भारत सृजन का वो रूप अनुपम था
कहते हैं किसी लेख में प्राण वायु तभी उपजती है जब उसे पढ़ने वाले सच्चे पाठक मिल जायें| मेरी लेखनी को भी दरकार इसी भावना की थी लिहाजा मानवीय जीवन के इर्द-गिर्द हो रही समग्र प्रेरक और अंतर्मन को उद्द्वेलित कर देने वाली घटनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के अन्य जनों तक पहुंचाने की आकांक्षा ने मुझे ये ब्लॉग लिखने की प्रेरणा दी|
रविवार, 3 फ़रवरी 2019
अदभुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला
भारत सृजन का वो रूप अनुपम था
रविवार, 27 जनवरी 2019
क्यूँ बोझ बन गयी है नौकरी पेशा जिंदगी ...?
शनिवार, 26 जनवरी 2019
रविवार, 20 जनवरी 2019
तेज रफ्तार जिंदगी का पंख बना - ड्रोन (Drone)
शनिवार, 19 जनवरी 2019
जीवनदायी जल की कीमती बूंदें...
नीर हूँ मैं नीर हूँ…
सृष्टि में सर्वत्र हूँ
पर प्रयोग में विभेद हूँ ।
जीव का मैं मूल हूँ
पर जीव से ही दूर हूँ ॥
मेरे है ये वेदना
मुझको होगा रोकना ।
वरना मैं लुप्त हूँ
क्यूंकि मैं नीर हूँ...
क्यूंकि मैं नीर हूँ...
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
नीर अर्थात “जल” धरा पर ईश्वर द्वारा मानव जीवन को सौंपी
गयी एक ऐसी भेंट है जिसके बिना हम अपने इस अमूल्य जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते| आज मैंने
परिचर्चा के लिए जल को इसलिए चुना क्योंकि इस बर्फीली सर्दी में भी जब मैंने
महानगरों की ऊँची इमारतों की ओर नजर दौड़ाई तो मुझे इन गगनचुम्बी इमारतों के आगे
टैंकरों से जल चढाती पाइपों की अनगिनत संख्या दिखाई पड़ी, क्या कर दिया है? हमने अपनी इस धरती का कि बिना मूल्य दिए उपयोग में लाये
जाने वाले जल को हम आज मूल्य चुकाकर क्रय कर रहे हैं| अभी तो शायद इतनी देर नहीं हुई लेकिन अगर अब भी हम और आप
नहीं चेते तो जीवनदायी ये जल मूल्य चुकाकर भी हमें नहीं मिल पायेगा| अपनी चेतना को
अगर हम शहरों के दायरे से निकालकर ग्रामीण इलाकों की ओर ले जाते हैं तो स्थिति और
भी भयावह हो चुकी है जहाँ उपयोगी जल की कमी फसलों के साथ-साथ मानव जीवन को भी लील
रही है|
हमारी धरती पर वैसे तो नमकीन पानी के महासागरों के रूप में 97% जल है और केवल 3% ही हमारे उपयोग
के लायक है, परन्तु मानव
जीवन के लिए उपस्थित ये 3 % जल भी लगातार
हो रहे प्रकृति दोहन के चलते हमसे दूर होते जा रहे हैं जिसका सीधा संकेत हैं जमीन
के अंदर भी जल का गिरता भू स्तर जो हम सभी के लिए चिंताजनक है|
शायद हममें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो इन आकड़ों से अवगत न
हो और इतना ही नहीं इस समस्या के समाधान से भी सभी परिचित हैं कि ईश्वर प्रदत्त वर्षा जल
को संचित कर व अपनी धरती को प्रदूषण से मुक्त कर हम जल को बचा सकते हैं| हम सब में से
बहुत से लोग ऐसा कर भी रहे हैं
वो प्रकृति को इस कमजोर स्थिति से उबारने में लगे हैं परन्तु जब तक हमारे राष्ट्र
का प्रत्येक नागरिक जल बचाओ अभियान से नहीं जुड़ेगा तब तक दिन प्रतिदिन भयावहता की
सीमा लांघ चुकी इस समस्या का समाधान नहीं हो सकेगा|
मैं ये नहीं
कहती कि हम सभी वर्षा जल संरक्षण करना शुरू कर दें परन्तु अगर हम अपने-अपने घरों
में जल का आवश्यकतानुसार प्रयोग शुरू कर दें तो इतना ही काफी होगा हमारे योगदान के
लिए और मुझे उम्मीद है कि हमारी ये छोटी कोशिश रंग जरुर लाएगी क्योंकि वर्तमान
स्थिति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि जल की कमी से न केवल हमारा देश अपितु
विश्व के अधिकांशत: भाग छद्म लड़ाई लड़ रहे हैं| ऐसे में मेरी और आप की आज उठी एक पहल आने वाले भविष्य के
लिए जरूर एक सार्थक प्रयास सिद्ध होगी|
