अपने लेखों की शृंखला
को पुनः प्रारम्भ करने से पूर्व मैं आप सभी को देश के महान लोकतान्त्रिक
उत्सव के सकुशल सम्पन्न होने और हमारे राष्ट्र भारत में एक बार फिर लोकतान्त्रिक सरकार
के निर्वाचित किए जाने की बहुत-बहुत बधाई देती हूँ, साथ ही दुनिया
के इस महान लोकतान्त्रिक देश के समक्ष स्वयं को नतमस्तक करती हूँ क्योंकि इस राष्ट्र
ने हम सब को न जाने कितना कुछ दिया है, परंतु बदले में वो सिर्फ
हमसे इस राष्ट्र के प्रति उस प्रेम का समर्पण चाहता है जिसमें माँ भारती के सभी बच्चे
एक साथ विविधता के रंगों से निकलती सुनहरी किरणों से एक दूसरे को देदीप्यमान करते हुए
सामाजिक समरसता की भावना में लिप्त रहें और इस राष्ट्र की उन्नति का मार्ग प्रशस्त
करते रहें|
कहते हैं किसी लेख में प्राण वायु तभी उपजती है जब उसे पढ़ने वाले सच्चे पाठक मिल जायें| मेरी लेखनी को भी दरकार इसी भावना की थी लिहाजा मानवीय जीवन के इर्द-गिर्द हो रही समग्र प्रेरक और अंतर्मन को उद्द्वेलित कर देने वाली घटनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के अन्य जनों तक पहुंचाने की आकांक्षा ने मुझे ये ब्लॉग लिखने की प्रेरणा दी|
रविवार, 26 मई 2019
रविवार, 19 मई 2019
देश प्रगति में बाधक बनी सामाजिक समस्याओं का समाधान अनिवार्य है
जिद हो बदलने
की,
बदल सकता जहां
ये है।
अगर दृढ़ हों
इरादें तो,
संवर सकता जहां
ये है॥
चलो मिलकर सजाएँ
हम,
नया भारत बनाएँ
हम।
नया भारत बनाएँ
हम…
हमारा राष्ट्र
भारत(India) जिसका तिरंगा(National Flag) जब दुनिया के किसी भी कोने
में फहराया जाता है, तो ये भारतीय के मन को झंकृत कर जाता है
और ऐसा हो भी क्यों न, क्योंकि हम सब की शान है हमारा तिरंगा, जो न केवल हमारे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है अपितु हम 120 करोड़ भारतवासियों
को भी प्रस्तुत करता है। गर्व होता है हमें अपने देश की उपलब्धियों
को देखकर, फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र से क्यों न हों, लेकिन हम सब ये जानते हैं कि हमारी ये कामयाबी हमें एक दिन में नहीं मिली
है, कैसे और कितना कुछ न्योछावर करके हमारे राष्ट्र ने आज ये
मुकाम हांसिल किया है। एक तरफ हमारे राष्ट्र की प्रगति, हमारे मस्तक को गर्व से ऊंचा करती है तो वहीं दूसरी ओर प्राचीन काल से चली
आ रही कुछ कुरीतियों के साथ कुछ आधुनिक समस्याएँ भी हमारे भारतीय समाज में व्याप्त
हैं, जो हमें ये सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि यदि हम सभी अपने
राष्ट्र को और ऊंचाई पर देखना चाहते हैं तो हमारे समाज का समग्र विकास इसके लिए अत्यंत
अनिवार्य है।
आज हम सभी 21वीं सदी में जी रहे हैं और
इस आधुनिकता से भरे वातावरण में भी बहुत सी समस्याएँ अपना फन फैलाये भारत राष्ट्र की
उन्नति को रोकने के लिए तैयार बैठी हैं, जिनका समाधान हम सब
को मिलकर ही करना होगा, क्योंकि जिस दिन समाज का प्रत्येक व्यक्ति
इससे निपटने का जिम्मा संभाल लेगा उस दिन अवश्य ही ये परिवर्तन हमारे राष्ट्र को परिवर्तित
कर देगा और ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रही कि हम अकेले कुछ नहीं कर सकते, इतिहास गवाह है कि सती प्रथा जैसी भयावह कुरीति को समाप्त करने वाले राजा
राममोहन राय भी अकेले ही थे जिन्होने ऐसा किया, फिर हम क्यों
नहीं? इस आधुनिक काल में जहां पूरी दुनिया चाँद पर पहुँचने का
ख्वाब सजा रही है वहीं हमारे भारत में आज भी प्राचीन परम्पराओं का पालन करते हुए बाल
श्रम(child labor), महिलाओं के साथ भेदभाव(women
inequality), भ्रूण हत्या(foeticide), बाल विवाह(child
marriage), दहेज प्रथा(dowry custom), जातिवाद(casteism) व अंधविश्वास(superstition) जैसी कुरीतियों के साथ कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं
जिनसे निपटने के लिए तो समाज के हर व्यक्ति हो आगे आना होगा और राष्ट्र के प्रति अपने
दायित्व का निर्वाह करते हुए इस राष्ट्र में साफ-सफाई लानी होगी, साक्षारता को और बढ़ावा देना होगा, मदिरापान(Drinking) और अपराध(crime) को नियंत्रित करना होगा, भूखमरी(Starvation) और गरीबी(Poverty) के लिए समूहगत होकर गावों से लेकर शहरों की गलियों तक संस्थानों और सरकारों
की मदद के लिए आगे आना होगा क्योंकि ये सारी चीजें जब एक साथ बढ़ेंगी तभी हमारा राष्ट्र
इन समस्याओं से मुक्त होगा| तो मात्र लेखन-पठन तक न रुककर हम
सभी अपनी क्षमतानुसार इस मुहीम को अपना हिस्सा बनाएँ और राष्ट्र के प्रगति के साक्षी
बनें।
जय हिन्द
जय भारत...
