Hindi Writing Blog

रविवार, 27 जनवरी 2019

क्यूँ बोझ बन गयी है नौकरी पेशा जिंदगी ...?





अभी हाल ही में #MeToo Campaign के चलते एक प्रतिष्ठित प्राइवेट कंपनी के एक नौकरी पेशा शख्स की आत्महत्या और तदोपरांत(subsequently) अपनी पत्नी को लिखे सुसाइड नोट में स्वीकारी गयी ये बात कि "अगर मैं निर्दोष भी साबित हुआ तो भी ऑफिस मे मुझे संदेह के दृष्टि से देखा जाएगा और मेरा जीना दूभर हो जाएगा" कही गयी ये उक्ति क्या इस बात की ओर इशारा नही करती कि आज के इस प्रतिस्पर्त्धात्मक (Competitive)  युग में काम  काजी दफ्तरों में जिस तरह का माहौल होना चाहिए क्या वो नौकरी पेशा लोगों को मिल पा रहा है? तो उत्तर हमें अपने इर्द-गिर्द नज़र घुमाने पर ही मिल जाएगा, क्योंकि जैसा माहौल हम आज संस्थानों मे काम करने वाले नौकरीशुदा लोगों की जिंदगी में देख रहे हैं उसे देखकर तो यही लग रहा है कि आज इस क्षेत्र को सकारात्मक(Positivity) परिवर्तन  की सख्त जरूरत है ताकि नौकरी पेशा लोग तनाव रहित होकर अपने कार्यों द्वारा संस्थान की छवि को और आगे ले जाएँ|
 क्यूंकी आज जब भी हम समाज मे नौकरी करने वालों की जिंदगी में झाकते हैं तो यही पाते हैं कि उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक जीवन-परिवर्तनीय नौकरी का स्वप्न लिए संस्थानों में दाखिल हुआ युवा जब जिंदगी की सच्चाई से रुबरु होता है तो वास्तविकता कुछ और ही होती है, ये वास्तविकता उन्हे आर्थिक रूप से सबल तो जरूर बनाती है परंतु बहुत कुछ खोने पर मजबूर कर देती है| कई दफ्तरों मे तो समय को लेकर अनुशासन के लिए जानी जाने वाली नौकरी में अब समय सीमा का ही उलंघन होने लगा है| काम के नाम पर आठ घंटे का दायरा बढ़ाकर लगभग दस से बारह घंटे कर दिया गया है जिसके चलते नौकरी पेशा लोग न परिवार मे अपनी उपस्थिति दर्ज करा पा रहे हैं और न ही समाज में, उनकी इस व्यथा का जो परिणाम निकलकर सामने आ रहा है वो न उन्हे स्वस्थ बना रहा है और न ही उनसे जुड़े तमाम रिश्तों को और न ही इन्ही रिश्तो पर टिके समाज को|
मैं ये नहीं कहती कि चहुँ ओर नकारात्मकता(Negativity) ही पसरी है परन्तु फिर भी अगर सकारात्मकता(Positivity) की बात करें तो नकारात्मकता उसपर ज्यादा भारी पड़ती दिख रही है| जिस नौकरी की चाह में वर्षों हम लम्बी शिक्षा ग्रहण करते हैं सैकड़ों इंटरव्यू से होकर गुजरते हैं वही नौकरी हमें चंद वर्षों में ही बोझिल क्यूँ लगने लगती है? तो वजह साफ है सिस्टम मे आई उदासीनता क्यूंकी आज के इस माहौल में सिस्टम इस ओर ध्यान ही नही देता और अगर देता भी है तो सैलरी में चंद रुपयों की बढ़ोतरी तक जाके ये सीमित हो जाता है|
हमारे समाज में बैठे उच्च प्रशासन को क्यूँ ये चीजें नहीं समझ आती कि जिन नौकरी पेशा लोगों पर हम देश की उन्नति का धागा बुन रहे हैं उनकी मनः स्थिति का भी खुशहाल होना जरूरी है क्योंकि एक स्वस्थ मन ही एक स्वस्थ परिवेश का निर्माण कर सकता है| हमारे देश की अमूल्य धरोहर नौकरी पेशा लोग मानसिक द्वंद के चलते असमायिक होने वाली शारीरिक बीमारियों से घिर जाएँगे तो वो कैसे हमारे राष्ट्र के विकास में अपनी उपयोगी सहभागिता दर्ज करा पाएंगे|
इस लेख के माध्यम से मेरा सम्माननीयों(honourable) से सिर्फ और सिर्फ इतना निवेदन है कि अगर हमारे राष्ट्र के उन्नति के इस महत्वपूर्ण पहलू पर एक बार वो उदारता के दृष्टिकोण(Attitude)  से नज़र डालें तो जरूर इस दिशा में परिवर्तन की राह आगे का मार्ग प्रशस्त करने में सफल हो पाएगी|
क्यूंकी अपने उच्च्स्थ को कुछ न बताने की विडम्बना में घुलता ये वर्ग हमारे राष्ट्र की पूंजी है और इनकी खुशहाली हमारी धरोहर....

