Hindi Writing Blog

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

दशहरा (Dussehra) की हार्दिक शुभकामनाएँ

Dussehra


राम की गाथा सदियों से गा रहे हैं,
उनमें समाहित गुणों को अपना कहाँ रहें हैं,
राम से कर दूरी रावण जला रहे हैं,
जय-पराजय की परंपरा निभा रहे हैं,
कुसंगति का, दे साथ
मूल्यों को मिटा रहे हैं
खुद होकर जिम्मेदार, बेकसूर बता रहे हैं
कलयुग की रामायण हम खुद बना रहे हैं
अभी वक्त है संभल लें, फिर भी दूर जा रहे हैं
राम की गाथा सदियों से गा रहे हैं,
        राम की गाथा सदियों से गा रहे हैं...
                            स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)
स्वयं के अन्तर्मन से प्रभु राम के गुणों को अपनाने के संकल्प के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत के इस जीवंत पर्व विजयादशमी की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ...


रविवार, 29 सितंबर 2019

नवरात्रि (Navratri) की शुभकामनाएँ

नवरात्रि


उद्घोष है, आरंभ है,
नवरात्रि का प्रारम्भ है|
जगमगाई सी दिशाओं में,
जयकारों की ही गूंज है|
चल पड़ा फिर सिलसिला,
शक्ति की भक्ति का|
ना कहीं भी द्वेष हो,
ना कहीं क्लेश हो|
मातृ-छाँव में सभी,
सुखों का प्रवेश हो|
सुखों का प्रवेश हो...
     स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

इन शब्दों के साथ माँ दुर्गा के आगमन पर्व नवरात्रि की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ...

शनिवार, 28 सितंबर 2019

भारतीय लोकतन्त्र (Indian Democracy) पर प्रहार क्यों?


Indian Democracy

लोकतन्त्र अर्थात जनता द्वारा स्वयं चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन का चलाया जाना, जो किसी भी लोकतन्त्र को समझने के लिए पर्याप्त है और ऐसी ही कुछ व्यवस्था प्राप्त राष्ट्रों की श्रेणी में शुमार है हमारा देश भारत, जहां जनता का शासन, जनता से जनता के लिए चलाया जाता है, लेकिन भारत को मिली ये लोकतान्त्रिक व्यवस्था उसे सौगात में नहीं मिली, बल्कि वर्तमान में आबादी के हिसाब से दूसरे स्थान व क्षेत्रफल के हिसाब से सातवें स्थान पर कायम भारत के लोगों के असीम बलिदान और त्याग के लंबे सिलसिले का परिणाम है ये भारतीय लोकतन्त्र (Indian Democracy) जिसनें सन् 1947 में मिली पूर्ण आजादी के बाद न केवल इस परंपरा को निभाया है अपितु आज भी इसके 73वें स्वतंत्रता दिवस तक इसके निर्वहन की गति अबाध रूप से जारी है जिसके चलते भारतीय लोकतन्त्र भारत के लोगों के अन्तर्मन में आज भी विशिष्ट स्थान पर काबिज है और शायद इसीलिए हमारा राष्ट्र भारत आज पूरी दुनियाँ के लिए अनुकरणीय लोकतंत्र का दर्जा हांसिल करता है, लेकिन बीते कुछ वर्षों से इसी लोकतन्त्र पर बार-बार प्रहार किए जा रहे हैं जिसका ताजातरीन उदाहरण है दुनियाँ के प्रख्यात पत्रकार ब्रायन क्लास (Brian Klass) का जिन्होने इंडिया टुडे कानक्लेव (India Today Conclave) 2019 के कार्यक्रम मंच को साझा करते हुए कहा “भारत में लोकतन्त्र खत्म होने वाला है, वर्तमान प्रधानमंत्री की नीतियाँ इसे खत्म कर देंगी” इतना ही नहीं इससे आगे बढ़कर उन्होने कहा कि “चुनाव महज लोकतन्त्र की शुरुआत है, निष्कर्ष नहीं|उनके द्वारा कहे गए इन शब्दों का आधार क्या था, ये तो मुझे नहीं पता लेकिन इतना जरूर कहूँगी कि आखिर क्यों इतने बड़े मुल्क में कोई भी तर्क लोकतन्त्र को समाप्त करने के दु:स्वप्न तक लाकर छोड़ दिया जाता है| क्या किसी भी राजनीतिज्ञ का दलहित से ऊपर उठकर देशहित में सोचना लोकतन्त्र के खात्मे का अवसर हो सकता है? माना आज भारत की अर्थव्यवस्था अनेकों संकटों से जूझ रही है, जैसा की आंकड़े दर्शाते हैं, GDP 5% है, Manufacturing Growth घटकर 0.6% पर आ गयी है और बेरोजगारी दर (Unemployment Rate) 45 साल के उच्च स्तर पर है, लेकिन क्या सरकार द्वारा प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, कुछ एक नीतियों से सरकार के कार्यों का हम समग्र मूल्यांकन कर उसे लोकतन्त्र की अस्मिता से जोड़ दें तो ये कहाँ तक सही है, ये भी तो हो सकता है चंद लोगों की वो सोच हो, आम जन इससे परे हों| इतना बड़ा देश है, इतने लोग हैं और लोगों की अलग-अलग सोच है, पर इन सब के बावजूद भारत के विकास की गति अनेकों मोर्चों पर लगातार जारी है| लोगों के जीवन स्तर में अनुकूल प्रभाव दर्ज हो रहे हैं, जिसकी गवाही के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं वो हमें आस-पास मौजूद लोगों से महसूस हो रही है| आज भारत में हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी है, क्या ये सारी चीजें काफी नहीं लोकतन्त्र को प्रस्तुत करने के लिए? आखिर क्यों एक बार नहीं, बार-बार भारतीय लोकतन्त्र की अस्मिता पर प्रहार होता है? क्यों कोई दल चुनाव हार जाता है तो लोकतन्त्र खतरे में आ जाता है? ये है क्या? ये सबकुछ भारत की उस सोच का अपमान है जिसमें भारत और भारतीयों ने वसुधैव कुटुंबकम” की परंपरा दुनियाँ को दी, जो राष्ट्र पूरी वसुधा को परिवार बनाने की कल्पना को लेकर चलता हो उसके नागरिक क्या अपने देशहित की बात आने पर पीछे हट जाएंगे? इतिहास गवाह है, न ऐसा कभी हुआ है, न कभी होगा| इस उम्मीद के साथ कि भारत और भारत का लोकतन्त्र सदैव जनता और इसके सेवकों द्वारा सिंचित होता रहे  जय हिन्द, जय भारत...