रविवार, 12 मई 2019
विविध धर्मों की आंतरिक खूबसूरती ही तो जीने की कला सिखाती है.....
धर्म (Religion) एक ऐसा मसला है जिसपर पूरी दुनियाँ में एक नहीं हजारों बार हिंसक प्रदर्शन हो चुके हैं लेकिन शायद जब कभी भी किसी धर्म के नाम पर हम ऐसा करते हैं, हम भूल जाते हैं कि वास्तव में धर्म एक ऐसी खूबसूरत सी- डगर है जिसपर चलकर इस समाज को एक बार नहीं न जाने कितनी बार सही दिशा का ज्ञान भी प्राप्त हुआ है, तो ऐसे में हमें मात्र इसके खूबसूरत पहलू को लेकर न केवल चलना चाहिए अपितु उसी को आगे भी बढ़ाना चाहिए| सदियाँ गवाह हैं कि मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही मनुष्य के सांस्कृतिक विचारों (Cultural thoughts) ने भी जन्म लेना प्रारम्भ कर दिया और जिसके फलस्वरूप इस संसार में अनेकों धर्मों और मतों ने जन्म लिया और जिसके फलस्वरूप धीरे-धीरे ये दुनियाँ रंगीन और खूबसूरत हो गयी क्योंकि इंसान के विकसित स्वरूप के साथ जहां धर्म और मत आए वहीं दूसरी ओर आया अनेकों तरह के सांस्कृतिक (Cultural), आर्थिक (Economical), राजनीतिक (Political) और सामाजिक (Social) व्यवहारों के आदान प्रदान की क्रियाओं (actions) और प्रतिक्रियाओं (Reactions) का दौर, जिन्होने अतीत से लेकर वर्तमान तक सिर्फ और सिर्फ मानव जीवन को संवारा है| ऐसा कहना इसलिए भी यथार्थ (Equitable) हो जाता है क्योंकि एक बारगी हम अपने मन को स्थिर कर बस इतना भर सोचें कि जिस समाज को कई सारे परिवार मिलकर निर्मित करते हैं उनमें से प्रत्येक परिवार अलग-अलग धर्मों से भी आते हैं यानि हर परिवार में अपने बच्चों को धर्म की सही तालीम, सही खूबसूरती कितनी बारीकी से पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जाती है जिनके आधार पर एक सशक्त व्यक्ति का जन्म होता है जो इस समाज को एक नयी दिशा देने में अपनी अहम भूमिका निभाता है|
आज मैंने धर्मों
की इस खूबसूरती का ताना-बाना इसलिए बुना है क्योंकि मैंने इन चीजों को खुद महसूस किया
है कि कैसे एक माँ अपने बच्चे को विविध धर्मों की अच्छी सीखों का पाठ पढ़ाती है ताकि
उसका बच्चा आने वाले भविष्य में सुसज्जित इंसान का आकार प्राप्त कर सके और इतना ही
नहीं कैसे दुनिया भर के विविध धर्मों से जुड़े लोग जब कोई त्योहार मनाते हैं तो उसकी
गूंज हर किसी के कानों में पड़ती है, कितना अच्छा लगता है
खुशियों के वाहक, धर्म की मर्यादा को बढ़ाना..... जो केवल रोचक(Interesting) ही नहीं अपितु अंतहीन(Endless) भी है|
जो जिस नजरिए
से देखता है उसे धर्म की परिभाषा वैसी ही नजर आती है, यदि हम धर्म के कुछ विशिष्ट पहलुओं पर जाएँ तो हमें बस इसी चीज का ज्ञान होगा
कि धर्म वास्तव में एक ऐसी विधा है जो संसार के विभिन्न समूहों(Groups) को तैयार तो करती है
परंतु मात्र इसलिए कि जब ये समूह आपस में जुड़ें तो अपनी अच्छाइयों से एक दूसरे को लाभान्वित
कर सकें क्योंकि केवल एक चीज पूरी तरह परिपक्व कभी नहीं होती शायद इसीलिए इन अच्छाइयों
के विभाजन से जो खूबसूरती निकलती है वही तो हमें जीने की कला सिखाती है|
Happy Mother's Day
माँ और
उसकी ममता विधाता द्वारा रचित सृष्टि की ऐसी अनमोल कृति जिसने इस संसार को सदैव अपने
आँचल से सिंचित और पल्लवित किया है,
आज उसी माँ के शुभकामनाओं भरे दिन के सुअवसर पर दुनियाँ भर की माँओं के चरणों का वंदन
करती मेरी कुछ पंक्तियाँ:
ममता
से रची है ये,
दुनिया
खूबसूरत सी|
जो
बरसी है नियामत बन,
किसी
बगिया के फूलों सी||
कहीं
आंचल से छलकी है,
कहीं
नैनो से बरसी सी|