गुरुवार, 10 जनवरी 2019
हिन्दी की गौरवगाथा का सफरनामा___विश्व हिन्दी दिवस विशेषांक
आज "विश्व हिन्दी दिवस" है, सोचकर ही कितने गर्व का ही अनुभव प्राप्त हो रहा है और हो भी क्यों न आज हम सब की मातृ भाषा "हिन्दी" के सम्मान का दिन जो है| अब लगता है कि हम वाकई आजाद हैं क्योंकि सन 1947 के बाद मिली आजादी ने तो हमें सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई थी उनके द्वारा दी गयी अंग्रेजी भाषा की गुलामी मे तो हम सब अभी तक जकड़े थे, हालांकि भारत में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली हमारी मातृ भाषा हिन्दी को 14 सितंबर 1949 को ही राज भाषा का दर्जा मिल गया था परंतु एक लंबे समय तक अंग्रेजी शासन के चलते हमारी भाषा को अहमियत थोड़ी देर से मिली फिर भी आजादी बाद आए इस बदलाव ने लगभग 72 वर्षों का समय अवश्य लिया परंतु हमारे भारत वंशियों के विदेश प्रवास के चलते हमारी ये भाषा राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छा गयी|
शनिवार, 5 जनवरी 2019
वो भारत देश था मेरा......ये भारत देश है मेरा
सोमवार, 31 दिसंबर 2018
आप सभी को नव वर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनाएँ
जीवन की इस मधुरिम बेला मे, आप सभी का स्वागत है |
छोड़ गया है साल पुराना, अमिट धरोहर यादों की
नये वर्ष ने पाँव पसारा, लेकर उम्मीद मुरादों की ||
शनिवार, 29 दिसंबर 2018
नर नारी के बीच समानता इस मानव निर्मित समाज की अनिवार्यता क्यूँ?
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018
भारत के अतीत का गौरवशाली इतिहास: मात्र महिमामंडन या हकीकत
रविवार, 16 दिसंबर 2018
वृद्धों का तिरस्कार: युवा पीढ़ी की मंशा या मजबूरी
रविवार, 9 दिसंबर 2018
क्यूँ दूर हो गए हम संयुक्त परिवार की धारणाओं से?

छूट
गए सब रिश्ते नाते |
टूट
गया वो बना घरौंदा ||
कुछ
रिश्तों की डोर संभाले |
जाने
हम आ गए कहाँ ||
जाने
हम आ गए कहाँ…
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
21वीं सदी मे दस्तक दे चुकी मानवीय सभ्यता को खुद मानव निर्मित इतिहास ने इतना कुछ दिया था कि उन्ही पर हम अपना भविष्य संवार रहे हैं| आज हम सभी आगे बढ़ने और समाज मे एक मुकाम हासिल करने की प्रतिस्पर्धा मे जुटे हैं पर जब इन सब से परे होकर कभी शांत चित्त से अकेले मे बैठते हैं तो हमारा मन वही पुराने शोरगुल के लिए तड़पने लगता है जो कभी हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, ताई-ताऊ, भाई-बहन आदि जैसे अनगिनत रिश्तों के बीच मिलता था, इतनी हलचल… के बावजूद दिल मे सुकून था जो आज की इस आपा-धापी मे कहीं खो गया है|
पहले
भी इस धरा पर रहने वालों को दिन-रात के चौबीस घंटे ही मिलते थे और आज भी उतने ही
मिलते हैं फिर भी वो कम ही लगते हैं क्योंकि हमने अपने आप को काम के सिलसिले मे
इतना व्यस्त कर लिया है जिसके चलते परिवारों को छोड़ हमने अपनी अलग दुनिया बना ली
है और परिवारों से अलग होने पर मिले इसी एकाकीपन के चलते स्ट्रेस, डिप्रेशन जैसी
लाइलाज बीमारियों ने हमें अपना शिकार बना लिया हैं|
क्या कभी हम सब ने ये सोचा है कि हमें ऐसा क्यों महसूस होता है? तो उत्तर है- सोचा तो हम सभी ने पर अब चीज़ें हमारे एकाधिकार से बाहर हो चली हैं, शायद सत्यता भी यही है कि हमारे मन के कोने मे आज भी संयुक्त रूप से जुड़े परिवारों की परंपरागत यादें हिलोरें तो मारती हैं पर हम सब ने खुद अपने को उनसे दूर कर रखा है ऐसे मे अब हमें खुद ही आगे आना होगा ताकि जो हमें न मिला वो हम अपनी भावी पीढ़ियों को तो दे सकें|
रविवार, 2 दिसंबर 2018
आखिर हमने जहरीली क्यों कर दी हैं हवाएं?