रविवार, 20 जनवरी 2019

तेज रफ्तार जिंदगी का पंख बना - ड्रोन (Drone)

                                            
Fast Drone

आजकल हमारे राष्ट् पटल से लेकर विश्व पटल तक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत एक आधुनिक कृति की ज़ोर शोर से प्रशंसा हो रही है और हो भी क्यूँ न क्योंकि विज्ञान द्वारा प्रदत्त इस अनमोल कृति ने मानव निर्मित इस समाज में व्याप्त समस्याओं से निपटने मे अपनी अहम भूमिका जो निभानी शुरू कर दी है|
आज मैंने अपनी और आपकी परिचर्चा मे जो संवेदनशील मुद्दा चुना है वो है ड्रोन (Drone) का जिसके जरिये आज के मनुष्य ने समस्याओं से निपटने का जो आसान तरीका खोजा है वो प्रचलन मे तो प्रथम विश्व युद्ध से आ चुका था परंतु जिसने बहुलता अब प्राप्त की है| ड्रोन के आने से आज की रफ्तार भरी जिंदगी को मिली ये गति काफी तीव्र हो गयी है| जिससे हम ये कल्पना कर सकते है कि इसकी सफलता हमें यहाँ से शायद और आगे ले जायेगी, इन सभी तथ्यों की विश्वसनीयता इस बात से सिद्ध होती है कि  आज के इस दौर में  इस चालक रहित विमान ने न केवल कहीं दूर से रिमोट या कंप्यूटर द्वारा ऑपरेट होकर मनुष्य को उसकी पहुँच से दूर दिखने वाली जगहों तक आसानी से पहुंचा दिया है अपितु इसके प्रयोग ने आज 21वीं सदी के प्रगतिशील मनुष्य को और उससे जुड़ी सभी समस्याओं को चाहे वो चिकित्सा क्षेत्र से हों जहां ड्रोन ने चिकित्सा सेवा (Medical Services) को दूर-दराज के इलाकों में सुलभ बना दिया है या फिर बीमा (Insurance) क्षेत्र हो जहां ड्रोन ने दुर्घटना होने पर तुरंत सुरक्षा कवर देने की प्रक्रिया को सहज कर दिया है या फिर कृषि( Agriculture)  क्षेत्र जहां किसानों द्वारा  ड्रोन का प्रयोग करके फसलों पर कीटनाशकों का झिडकाव हो या फिर आपातकालीन सेवा देने का संवेदनशील मुद्दा हो या किसी देश का सैन्य क्षेत्र हो या फिर ऑनलाइन कंपनियों द्वारा लोगों तक उनकी वस्तुओं को होम डिलीवरी देने का मामला हो, इन सभी क्षेत्रों मे ड्रोन ने अपनी क्षमता त्वरित गति से सिद्ध की है और मनुष्य के प्रगतिशील और विवेकवान होने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है|

वैसे तो विज्ञान जगत में आए दिन होने वाले आविष्कार हम सभी को हतप्रभ करते रहते हैं परंतु आज विज्ञान ने ड्रोन जैसी चीज को हमारे जीवन मे शामिल कर हमें ये अवसर प्रदान कर दिया है कि इस पृथ्वी पर रह रहे सभी पृथ्वी वासियों के के जीवन को किस तरह समस्या रहित बनाया जाये और बिना कोई मानवीय जीवन  गंवाए केवल मनुष्य निर्मित मशीन के माध्यम से समस्याओं का निवारण किया जाये| ताकि समस्याओं से रहित समाज द्वारा  मानवता के मूल्यों मे वृद्धि संभव हो और विज्ञान की ये पहल हम सभी के मूल्यवान जीवन को संवारने मे अपना योगदान दे सके|        






शनिवार, 19 जनवरी 2019

जीवनदायी जल की कीमती बूंदें...

नीर हूँ मैं नीर हूँ…

सृष्टि में सर्वत्र हूँ

पर प्रयोग में विभेद हूँ ।

जीव का मैं मूल हूँ

पर जीव से ही दूर हूँ ॥

मेरे है ये वेदना

मुझको होगा रोकना ।

वरना मैं लुप्त हूँ

क्यूंकि मैं नीर हूँ...

क्यूंकि मैं नीर हूँ...       

     ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)


                                                 
Precious Water


नीर अर्थात “जल” धरा पर ईश्वर द्वारा मानव जीवन को सौंपी गयी एक ऐसी भेंट है जिसके बिना हम अपने इस अमूल्य जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते| आज मैंने परिचर्चा के लिए जल को इसलिए चुना क्योंकि इस बर्फीली सर्दी में भी जब मैंने महानगरों की ऊँची इमारतों की ओर नजर दौड़ाई तो मुझे इन गगनचुम्बी इमारतों के आगे टैंकरों से जल चढाती पाइपों की अनगिनत संख्या दिखाई पड़ी, क्या कर दिया है? हमने अपनी इस धरती का कि बिना मूल्य दिए उपयोग में लाये जाने वाले जल को हम आज मूल्य चुकाकर क्रय कर रहे हैं| अभी तो शायद इतनी देर नहीं हुई लेकिन अगर अब भी हम और आप नहीं चेते तो जीवनदायी ये जल मूल्य चुकाकर भी हमें नहीं मिल पायेगा| अपनी चेतना को अगर हम शहरों के दायरे से निकालकर ग्रामीण इलाकों की ओर ले जाते हैं तो स्थिति और भी भयावह हो चुकी है जहाँ उपयोगी जल की कमी फसलों के साथ-साथ मानव जीवन को भी लील रही है|

हमारी धरती पर वैसे तो नमकीन पानी के महासागरों के रूप में 97% जल है और केवल 3% ही हमारे उपयोग के लायक है, परन्तु मानव जीवन के लिए उपस्थित ये 3 % जल भी लगातार हो रहे प्रकृति दोहन के चलते हमसे दूर होते जा रहे हैं जिसका सीधा संकेत हैं जमीन के अंदर भी जल का गिरता भू स्तर जो हम सभी के लिए चिंताजनक है|

शायद हममें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो इन आकड़ों से अवगत न हो और इतना ही नहीं इस समस्या  के समाधान से भी सभी परिचित हैं कि ईश्वर प्रदत्त वर्षा जल को संचित कर व अपनी धरती को प्रदूषण से मुक्त कर हम जल को बचा सकते हैं| हम सब में से बहुत से लोग ऐसा  कर भी रहे हैं वो प्रकृति को इस कमजोर स्थिति से उबारने में लगे हैं परन्तु जब तक हमारे राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक जल बचाओ अभियान से नहीं जुड़ेगा तब तक दिन प्रतिदिन भयावहता की सीमा लांघ चुकी इस समस्या का समाधान नहीं हो सकेगा|

 मैं ये नहीं कहती कि हम सभी वर्षा जल संरक्षण करना शुरू कर दें परन्तु अगर हम अपने-अपने घरों में जल का आवश्यकतानुसार प्रयोग शुरू कर दें तो इतना ही काफी होगा हमारे योगदान के लिए और मुझे उम्मीद है कि हमारी ये छोटी कोशिश रंग जरुर लाएगी क्योंकि वर्तमान स्थिति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि जल की कमी से न केवल हमारा देश अपितु विश्व के अधिकांशत: भाग छद्म लड़ाई लड़ रहे हैं| ऐसे में मेरी और आप की आज उठी एक पहल आने वाले भविष्य के लिए जरूर एक सार्थक प्रयास सिद्ध होगी|

 

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

हिन्दी की गौरवगाथा का सफरनामा___विश्व हिन्दी दिवस विशेषांक


                           

आज "विश्व हिन्दी दिवस" है, सोचकर ही कितने गर्व का ही अनुभव प्राप्त हो रहा है और हो भी क्यों न आज हम सब की मातृ भाषा "हिन्दी" के सम्मान का दिन जो है| अब लगता है कि हम वाकई आजाद हैं क्योंकि सन 1947 के बाद मिली आजादी ने तो हमें सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई थी उनके द्वारा दी गयी अंग्रेजी भाषा की गुलामी मे तो हम सब अभी तक जकड़े थे, हालांकि भारत में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली हमारी मातृ भाषा हिन्दी को 14 सितंबर 1949 को ही राज भाषा का दर्जा मिल गया था परंतु एक लंबे समय तक अंग्रेजी शासन के चलते हमारी भाषा को अहमियत थोड़ी देर से मिली फिर भी आजादी बाद आए इस बदलाव ने लगभग 72 वर्षों का समय अवश्य लिया परंतु हमारे भारत वंशियों के विदेश प्रवास के चलते हमारी ये भाषा राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छा गयी|
आज की वर्तमान स्थिति जो आंकड़ा प्रस्तुत करती है वो हमारी अपनी भाषा हिन्दी को विश्व मे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की श्रेणी मे लाती है, हमारी भाषा की ये कामयाबी हमें थोड़ी देर के लिए आह्लादित भले करती है परंतु अभी भी कुछ कमी सी लगती है जिसकी वजह शायद ये है कि हम हिन्दी को भिन्न-भिन्न मंचों पर सम्मान दिलाने की बात तो करते हैं पर वक्त पड़ने पर उसी हिन्दी से मुंह फेर अंग्रेजी की गिरफ्त मे आ जाते हैं, खैर...|

सोशल मीडिया, मीडिया और अन्य पाठ्य पुस्तकों में बढ़ता हिन्दी का दखल अच्छा लगता है परंतु साथ आयी "हिंगलिश" हमें ये सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे हिन्दी शब्द कोश मे उतने शब्द नही हैं या फिर अंग्रेजी की गिरफ्त आसानी से हमें अपनी भाषा मे सहज नही होने दे रही|

ऐसे मे आइये इस विश्व हिन्दी दिवस पर हम सब मिलकर ये संकल्प लें कि हम अपनी हिन्दी को यहाँ से और आगे लेकर जाएँगे ताकि हिन्दी बोलने वालों के मन मे अपनी भाषा को लेकर उपजने वाली हीन भावना सदा के लिए जड़ से समाप्त हो जाये और हम सब भाषा से मिले इस बल से उन्नति का नया मार्ग सृजित करें|                                                 
जय हिन्द, जय हिन्दी!!!