ममता
से रची है ये,
दुनिया
खूबसूरत सी…
स्वरचित: रश्मि श्रीवास्तव
(कैलाश कीर्ति)
शनिवार, 4 मई 2019
दिल दलहलाने वाले घटनाक्रमों से आहत मानव-जीवनधारा
पिछले
हफ्ते पूरी दुनिया से जिस तरह के दिल दहलाने वाले घटनाक्रम हम सबके सामने आए, उन सब से हमारा मन आहत तो होता ही है और हम ये समझ नहीं पाते कि ऐसा
क्यों हो रहा है? वैसे तो जब भी हम समाज में अपने इर्द-गिर्द
नजरें दौड़ाते हैं तो न जाने कितने घटनाक्रमों से हमारा सामना होता है जो न केवल
अप्रिय होती हैं अपितु हमारे दिल को भी एक अंजाने भय से दहला जाती हैं|
आज जब कभी
भी मैं अपने देश के अप्रिय समाचारों से नजरें बचाने के लिए दुनिया के गलियारों में झाँकती हूँ, तो वहाँ भी मुझे वही नजारा देखने को मिलता है जो
मानव-जीवनधारा को ही रौंदने पर आमादा है और जिसके घटित होने के पीछे कोई अदृश्य
ताकत नहीं बल्कि स्वयं इंसान ही है जिसकी बुद्धिमत्ता का लोहा पूरी दुनिया मानती
है| न जाने ऐसा क्यों हो रहा है, इसका
उत्तर ढूंढते-ढूंढते हम सब भले थक जाएँ पर इन घटनाक्रमों को अंजाम देने वाले
नहीं थकते और जिसका परिणाम हैं ये दिल दहलाने वाली घटनाएँ!!!
ये कैसी लड़ाई है? और
किसके विरुद्ध है? कुछ समझ ही नहीं आता, माना कि इंसानी फितरत में लड़ाई भी शामिल है लेकिन वो मात्र स्वस्थ् प्रतिस्पर्धा के लिए है न कि मानव जीवन का ही गला घोटनें के लिए| अभी पिछले हफ्ते श्रीलंका (Sri Lanka) में जो कुछ हुआ, उसने
मन को इतना आहत किया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? जिस बुद्ध
कि धरती से दुनिया के लिए शांति संदेश निकलना चाहिए वहाँ न जाने कितने निर्दोषों
ने अपने ईश को पूजते-पूजते अपनी जान गवां दी, दिल दहल
गया कि आखिर कब बंद होगा ये सब? वहीं दूसरी ओर भारत (India) सहित दुनिया के अन्य देशों अमेरिका (US), ऑस्ट्रेलिया (Australia) और
लीबिया (Libya) से भी मानव धन की कीमत पर हांसिल की जा रही जीत अन्तर्मन को अंदर तक छलनी
कर देती है|
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है| आज न जाने कितने वर्षों से ये सब हो रहा है, बस
अब तरीका बदल गया है और डर लगता है इससे कि कहीं ये तरीका मानव जीवन के वजूद को ही
न खत्म कर दे| वैसे तो हमारे पड़ोस में किसी के द्वारा
की गयी आत्महत्या जैसी घटना भी हमारे दिल को दहलाने के लिए पर्याप्त होती है फिर
ऐसे में इतनी बड़ी घटनाएँ हमें कुछ दिनों, कुछ सालों के
लिए सकते में डाल जाती हैं|
कभी-कभी तो
मन सोचता है कि हमारी इस दुनिया में इतना भटकाव क्यों है? क्या ये कारवां यूं ही चलता रहेगा या इसमें कुछ बदलाव भी कभी आएगा? क्या आप सब को यह नहीं लगता कि एक बार फिर इस धरती पर महात्मा बुद्ध और
महावीर जैन जैसे शांति दूतों का आगमन नहीं होना चाहिए? आखिर हम
सबके इस धरती पर होने का मतलब क्या है? हम क्यों विवश होते
हैं एक खुशनुमा जिंदगी के स्वप्न से परे होने को? क्या इस
धरती पर समस्याएँ कम हैं, जो इस धरती पर हम इंसान क्षण प्रति क्षण नयी-नयी समस्याएँ पैदा करते जा रहे हैं? ये प्रश्न एक
अनसुलझा प्रश्न है जिसका उत्तर मात्र और मात्र आने वाले भविष्य में छुपा है______________जिसकी आकांक्षा में आप और मैं दोनों हैं--------------
रविवार, 21 अप्रैल 2019
Brexit की ज़द में दुनियाई अर्थव्यवस्था
आज का
दौर भूमंडलीकरण अर्थात Globalisation का है, जहां पूरी दुनिया के लोग न केवल एक दूसरे से अपने-अपने सांस्कृतिक और धर्मिक
संस्कारों को साझा कर रहे हैं, अपितु वो आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रमों
