह के रंगों से सजाया है और उसके बाद इसे संचालित करने का दायित्व स्वयं के माध्यम से हम मानवों को सौंपा है और हमने क्या किया है, इसे क्रूरता के पैरों तले रौंद दिया है| क्या हो रहा है? और किस लिए हो रहा है? हम सभी जानते हैं कि सब कुछ नश्वर है (नष्ट होने वाला है)| फिर क्यों हम खुद उसे नष्ट करने पर आमादा हैं? क्या ऐसा नही हो सकता इस धरती पर सभी सब कुछ भूलाकर सिर्फ और सिर्फ इंसानियत को कायम रखें|


इसी इंसानियत के साथ सृष्टि की अनमोल कृति इंसान एक दूसरे को समझे क्यूंकी प्रकृति जब सब मिटाने पर आमादा होती है तो उसे हम नही रोक सकते, परंतु इंसान प्रदत्त विनाश को रोकना तो हम इन्सानों के हाथ में ही है| तो फिर हम क्यूँ रौंद रहे हैं इंसानियत को? आइये हम सब मिलकर एक नयी दुनिया बनाएँ... 

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य का मंचन करती वसंत पंचमी और सरस्वती प्रकट्योत्सव की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें !!!



प्रकृति का नैवेद्य है ये, धरा का श्रृंगार है | 
रूप ज्योति से सजा ये, रंगो भरा त्यौहार है ||
शीत-ऋतु का अंत है ये, वसंत का आगाज है |
हम कहेँ या ना कहें, ये पर्व ऋतुराज है ||
                     ये पर्व ऋतुराज है…
         ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)




शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

हिंदी सिनेमा (Bollywood): युग परिवर्तनकारी समाज का प्रतिनिधि





अभी हाल ही में आयी उरी (URI- The Surgical Strike), मणिकर्णिका- (Manikarnika- The Queen of Jhansi), ठाकरे (Thackeray) जैसी फिल्में और उनकी सफलता ने एक बार फिर हमें ये सोचने पर विवश कर दिया है कि भारतीय हिंदी सिनेमा कला प्रस्तुति की एक ऐसी विधा है जो समाज के प्रत्येक वर्ग पर अपनी अमिट छाप छोड़ पाने में पूरी तरह सक्षम है  फिर चाहे  वो कला फिल्में हों या फिर कमर्शियल फिल्में|

आज हम जब कभी भी किसी फिल्म को बड़े पर्दे पर देखकर आते हैं तो हम हमेशा ये महसूस करते हैं कि उस फिल्म के संवाद (Dialogue), उसके किरदार (Character), उसके गीत (Song) कुछ दिनो तक हमारे अन्तर्मन को झंकृत करते रहते हैं और ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि इन फिल्मों को देखते समय हम अपने आप को इनसे आंतरिक (Internal) रूप से जोड़ लेते हैं, ऐसे मे ये कहना गलत न होगा कि फिल्में अगर साफ-सुथरी और समाज को आईना दिखाने वाली हों तो वो समाज के लिए बदलते दौर का कारक (Cause) बन जाती हैं|

सन 1913 में "राजा हरिश्चंद्र" पर बनी मूक फिल्म को हिन्दी सिनेमा की प्रथम फिल्म होने का श्रेय प्राप्त है| मूक फिल्म होते हुए भी इसने लोगों पर अपनी इतनी अमिट छाप छोड़ी कि सिने विशेषज्ञों को इस बात का एहसास हो चला कि ये सोच भारत के समाज को एक नया मार्ग दिखाने में जरूर सफल होगी क्यूंकी वो वक्त ब्रिटिश शासन की गुलामी का था, इसलिए देशभक्ति और सामाजिक विषयों से परे धार्मिक विषयों पर ज़्यादातर फिल्में बनाई जाती थीं परंतु एक लंबे संघर्ष के बाद सन 1947 मे मिली आजादी के उपरांत बनी देशभक्ति की फिल्मों ने नए भारत के नव-निर्माण में अपनी सराहनीय भूमिका निभाई| इस दौर मे आई "जागृति", "अछूत कन्या", "बंदिनी", "दो आँखें बारह हाथ" जैसी फिल्मों ने भारतीय आम जनमानस की सोच में युग परिवर्तनकारी बदलाव के बीज रोपित किए, इसके बाद लगातार बनी रोमांटिक फिल्में भी किसी न किसी संदेश को लेकर भारतीय समाज और इसके जनमानस के बीच आती रहीं और बदलते वक्त के साथ बदलती रहीं|

आज के दौर में भी ये समाज को आईना दिखा पाने में पूर्णतया तो नही परंतु आंशिक रूप से जरूर सफल रहीं हैं| फिल्म कॉकटेल (Cocktail) में लिव इन रिलेशनशिप (Live In Relationship) तो विवाह (Vivah) जैसी फिल्मों में नायक के एक स्त्री के प्रति सम्मान को बखूबी प्रदर्शित किया गया है, वहीं दूसरी ओर वीरजारा व बजरंगी भाई जैसी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के बीच के अनछुए व अनदेखे पहलूओं को प्रदर्शित कर जनमानस तक सीधे शब्दों में पहुंचाया गया है|

ऐसे मे जीवन के प्रत्येक उतार-चढ़ाव में अपनी संगीतमय और सोच से परिपूर्ण विचारधाराओं के सामंजस्य को लेकर सहारा बनी ये फिल्में वाकई युग परिवर्तनकारी समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं| फिर वो चाहे देश के महापुरुषों पर बनी फिल्में ("सुभाष चंद्र बोस, गांधी, विवेकानंद) हों या फिर आम जनमानस के किरदारों (2.0 में पक्षी विशेषज्ञ पक्षी राजन का किरदार निभाते अक्षय कुमार और "दो दूनी चार" में एक अध्यापक का किरदार निभाते ऋषि कपूर) को प्रदर्शित करती फिल्में भारत के लोगों के साथ भारतीय समाज के लिए भी अच्छे बुरे का ज्ञान दर्शाती हैं| ऐसे में भारत और भारत के लोगों का हिन्दी सिनेमा के प्रति ये जुड़ाव सामाजिक समरसता की एक अद्भुत मिसाल है| 
                                        जय हिन्द जय भारत...