शनिवार, 5 जनवरी 2019

वो भारत देश था मेरा......ये भारत देश है मेरा


मिटाये से न मिटेगी कभी साख भारत की
झुकाये से न झुकेगी कभी शान भारत की |
बदल दे इतिहास के रुख को
वो है पहचान भारत की ||
वो है पहचान भारत की...
         ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

                               
Our India
             
"जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती थी बसेरा, वो भारत देश है मेरा" गीत की कुछ पंक्तियाँ जब भी कभी कानों मे पड़ती है तो हम सभी भारतीयों के मन मे ऊर्जा का ऐसा ज्वार प्रस्फुटित होता है जो हमारी भावनाओं को सीधा राष्ट्र प्रेम से ले जाकर जोड़ देता है, फिर हमारा मन तरह-तरह की कल्पनाओं मे खो जाता है कि क्या वाकई कभी हमारा देश "सोने की चिड़िया" था? तो हमारे इन प्रश्नों का उत्तर देती है मीडिया क्षेत्र मे परिचर्चा का विषय बनी ब्रिटिश अर्थशास्त्री "एंगस मेडिसन" की "द वर्ल्ड इकॉनमी..." रिपोर्ट जिसमे उन्होने पहली सदी से लेकर बीसवीं सदी तक की विश्व अर्थ व्यवस्था का पूरा लेखा-जोखा दिया है और उसमे उन्होने बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के पूर्व सुपर पावर होने का तमगा हासिल करती थी|
ये विवरण कोई नया नही है क्योंकि हमारे देश का इतिहास भी इस बात की पुष्टि करता है कि सनातन काल से ही हमारा राष्ट्र दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति था परंतु भारत की संपन्नता के आकर्षण मे बंधे विदेशी आक्रांताओं ने हमारे देश को लूट कर खोखला कर दिया और इसके निवासियों को निर्धनता के दलदल मे डुबो दिया|
इन सब के बावजूद वर्तमान परिवेश मे हमारा देश न केवल इन झटकों से क्षति पाने के बाद भी उठ खड़ा हुआ अपितु अपनी प्रगति से इसने पूरी दुनिया को अचंभित भी कर दिया| 

                                                     धन्य है मेरा देश भारत! 


सोमवार, 31 दिसंबर 2018

आप सभी को नव वर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनाएँ



नये वर्ष की दस्तक से, पुलकित मन का आँगन है
जीवन की इस मधुरिम बेला मे, आप सभी का स्वागत है |
छोड़ गया है साल पुराना, अमिट धरोहर यादों की
नये वर्ष ने पाँव पसारा, लेकर उम्मीद मुरादों की ||

                                           ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

नर नारी के बीच समानता इस मानव निर्मित समाज की अनिवार्यता क्यूँ?




नर-नारी उपहार सृष्टि का
फिर विभेद ये कैसा है |
नारी ने जन्मी मानवता
तो नर भी है सृजक समाज का ||
फिर विभेद ये कैसा है...
नर मे है पुरुषत्व का बल तो
नारी मे अंतर्बल की बहती धारा |
ऐसे मे पूरक हैं दोनों
फिर विभेद ये कैसा है ||
फिर विभेद ये कैसा है...
                ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

                                     