से भी एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं| ऐसे में किसी भी एक देश
द्वारा लिया गया कोई भी एक फैसला अपने साथ जाने-अनजाने बहुत सारी चीजों को प्रभावित
कर जाता है और उन्ही में से एक मुद्दा है Brexit का, जो आज पूरी दुनिया में इसलिए भी विशिष्ट हो चला है क्योंकि अपने अमलीकरण के
प्रक्रिया के चलते ये पूरी दुनिया के अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने वाला है| ऐसा मानना है, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का जिसने इस बात की आशंका जताई है कि सन् 2019 में दुनिया की अर्थव्यवस्था
को Brexit का झटका लग सकता है|
तो आइये
आज मैं आपसे वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने वाली इसी Brexit के बारे में कुछ अहम जानकारियों को साझा करती हूँ जो हम सभी को इस घटनाक्रम
को समझने में मदद कर सके| वास्तव में ये Brexit है क्या? और इसके पीछे की कहानी क्या है, जिसने स्वयं अपनी देशी की सीमाओं को लांघकर पूरी दुनिया पर अपना प्रभाव डालने
में सफलता हांसिल कर रखी है| वास्तव में Brexit का अर्थ है कि यूरोपीय महाद्वीप में रहने के बावजूद यूरोपीय देशों के संघ
(European Union-EU) से Britain जैसा राष्ट्र बाहर निकलेगा यानि exit करेगा और ऐसा करने
का निर्णय Britain ने अपने देश के नागरिकों के EU में शामिल होने के कारण आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों में आई कमी के चलते किया
है|
Britain द्वारा EU छोड़ने
के फैसले की वकालत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री David Cameron ने 2015 के आम चुनाव
में ये बात कही थी कि अगर वो चुनाव जीतते हैं तो इसके लिए वो जनमत संग्रह कराएंगे और
ऐसा करने के लिए उनकी पार्टी लगातार दबाव बना रही थी और इस दबाव के चलते वहाँ जनमत
संग्रह हुए भी, जहां EU छोड़ने और EU के साथ रहने वालों का अनुपात 51:49
रहा था क्योंकि उनका मानना था कि अब वक्त आ चुका है कि Britain के लोगों को तरजीह दी जाये| Britain द्वारा EU से बाहर आने का फैसला अब सारी प्रक्रियाओं
से गुजर कर अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है, लेकिन world war II के बाद आर्थिक सहयोग के
गरज से EU का (यूरोपीय संघ) का निर्माण
किया गया ताकि यूरोपीय देशों की सीमाएं व्यापार में एक-दूसरे के लिए बाधक न बनें लेकिन
बदले वक्त के बाजारीकरण ने परिस्थितियाँ बदल दी हैं| स्वयं की
मुद्रा, स्वयं की संसद रखने वाले इस संघ पर लंबी चौड़ी membership fee वसूलने का दावा करने वाला Britain अब इससे बाहर आना चाहता है और ऐसा हो भी क्यों न, आज
के हालात world war II के बाद के हालत से बिल्कुल अलग हो गए हैं|
एक तरफ
जहां Britain, EU से निकलने की प्रक्रिया को तवज्जो दे रहा है, वहीं दूसरी
तरफ EU में बने रहने के लिए चीन और अमेरिका जैसे देशों
के साथ ही उसके खुद के अधीनस्थ राज्य Scotland और वहाँ
की labor party दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि Brexit की प्रक्रिया
से United Kingdom (UK) के आर्थिक मुद्दों सहित अन्य विकासात्मक मुद्दों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा
जो कहीं से भी UK और इसके नागरिकों के हित में नहीं है|
आगाज
तो शुरू है.......................................................................पर अंजाम अभी बाकी है|
क्यूंकी Brexit जैसा घटनाक्रम दुनिया की अर्थव्यवस्था को न जाने किस ओर ले जाएगा?