हवाएं भी न कुछ ख़ास हैं ||
न जाने क्यों हमीं ने ही |
बदल दी है तस्वीर धरती की ||
स्वर्ग सी हो यही धरती |
गगन भी श्वेत स्यामल हो ||
हवाओं का भी रुख बदले |
फिजाएँ भी तो निर्मल हों ||
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली से
आयी इस खबर ने कि -"यह स्वास्थ्य की आपात
स्थिति है, क्योंकि शहर व्यवहारिक रूप से गैस चैम्बर में बदल
गया है" ने हम सभी को एक पल के लिए ही सही ये सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया कि
अगर हवाओं में घुले इस जहर की आज ये स्थिति है तो आने वाले समय में क्या होगी? और हमारे सामने जी
रही नयी पीढ़ी का क्या होगा-वगैरह-वगैरह...
जब कभी भी कोई समाचार हमारे देश या हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा मिलता है तो हम एक पल के लिए ही सही काफी जागरूक हो जाते हैं पर अगले ही पल उसी के विरुद्ध कार्य करने में कोई कसर नहीं छोड़ते शायद ऐसा ही कुछ हमने अपने पर्यावरण के साथ भी किया है जिसका खामियाजा आज शुद्ध हवा के लिए तरसती हमारी एक-एक साँसों को भुगतना पड़ रहा है|
हमने विकास और आधुनिकता की चाह में पूरी पृथ्वी को ही असंतुलन की भेंट चढ़ा दिया है| हम मानवों की महत्वाकांक्षाओं की असीमित सीमाओं ने अगर कभी कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित भी किया तो अगले ही पल हमारे मन में पलते लालसा के भाव ने हमें पीछे धकेल दिया|
आज हमारे समाज में बहुत सारे संगठन, सरकार सभी पर्यावरण प्रदूषण की भेंट चढ़ती प्राण-वायु (ऑक्सीजन) को संभालने में लगे हैं, ऐसे में इस समाज से जुड़े होने के नाते हम सभी का ये कर्तव्य बनता है कि इनकी इस पहल में हम इनका साथ दें और अपनी धरा को जहरीली हवा के दमघोंटू आवरण से मुक्त करायें ताकि न केवल हम अपना वर्तमान सवारें अपितु अपनी पीढ़ियों को सौपें जाने वाले भविष्य के संरक्षक का दायित्व भी बखूबी निर्वाहित कर सकें|
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मिटाये से न मिटेगी कभी साख भारत की झुकाये से न झुकेगी कभी शान भारत की | बदल दे इतिहास के रुख को वो है पहचान भारत की || वो है पहच...
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दोस्तों , जैसा कि हम सब ये देख रहे हैं कि Corona नाम के एक छोटे से विषाणु ( Virus) ने अचानक देखते-देखते किस प्रकार Globalization क...
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दे रही संदेश ये सृष्टि , पाप का अब नाश हो । ऐसे में अब इस धरा पर , आपका पुनर्वास हो । सो रही माया कहीं , जीवन कहीं ओझल पड़ा ।...
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दोस्तों , आज मैं आप सभी से जिस संवेदनशील विषय पर बात करना चाहती हूँ वो न केवल इस धरती से जुड़ा है अपितु ये वो चेतावनी है जो पृथ्वी क...
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ये तेरा है… ये मेरा है , बस इसी मानवीय सोच के कारवां का एक मूर्त रूप है सरहद जिसके मायाजाल ने आज सम्पूर्ण विश्व ...