कल जब पूरे देश की सुर्खियों मे छाये तीन तलाक विधेयक को लोक सभा मे पारित किया गया तो देश की इस व्यवस्थापिका के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने हेतु नमन के लिए शीश अपने आप झुक गया क्योंकि ये भारतीय नारियों के इतिहास का वो स्वर्णिम दौर है जब महिलाओं की समानता को वैधानिक रूप से पुरजोर बल मिला है और ये बल आज के इस दौर मे इसलिए भी मायने रखता है क्यूंकि इसमे धर्म और समाज की बेड़ियों को तोड़ते हुए मात्र और मात्र नारी हित की ही बात दोहराई गयी है और ऐसा शायद इसलिए भी संभव हो सका है क्यूंकि आज की भारतीय नारी ने गज़ब की दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए मानव निर्मित इस समाज मे पुरुषों के समान अधिकार को दिये जाने और अपने हक़ की लड़ाई को लड़ने वाली पहल का सदैव समर्थन किया है| 
सदियाँ गवाह रहीं हैं कि प्राचीन काल से ही भारतीय नारियां पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं हैं फिर वो चाहे युद्ध क्षेत्र हो या ज्ञान क्षेत्र सभी मे उन्होने अपनी मौजूदगी पूर्ण रूप से स्पष्ट की है यही नही उन्होने आगे बढ़कर पुरुषों के साथ तारतम्य स्थापित करते हुए विदेशी आक्रांताओं से राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा भी की है| 
ऐसे मे समय की बहती धारा मे नारियों के अस्तित्व पर धीरे-धीरे पुरुषों का पुरुषत्व हावी होता चला गया जिसने स्त्रियों को देश की परिधियों से समेंट कर घर की चार दीवारी मे कैद कर दिया परंतु हौंसलों की ऊंची उड़ान उड़ने वाली भारतीय नारियों ने गाहे-बेगाहे इन चार दीवारियों की बेड़ियों को तोड़कर भारत राष्ट्र के गर्व पटल पर अपने साहस और शौर्य की अमिट दास्तान अंकित की| 
इतना ही नही उन्नीसवीं सदी आते-आते भारतीय नारियों ने घर की जिम्मेदारियों को अपना संबल बनाते हुए समाज की नकारात्मक घटनाओं से लड़ने मे भारतीय पुरुषों का बराबरी से साथ दिया फिर वो चाहे आजादी की लड़ाई हो या आजाद भारत का नव-निर्माण सभी मे नारियों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने कर्तव्य का बखूबी निर्वहन किया| 
इतने पर ही न रुकने वाला नर-नारी का ये अद्भुत सामंजस्य इक्कीसवीं सदी में भारत राष्ट्र की  एक नयी तस्वीर पूरी दुनिया मे प्रस्तुत कर रहा है चाहे वो सैन्य क्षेत्र हो, विज्ञान, खेल या राजनीति सभी क्षेत्रों मे ये समीकरण इतनी गहराई से समावेशित हो चुका है कि जिसके चलते आज पूरी दुनिया मे  हमारे देश को एक नही पहचान मिल रही है| 
वर्तमान मे नारियों की इस सबलता के पीछे पुरुषों के योगदान को भी कम करके नही आँका जा सकता और हर क्षेत्र मे महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने पुरुषों के सोच को बदलने पर मजबूर कर दिया| ऐसे मे हमारे समाज को अगर हमें तरक्की के नए रास्ते पर लेकर जाना है तो समाज के एक महत्वपूर्ण अंग परिवार को अपने कंधे पर आगे ले जाने वाली नारी की अनिवार्यता को समझना ही होगा जिसको आज का समाज बखूबी निभा रहा है|
ऐसे मे पुरुषों की सोच और समझ मे शामिल महिलाओं की दृढ़ इच्छाशक्ति और कर्तव्य निष्ठा वर्तमान मे पूरी दुनिया मे भारत को एक नयी बुलंदी पर लेकर जा रही है......अच्छा लगता है ये परिवर्तन!!!


शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

भारत के अतीत का गौरवशाली इतिहास: मात्र महिमामंडन या हकीकत



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आज हम भारतीय पूरी दुनिया मे गर्व से सर ऊंचा कर ये कहते नही थकते हैं कि " हम भारतीय हैं और हमें हमारी राष्ट्रीयता पर नाज़ है| "

क्या? हमने ये कभी सोचा है कि हम भारतीयों के मनः पटल पर उकरी गर्व की ये अनुभूति हमें कहाँ से मिलती है, तो इसका सीधा उत्तर हमारे इतिहास मे छिपा है जहां से हमें वो ऊर्जा प्राप्त होती है जो सनातन काल से ही हमें विश्व नेतृत्व की क्षमता प्रदान करती है और ये मात्र हमारे इतिहास का महिमामंडन नही है अपितु यही हकीकत है| 

इतिहास साक्षी रहा है कि हमारे देश को विदेशी आक्रांताओं ने बार-बार लूटा है परंतु इन सबके बावजूद हमारे राष्ट्र के सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार इतने गहरे रहे हैं कि वो उखड़ने के बजाय हमेशा समृद्ध हुए हैं| 

आज मैं भारत के उस गौरवमयी इतिहास की बात कर रही हूँ जिसने दुनिया को समय-समय पर प्रगति के अनमोल तोहफे तो दिये लेकिन जिनके पद-चिन्हों को आगे बढ़ाने की होड़ मे शायद आज हम थोड़े पीछे रह गए हैं चाहे वो भारत के महर्षि कणाद का परमाणु सिद्धान्त हो या फिर ऋषि भारद्वाज का वायुयान की खोज का सिद्धान्त, इन सभी कड़ियों मे और नाम भी हैं जैसे प्राचीन गणितज्ञ और पाइथागोरस सिद्धान्त से पूर्व ही ज्यामिती के सूत्र रचने वाले बौधायन, न्यूटन से पाँच सौ वर्ष पूर्व ही गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को जाननेवाले ऋषि भास्कराचार्य, भारत के मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक की संज्ञा से विभूषित योगसूत्र के रचनाकार पातंजलि, आयुर्वेद के महत्वपूर्ण ग्रंथ चरक संहिता के जनक ऋषि चरक, शल्य चिकित्सा के आविष्कारक ऋषि सुश्रुत, रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान के प्रस्तोता नागार्जुन, दुनिया को पहला व्याकरण देने वाले पाणिनी, थॉमस एलवा एडीसन के पहले ही बिजली के आविष्कार संबंधी ज्ञान देने वाले ऋषि अगस्त्य, महान गणितज्ञ और भविष्यवक्ता आर्यभट्ट, ये सभी कभी भारत की पहचान थे और जिन्होने आज हमपर उस परंपरा को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है| 