शनिवार, 13 अप्रैल 2019
वो सन् 1919 की 13 अप्रैल......आज सन् 2019 की 13 अप्रैल
शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले
|
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निशां होगा
||
वाकई आज भी भारत को गुलामी की बेड़ियों से
मुक्त कराकर स्वतंत्रता की नई सुबह का दर्शन कराने वाले देश के वो शूरवीर जो इस लड़ाई
को लड़ते -लड़ते अपने प्राणों की आहूति दे इस धरा से हमेशा के लिए विदा ले गये ,लेकिन
उनके कर्मो का क्षेत्र बनी भारत की इस भूमि पर आने वाली पीढ़ियां हमेशा उनके दर्द को
महसूस करते हुए अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करती रहेंगी यानि दूसरे शब्दों में हम ये
कह सकते हैं कि उनकी यादों पर श्रद्धा के पुष्प हाथों में लिये हर शहीद दिवस पर मेले
ही तो लगते ही हैं लेकिन तारीखें गवाह हैं
कि मुल्क के लिए अपने प्रेम को दर्शाने वाले शहीदों ने इसके हितों की लड़ाई लड़ते-लड़ते
अपने प्राणों को इस मातृ भूमि को अर्पित कर दिया वो भी बिना किसी गिले के|
कुछ ऐसा ही हुआ था आज से ठीक
सौ साल पहले सन् 1919 के उस मनहूस दिन जब भारत माँ को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्त
कराने का अरमा अपने दिलों में लिए न जाने कितने हिन्दुस्तानियों को कायर ब्रिटिश जनरल
डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में मौत
की नींद सुला दी थी, उस घटना को घटे आज 100 वर्ष पूरे हो गए और आज के इस सशक्त भारत
में उस दिन से लेकर अब तक कितना कुछ बदल गया है आज भारत दुनियां की महाशक्तियों में
से एक बन चुका है और उधर कभी पूरी दुनियां पर शासन करने वाले ब्रिटेन का साम्राज्य
सिमट कर एक देश तक आ गया और तो और तब से लेकर अब तक ब्रिटेन की “Thames” और भारत की
“Ganga” दोनों में न जाने कितना पानी बह चुका
है, तब जाकर आज से लगभग तीन दिन पहले भारत और इसमें रहने वाले भारतवासियों को कभी अमानवता की क्रूर भट्ठी में
झोकने वाले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री “Theresa May” ने इस घटना के प्रति पश्चाताप जताया,
वाकई ये देर से हुआ लेकिन आज भारत की जो पहचान बनी है उसके पीछे जरूर उन शहिदों की
शहादतें हैं जिनके निशां आज भी देखने वालों को इस घटना के मूक दर्शक बनी 'जलियाँवाला
बाग' की दीवारों पर मिलते हैं|
आज जब कभी भी मैं भारत की उन्नति के इस
दौर का अवलोकन करती हूँ तो मुझे एक बात स्पष्ट रूप से नजर आती है कि हमारा देश भारत
दुनिया का वो देश है जिसने न जाने कितने आघातों को झेला और न केवल पुनः उठ खड़ा हुआ
अपितु अपने होने के अस्तित्व का भी परिचय दुनिया को कराया है| मुझे गर्व है एक भारतीय
होने पर क्योंकि भारत और भारतीयता ये दोनों ऐसी भावनाएँ हैं जिसकी शक्तियों को हर वक्त
न केवल इस संसार ने बल्कि इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड ने भी महसूस किया है|
जय हिन्द, जय भारत
रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
कलयुग की अयोध्या में प्रभु राम को मिले
दूसरे वनवास को चरितार्थ करती इन पंक्तियों के साथ आप सभी को प्रभु राम के जन्म पर
रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ…
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग
तक...
कहीं राम का शंख नाद था, वहीं राम की है
अब गूंज|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग
तक...
कहीं अंत था अहंकार का, वहीं प्रतीक्षा
है अब गृह की|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग
तक...
कहीं दमन था सृजन के लिए, वहीं प्रविष्टि
पर है अब रोक|
राम-राम मय है ये धरती, त्रेता से ले कलयुग
तक...
("कैलाश
कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
रविवार, 7 अप्रैल 2019
कहानी उनकी जिनकी सफलताओं ने रचा इतिहास
सफलता एक ऐसा शब्द जिसको हांसिल करने का
लक्ष्य शायद हम सभी निर्धारित करते हैं, लेकिन इससे मिलने वाला परिणाम हम सभी को एक
समान संतुष्ट नहीं कर पाता, किसी को सफलता आसानी से और अथाह मिल जाती है तो कोई न जाने
कितने असफलताओं का स्वाद चखने के बाद सफलता को प्राप्त करता है और उसकी सफलता देख हम
सभी ये सोचने लग जाते हैं कि कैसे इतनी आसानी से इन्हे सबकुछ मिल गया, पर शायद हमारी
ये सोच उस तात्कालिक घटनाक्रम को देखकर ही प्रभावित हो जाती है, उससे जुड़े पिछले वाकयों