ऐसे मे हम सभी का ये उत्तरदायित्व है कि हम इतिहास पुरुषों के द्वारा दिये गए ज्ञान को अपना संबल बनाएँ और ऐसे भारत के निर्माण मे सहयोग दें जो युगों-युगों तक महिमामंडित होता रहे| 






रविवार, 16 दिसंबर 2018

वृद्धों का तिरस्कार: युवा पीढ़ी की मंशा या मजबूरी




अटूट है रिश्तो का बंधन,
अमिट है स्वरूप ये|
समय के वेग मे सहज हो,
रिश्तों का प्रारूप ये||
                 ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

वृद्धावस्था यानि मानवीय जीवन चक्र का वो पड़ाव जहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन और समाज से जुड़े सभी उतार-चढ़ावों से गुजरकर पूर्ण परिपक्व बन चुका होता है, परंतु प्रकृति प्रदत्त इस अवस्था तक पहुँचने के लिए उसे बाल्यावस्था, किशोरावस्था और युवावस्था की सीढ़ियों से होकर गुजरना पड़ता है जहाँ जिंदगी हर पल कुछ नया सिखाती जाती है|
ऐसे मे पूरी जिंदगी का तजुरबा हासिल कर चुके इन बुजुर्गों पर पिछले साल “वर्ल्ड एल्डर एब्यूस अवयरनेस डे” के अवसर पर “हेलपेज इंडिया”  द्वारा कराये गए सर्वे ने जब ये बताया कि भारत मे बुजुर्गों के साथ भी बहुत शर्मनाक व्यवहार होने लगा है तो इस बात ने मेरी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया कि क्या यही हैं हमारे भारतीय मूल्य जिनपर हम विश्व गुरु होने का दम भरते हैं परंतु जब मेरे मन ने इनका मूल्यांकन प्रारम्भ किया तो मेरे सामने बहुत सारे चीजें भी निकलकर सामने आयी कि क्या आज की युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों के साथ जो व्यवहार कर रही हैं वो उनकी “मंशा है या फिर मजबूरी”?
मंशा और मजबूरी के बीच एक बारीक सा फासला है जिसमे आज की भाग दौड़ और प्रतिस्पर्धा से भरी जिंदगी का भी काफी योगदान है जिसने बुजुर्गों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शायद उम्र के पड़ाव पर उनके अपने उनके साथ ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं|
मैं ये नही कहती कि सभी मामलों मे ऐसा होता है परंतु बहुत से मामले ऐसे भी हैं जहाँ आज जिंदगी की जद्दोजहद अनगिनत गलतफहमियाँ पैदा कर देती हैं क्योंकि पीढ़ियों से मिले सद-आचार कभी इतने खोखले नही हो सकते जो रिश्तों की मर्यादा को न समझ सकें| बहुत से घरों मे बेटी-बहू के फर्क ने भी मानसिकता को परिवर्तित कर दिया है, ऐसे मे जितना उत्तरदायित्व युवाओं का है परिवार और रिश्तों को सजोने का उतना ही शायद बुजुर्गों का भी है| बुजुर्गों द्वारा मन की बात कह देने का मार्ग और युवाओं द्वारा उनके बातों को सुनकर समाधानपूर्ण मार्ग निकालने का विचार यदि एक साथ संयोजित हो जाए तो शायद आज भी भारत राष्ट्र की दृढ़ पारिवारिक परम्पराओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई भी बुराई इनकी जड़ों को डिगा तक नही सकती|

रविवार, 9 दिसंबर 2018

क्यूँ दूर हो गए हम संयुक्त परिवार की धारणाओं से?


Nuclear Family Vs Joint Family

छूट गए सब रिश्ते नाते |

टूट गया वो बना घरौंदा ||

कुछ रिश्तों की डोर संभाले |

जाने हम आ गए कहाँ ||

जाने हम आ गए कहाँ…

         ("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

 21वीं सदी मे दस्तक दे चुकी मानवीय सभ्यता को खुद मानव निर्मित इतिहास ने इतना कुछ दिया था कि उन्ही पर हम अपना भविष्य संवार रहे हैं| आज हम सभी आगे बढ़ने और समाज मे एक मुकाम हासिल करने की प्रतिस्पर्धा मे जुटे हैं पर जब इन सब से परे होकर कभी शांत चित्त से अकेले मे बैठते हैं तो हमारा मन वही पुराने शोरगुल के लिए तड़पने लगता है जो कभी हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, ताई-ताऊ, भाई-बहन आदि जैसे अनगिनत रिश्तों के बीच मिलता था, इतनी हलचल… के बावजूद दिल मे सुकून था जो आज की इस आपा-धापी मे कहीं खो गया है|