को न हम देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं क्योंकि वास्तविकता में सच्चाई इससे
कोसों दूर होती है| आज जिनकी शोहरत पर हम अपना शीश झुकाते हैं वो भी हमारे-आप जैसे
ही अपने जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए एक लंबे संघर्ष का सामना करके ही यहाँ तक पहुंचे
हैं| यदि हम इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो सारी बड़ी शख्सियतें जिन्होने आज सफलता
के नये आयाम तय किए हैं वो सभी असफलता की सीढ़ियों से होकर ही गुजरें हैं, बस उनमें
और असफल कहे जाने वालों के बीच फर्क बस इस बात का होता है कि सफल इंसान सफलता हांसिल
करने को अपनी जिद्द और असफल इंसान उसे किस्मत से मिला मात्र एक मौका समझकर हार मानकर
बैठ जाता है|
बस आज मैं आपको सफलता और असफलता के कशमकश से उबरकर सामने आई उन
महान शख्सियतों की प्रेरक कहानियों से रूबरू कराऊँगी जो अपने कर्मों के बल पर आज सम्पूर्ण
संसार को एक नयी दिशा दे रहे हैं और इस कड़ी में पहला नाम आता है "Bill Gates" का, जिनको कभी उनकी
टीचर ने क्लास की performance अच्छी न होने पर ट्रक ड्राईवर बनने की सलाह दी थी, तो
वहीं दूसरा नाम है "Dhirubhai
Ambani" का जिन्होने अपने जीवन की शुरुआत में मिली असफलताओं के बावजूद एक
रेवड़ी चलाने से लेकर अरबों का साम्राज्य तक खड़ा किया| इतना ही नहीं इस कड़ी में जो अगला
नाम है, वो है "Thomas Alva
Edison" जिन्होने 1000 प्रयोगों के बाद दुनिया को रोशन करने वाला मानव रचित
आविष्कार बल्ब के रूप में दिया| सफलता की कहानी लिखने वाली जो अगली पंक्ति है वो है
चार साल तक न बोल पाने और सात साल तक न पढ़ पाने वाले "Albert Einstein" की जिन्होने E=mc2 की रचना कर न केवल विज्ञान जगत अपितु पूरी दुनिया को नयी दिशा दी
और इन सबसे भी आगे बढ़कर जो नाम आता है वो है बच्चे-बच्चे की जुबान पर छाए "Disney" का जिसके कर्ता-धर्ता
"Walt Disney" को एक अखबार ने
उनकी कल्पनाशीलता के कमी के चलते नौकरी से निकाल दिया था, इनके अलावा Britain के पूर्व
प्रधानमंत्री "Winston Churchill"
का, जो दो बार Britain के प्रधानमंत्री बनें, लेकिन इससे पहले हुए सारे चुनाव में उनकी
हार हुई थी| इन कहानियों की शृंखला में जो अन्य नाम है वो हैं, Narendra Modi, Nelson Mandela, Mahatama
Gandhi, Jack Welch, आदि|
सफलता और असफलता की इन कहानियों की फेहरिस्त
में हर रोज नए-नए चेहरे शामिल होते जा रहे हैं पर उन सभी का नाम इस छोटे से लेख में
शामिल कर पाना मुश्किल है, लेकिन इन शख़्सियतों की कहानियों से जुड़े किस्सों का जिक्र
बार-बार लेकर आना हमें वो मनोबल दे जाता है जिसकी आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में सबसे
ज्यादा दरकार है|
आज वक्त तेजी से बदलता जा रहा है औरों को
मिली सफलताएँ कभी-कभी हमारी असफलता पर हमें ग्लानि से भर देती हैं लेकिन यदि हम इन
वेत्ताओं की ज़िंदगियों पर नज़र डालें तो शायद वो हमारे जीवन की दिशा ही बादल दें, क्योंकि
प्रेरणाओं का जरिया चाहे जो हो बस हमारी इच्छा शक्ति को हमेशा बल मिलते रहना चाहिए|
तभी तो हम आज नहीं तो कल सफलता को जरूर हांसिल कर पाएंगे|
शनिवार, 6 अप्रैल 2019
शनिवार, 30 मार्च 2019
अखंड भारत___एक दर्शन (Monolithic India___A Philosophy)
भारत____हमारा गर्व, हमारा अभिमान
आज हम भारतवासी पूरी दुनिया में सफलता के
परचम लहरा रहे हैं, ऐसे में अपनी मातृभूमि पर तो गर्व करने का हक तो बनता ही है और
हो भी क्यों न हमारा देश है ही ऐसा जिसने शायद दुनिया में सबसे ज्यादा आक्रांताओं के
आक्रमण झेले लेकिन शायद ही दुनिया के किसी देश को जीतने की लालसा मन में पाली हो| इतिहास
गवाह है कि हमारे देश के ज्ञानविद सिर्फ और सिर्फ विदेशों में अपने ज्ञान और संस्कृति
का प्रसार करने गए, जहां पहुँचकर उन्होने दुनिया
को अपनी गर्वीली सभ्यता और संस्कृति से अवगत कराया जिनकी झलकियाँ आज भी दुनिया के अनेकों
देशों में दिखाई देती हैं| आज मैं आप से अपने भारत के उस अतीत की चर्चा करूंगी जिसमे
भारतीय सीमाएं इतनी दूर तक फैली थीं जिसकी वर्तमान में हम सिर्फ और सिर्फ कल्पना ही
कर सकते हैं|
भारत जिसे प्राचीन काल से लेकर आज तक जंबू
दीप, भारत खंड, आर्यावर्त, अजनाभखंड और हिंदुस्तान के नामों से जाना जाता है| हमारा
भारत जैसा आज है वैसा पहले नहीं था| ब्रिटिश शासन से कई वर्षों पहले इस राष्ट्र में
पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, लंका(सिंहल