पहले भी इस धरा पर रहने वालों को दिन-रात के चौबीस घंटे ही मिलते थे और आज भी उतने ही मिलते हैं फिर भी वो कम ही लगते हैं क्योंकि हमने अपने आप को काम के सिलसिले मे इतना व्यस्त कर लिया है जिसके चलते परिवारों को छोड़ हमने अपनी अलग दुनिया बना ली है और परिवारों से अलग होने पर मिले इसी एकाकीपन के चलते स्ट्रेस, डिप्रेशन जैसी लाइलाज बीमारियों ने हमें अपना शिकार बना लिया हैं|

क्या कभी हम सब ने ये सोचा है कि हमें ऐसा क्यों महसूस होता है? तो उत्तर है- सोचा तो हम सभी ने पर अब चीज़ें हमारे एकाधिकार से बाहर हो चली हैं, शायद सत्यता भी यही है कि हमारे मन के कोने मे आज भी संयुक्त रूप से जुड़े परिवारों की परंपरागत यादें हिलोरें तो मारती हैं पर हम सब ने खुद अपने को उनसे दूर कर रखा है ऐसे मे अब हमें खुद ही आगे आना होगा ताकि जो हमें न मिला वो हम अपनी भावी पीढ़ियों को तो दे सकें|

रविवार, 2 दिसंबर 2018

आखिर हमने जहरीली क्यों कर दी हैं हवाएं?



Polluted Air


फिजाओं में न वो बात है | 

हवाएं भी न कुछ ख़ास हैं || 
न जाने क्यों हमीं ने ही | 
बदल दी है तस्वीर धरती की || 
स्वर्ग सी हो यही धरती | 
गगन भी श्वेत स्यामल हो || 
हवाओं का भी रुख बदले | 
फिजाएँ भी तो निर्मल हों || 
             
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)                                   

हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली से आयी इस खबर ने कि -"यह स्वास्थ्य  की आपात स्थिति है, क्योंकि शहर व्यवहारिक रूप से गैस चैम्बर में बदल गया है" ने हम सभी को एक पल के लिए ही सही ये सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया कि अगर हवाओं में घुले इस जहर की आज ये स्थिति है तो आने वाले समय में क्या होगी? और हमारे सामने जी रही नयी पीढ़ी का क्या होगा-वगैरह-वगैरह...

जब कभी भी कोई समाचार हमारे देश या हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा मिलता है तो हम एक पल के लिए ही सही काफी जागरूक हो जाते हैं पर अगले ही पल उसी के विरुद्ध कार्य करने में कोई कसर नहीं छोड़ते शायद ऐसा ही कुछ हमने अपने पर्यावरण के साथ भी किया है जिसका खामियाजा आज शुद्ध हवा के लिए तरसती हमारी एक-एक साँसों को भुगतना पड़ रहा है|

हमने विकास और आधुनिकता की चाह में पूरी पृथ्वी को ही असंतुलन की भेंट चढ़ा दिया है| हम मानवों की महत्वाकांक्षाओं की असीमित सीमाओं ने अगर कभी कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित भी किया तो अगले ही पल हमारे मन में पलते लालसा के भाव ने हमें पीछे धकेल दिया|

आज हमारे समाज में बहुत सारे संगठन, सरकार सभी पर्यावरण प्रदूषण की भेंट चढ़ती प्राण-वायु (ऑक्सीजन) को संभालने में लगे हैं, ऐसे में इस समाज से जुड़े होने के नाते हम सभी का ये कर्तव्य बनता है कि इनकी इस पहल में हम इनका साथ दें और अपनी धरा को जहरीली हवा के दमघोंटू आवरण से मुक्त करायें ताकि न केवल हम अपना वर्तमान सवारें अपितु अपनी पीढ़ियों को सौपें जाने वाले भविष्य के संरक्षक का दायित्व भी बखूबी निर्वाहित कर सकें| 

 

रविवार, 18 नवंबर 2018

क्यूँ नहीं हैं सुरक्षित बेटियां हमारे समाज में?


Daughter's Safety

गार्गी, घोषा, अपाला का, रूप हैं ये बेटियां ।
बेटियां ही मान हैं, तो अभिमान भी है बेटियां ।।
बेटियों से है धरा ,तो बोझ क्यूँ हैं बेटियां ।
काली,दुर्गा,लक्ष्मी का, रूप हैं जब ये बेटियां ॥
तो हमारे इस समाज में, अभिशाप क्यूँ हैं बेटियां ।
बेटियों ने जब संभाली है, सुरक्षा देश की ॥
तो हमारे इस समाज में, क्यूँ असुरक्षित है बेटियां ...
                           