द्वीप), बांग्लादेश, तिब्बत(त्रिविष्टप), म्यांमार, इन्डोनेशिया जैसे अनेकों देश
शामिल थे और तब के सम्पूर्ण भारत का नाम जिस महामना के नाम पर पड़ा था वो थे ऋषभ देव के सौ पुत्रों में से एक "भरत" और बस यहीं से शुरू हुई थी हमारे
देश की गौरव गाथा, लेकिन बदलते इतिहास ने बहुत कुछ बदला और धीरे-धीरे भौगोलिक सीमाओं
में कटौती होती गयी और एक-एक कर भारत माता से उसके बहुत से महत्वपूर्ण अंग अलग कर दिये
गए, चाहे फिर वो 1876 में अफगानिस्तान
का अलगाव या 1904 में नेपाल व 1907 में
भूटान या फिर 1937 में म्यांमार का, इन सभी विभाजनों ने भारत माँ
को तो पहले ही छिन्न-भिन्न कर रखा था, परंतु हिमालय जैसा उच्च मस्तक धारण करने वाले
भारत को विखंडन का असली दंश उस समय झेलना पड़ा जब 1947 में धर्म के नाम पर विभाजन कराके
अंग्रेजों ने माँ भारती से पाकिस्तान को
अलग कर दिया और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका| ये अपने बढ्ने के चेष्टा को जारी रखे है
और आज जब कभी भी हमारे देश में समाहित 29 राज्यों को भी खंड-खंड कर देने की बातें सुनाई
पड़ती हैं तो मन वेदना से भर उठता है, क्योंकि हम सबकी असली ताकत तो सदियों से हम भारतवासियों
की एकता ही है और बस वक्त के साथ हम इसे जब-जब छोड़ आगे बढ़े तब-तब हमने और हमारे राष्ट्र
दोनों ने विध्वंस के साये को अपने सिरहने खड़ा
देखा है|
आज हम सिर्फ सोच सकते हैं कि हमारा भारत
ऐसा था....... वैसा था........ लेकिन आज भी जो हमारे पास बचा है उसके लिए हमारा उत्तरदायित्व
यही है कि बस और नहीं हम जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सदा एक रहें क्योंकि
यही एकता हमारी ताकत है और ये राष्ट्र हमारा अभिमान|
जय हिन्द,
जय भारत...
बुधवार, 20 मार्च 2019
रविवार, 17 मार्च 2019
ऑटोमेशन (AUTOMATION): वरदान या अभिशाप?
आज जब कभी भी हम काम करते-करते थक जाते
हैं तो सोचते हैं कि काश! कोई ऐसी मशीन होती जो चुटकी बजाते ही हमारा सारा काम कर देती,
बस मनुष्य के इसी सोच कि कार्य परिणीति है ऑटोमेशन (AUTOMATION) अर्थात स्वचालन, जहां
आप कुछ कामों को ऑटोमैटिक मोड पर सेट कर देते हैं ताकि आपको उन्हे बार-बार करने की
जरूरत न पड़े, वो काम खुद ब खुद पूरा हो जाये|
कुछ समय पूर्व आयी विश्व बैंक की एक रिपोर्ट
में इस बात पर चिंता जताई गयी कि बढ़ते ऑटोमेशन (AUTOMATION): वरदान या अभिशाप?के चलते भारत से लगभग
69%, चीन से लगभग 77% और इथोपिया से लगभग 85% जॉब को खतरा हो सकता है, बस यही मुद्दा
चिंता का विषय बन जाता है कि क्या व्यापार और कार्य क्षेत्र की तमाम मुश्किलें आसानी
से और कम खर्च से सुलझाने वाला ऑटोमेशन (AUTOMATION) वरदान है या अभिशाप?
आज मैंने अपने इस लेख में परिचर्चा के लिए
इस विषय को इसलिए चुना क्योंकि लगभग 7.6 अरब की आबादी वाले इस विश्व में कामकाजी हाथों
की कमी नही और समाज की रचना के अनुसार मानव जीवन की सम्पूर्ण भौतिक, सामाजिक, आर्थिक
जरूरतों को पूरा करने वाले उसके रोजगार की जिसकी उसे सख्त जरूरत है| ऐसे में बढ़ते ऑटोमेशन(AUTOMATION)
के प्रचलन ने कार्य क्षेत्र के लगभग सभी विधाओं जैसे Accounting and Invoicing, Data
Backup, स्टाफ ड्यूटी चार्ट बनाना, email मार्केटिंग, Software Testing व अनेकों वेबसाइट
में अपनी पैठ बना ली है जिसके चलते हाथों से काम करने वालों के कार्य क्षेत्र पर काफी
प्रभाव पड़ा है जो ऑटोमेशन(AUTOMATION) के नकारात्मक प्रभाव का प्रस्तुतिकरण करता है|
हालांकि ऑटोमेशन(AUTOMATION) के चलते कार्य
में तीव्रता आयी है और human error की गुंजाइश भी कम हो गयी है और इस नयी तकनीक को
अपनाकर समाज विकास की एक नयी परंपरा को लेकर आगे बढ़ना चाहता है और ऐसा हो भी क्यों
न क्योंकि समय-समय पर आने वाली तकनीकों ने हमारे समाज के विकास में अहम भूमिका निभाई
है लेकिन यदि यही तकनीकें मानवीय कार्य क्षमता को प्रभावित करने के बदले मिल रहीं हो
तो आगे के समाज के लिए शायद ही ये उतनी सार्थक सिद्ध हो सकें जितना हम सोचते हैं, ऐसे
में अंत इस आरंभ पर आधारित होकर इस बात के संशय को और भी गहराता जा रहा है कि मानवीय
तरक्की के लिए लाया गया ये ऑटोमेशन(AUTOMATION) वाकई वरदान है या अभिशाप? जो एक तरफ
अपनी द्रुत गति और human error से परे होकर कार्यों को निष्पादित कर रहा है वहीं दूसरी
ओर कार्य क्षेत्र में मानवीय बल को भी चुनौती दे रहा है...
शनिवार, 9 मार्च 2019
सरहदों की विध्वंसात्मक पटकथा (Borders Disruptive Story)
ये
तेरा है… ये मेरा है, बस
इसी मानवीय सोच के कारवां का एक मूर्त रूप है सरहद जिसके मायाजाल ने आज सम्पूर्ण विश्व
को उलझाकर रख दिया है| आज से लगभग 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व जब हमारी पृथ्वी का निर्माण
हुआ तब विधाता ने इस धरा को सरहदों से मुक्त
बनाया था परन्तु धीरे-धीरे मानवीय सभ्यता के विकास ने सरहदों अर्थात सीमाओं का निर्माण
प्रारम्भ किया, जिनमें से कुछ अगर प्रकृति प्रदत्त रहीं तो कुछ को मनुष्य ने जन्मा
और इसी सृजन के साथ शुरू हुआ सरहदों की विध्वंसात्मक पटकथा का सिलसिला जो आज तक जारी
है| वैसे तो हमारा विश्व अतीत से आधुनिक तक एक लम्बा सफर तय कर चुका है और विश्व के
इस सफर के साक्षी बने हैं दुनिया के मानचित्र पर अंकित 193 देश जिनका वर्गीकरण ही सरहदों
के बंटवारे पर आधारित है|
आज पूरी दुनिया में भारत-पाकिस्तान
(India-Pakistan) की सरहदों का मुद्दा मानव निर्मित इस समाज को नयी दिशा में सोचने
के लिए प्रेरित कर रहा है क्योंकि जिन सरहदों को इंसान ने विकास की पटकथा लिखने के
लिए निर्मित किया था वही सरहदें आज विध्वंस का कारण बन चुकी हैं, फिर वो चाहे अमेरिका
और मेक्सिको (America and Mexico) हो या फिर उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया (North
Korea and South Korea) या फिर इजराइल और फिलिस्तीन (Israel and Palestine) की सीमाएं, या
भारत और चीन (India and China) की सीमाएं सभी के इतिहास का
अगर हम अवलोकन करें तो हमारे सामने जो तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं वो ये हैं कि इन
सरहदों अर्थात सीमाओं के चक्कर में उलझकर इंसान ने पूरे विश्व को हिंसा के ऐसे चक्रव्यूह
में फंसा दिया जहाँ से शान्ति का मार्ग निकल पाना एक असंभव लक्ष्य बन चुका है|
अतीत से निकलकर आयीं गाथाएं सरहदों के माध्यम से
बनने वाले दुनिया के विनाशकारी स्वरुप को देख चुकी हैं, लिहाजा अब जरुरत इस
बात की है कि सरहदों की दुनिया से निकलकर मनुष्य अपने देशहित और लोकहित के बारे में
सोचे और “वसुधैव कुटुम्बकम”‘ की भारतीय
अवधारणा को सत्य सिद्ध करें क्योंकि आजतक इन सरहदों की विनाश लीला ने हमें सिवाये खून-खराबे
के दिया ही क्या है? जबकि दूसरी ओर विधाता ने इस धरा पर कभी भी मात्र सरहदों के आधार
पर बंटवारा नहीं किया| उसने तो एक रंग-बिरंगी
प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण धरती मनुष्य को सौंपी है जिसको मात्र सजाने संवारने का कृत्य ही इस मानवीय सभ्यता को शोभा देता है न
कि इसे विध्वंस के गर्त में धकेलने का|
शुक्रवार, 8 मार्च 2019
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
नारी हूँ मैं, नारी हूँ मैं
निस्तेज का भी तेज मैं
उद्वेग का हूँ वेग मैं
सानिध्य का भी स्नेह मैं
स्वालम्बन का आधार मैं
पीड़ा का हूँ प्रहार मैं
विरह की वेदना से परे, वात्सल्य का उपहार मैं
सृष्टि का भी आरम्भ मैं
अन्धकार का प्रकाश मैं
फिर भी समय की धार में, बह रही निर्बाध मैं
बह रही निर्बाध मैं...
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
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