("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)
21वीं सदी में प्रवेश किये भी हमे वर्षों बीत गए हैं फिर भी मेरे जेहन में ये सवाल बार-बार आकर ठहर जाता है कि आखिर क्यों हमारे इस समाज में आज भी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं? आज हम जब कभी भी अपने इस प्रगतिशीत समाज का मूल्याङ्कन करने बैठते हैं तो हमारी बेटियों के साथ हो रहे अत्याचार इसकी गतिशीलता और संवेदनशीलता दोनों पर सवालिया निशान खड़ा कर देते हैं। यही नहीं 29 राज्यों वाले हमारे देश के प्रत्येक हिस्से से हमें हर रोज हमारी बच्चियों के साथ घटित होने वाली अप्रिय घटनाओं की जानकारी मीडिया व समाचार पत्रों के माध्यम से प्राप्त होती रहती है।

तो हम ये सोचने पर विवश हो जाते हैं की आखिर क्यूँ सृष्टि में ईश्वर द्वारा रचित इस अनमोल कृति को मानव रचित समाज में प्रवेश करने पर इतना सहना पड़ता है? क्यूँ हम बेटियों को इस संसार में प्रविष्टि पाने से पहले ही उनका मार्ग रोक देते हैं? और जो प्रविष्टि पा लेती हैं उनका जीवन भी किसी न किसी तरह दूभर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

 क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब मिलकर इस धरा पर इन बेटियों के लिए ऐसा परिवेश निर्मित कर दें कि हर बेटी गार्गी, अपाला, घोषा, लक्ष्मीबाई, सुनीता विलियम, कल्पना चावला की परंपरा का निर्वाहक बनें न कि अपने नयनो से बहते अश्रुओं को संभालने वाली वेदना का... 

शनिवार, 10 नवंबर 2018

Diwali Wishes



दियों के प्रकाश से दिव्य सी दिशायें |
गुणगान गा रही हैं राम के प्रवेश का ||
सृष्टि में उल्लास है और मन में भी आनंद है |
क्यूँकि आज ही समावेश है अंधकार में प्रकाश का ||
अंधकार में प्रकाश का...

("कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित)

---आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें---

भारत राष्ट्र को दरकार किसकी?___________ बुलेट ट्रेन या दो वक़्त की रोटी!

 
Bullet Train Vs Food


उदर की वेदना अब, चीत्कार कर रही है ।
नयनो की अश्रु धारा, विलाप कर रही है ।।
जीवन गति न रोक दे, विकास का अलाप ये । 
सचेतो अब मूर्धन्यों!
उदर की वेदना अब, चीत्कार कर रही है ।
चीत्कार कर रही है ।।
          "कैलाश कीर्ति (रश्मि)" द्वारा रचित

भारत________विश्व के मानचित्र पर अंकित एक ऐसा राष्ट्र जिसकी सशक्तता का इतिहास सदैव से साक्षी रहा है। सनातन काल से चली आ रही परम्पराओं ने तो इसे विश्व गुरु की संज्ञा से भी अलंकृत कर रखा है परन्तु इन सब के बावजूद क्या भारत का वर्तमान सही में ऐसा बन पा रहा है जो पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करने में समर्थ हो? ये प्रश्न शायद आज भी अनुत्तरित है क्योंकि जिस भारत के विकसित होने का हम दम भर रहे हैं वो भारत ये भारत नहीं है जहाँ आज भी इसके नागरिकों को अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (रोटी, कपडा और मकान) में से एक रोटी की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

हाल ही में आयी ग्लोबल हंगर की रिपोर्ट ने इस बात की प्रमाणिकता पर अपनी मुहर भी लगा दी और इस तथ्य को पूर्णतया सत्य भी कर दिया कि कभी विश्व गुरु का दर्जा पाने वाले भारत के वर्तमान में दो रूप हैं, एक तरफ का भारत गगनचुम्बी इमारतों, चकाचौंध से भरी दुनिया का भारत है तो वहीँ दूसरी तरफ का भारत इससे बिलकुल अलग गरीबी, भुखमरी और बेकारी का भारत है।

असंतुलन का ऐसा भद्दा स्वरूप है ये जिसके आधार पर भारत के विश्व पटल पर पुनः विश्व गुरु कहलाये जाने के प्रश्न पर ही एक सवालिया निशान लग जाता है। ये कैसे समाज में हम रह रहे हैं जहाँ हम बुलेट ट्रेन और स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की बात करते हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि देश की 2/3 आबादी को हम दो वक़्त की रोटी तक दे पाने में सक्षम नहीं हैं।

कैसा विकास है ये? किसका विकास है ये? और किसके लिए विकास है ये? जिसे हम हमारे देशवासियों के जीवन को जीवंत रखने वाली दो वक़्त की रोटी के बदले छीन कर हासिल कर रहे हैं।

ऐसे में ये प्रश्न लाजिमी है कि आखिर हमारे देश को आज दरकार किसकी है ________बुलेट ट्रेन की या फिर भूख से बिलख रहे देश वासियों के दो वक़्त के निवाले की?