रविवार, 22 सितंबर 2019

Daughter's Day की आपको ढेरों शुभकामनाएँ !!

Daughter's Day

बेटियों,

सृष्टि का आधार तुम,
तुमसे धरा, तुमसे गगन,
सूने जीवन का संचार तुम,
विधाता का दिया उपहार तुम,
शक्ति का वरदान तुम,
तुम हो तो, हम हैं,
वरन् अभिशप्त सा है ये चमन,
     अभिशप्त सा है ये चमन...||
       स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

Daughter’s Day की इस अनुपम बेला में बेटियों को बधाई देने के साथ आइये आज हम सब संकल्प लें कि संसार की इस बगिया में खिले इन बेटी रूपी पुष्पों की चमक कभी फीकी नहीं पड़ने देंगे और “क्या हमारी और क्या आपकी”, बेटी तो बेटी होती है की भावना को लेकर आगे बढ़ें और समग्र समाज को ही बेटियों का सुरक्षित आँगन बनाएँ जहां वो पढ़ें, लिखें, खेलें और अपने जीवन को बिना किसी बंधन के आजादी से जी सकें|

शनिवार, 14 सितंबर 2019

“हिन्दी दिवस” की ढेरों शुभकामनाएँ!!!

हिन्दी दिवस

मित्रों!

आधुनिक हिन्दी के पितामह कहे जाने वाले महान हिन्दी साहित्यकार “भारतेन्दु हरिश्चंद्र” ने कहा था____

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल |
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल....|

उनके द्वारा कहे ये शब्द आज भारत राष्ट्र को अंग्रेजों से आजादी प्राप्त किए गए इतने वर्षों बाद भी अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी भाषा की गिरफ्त से आजादी न मिल पाने के दर्द को बयां करते हैं और न जाने कितनों को स्वयं के अभिव्यक्ति को मात्र भाषा के आधार पर दूसरों तक न पहुंचा पाने की वेदना को भी समेटकर बस हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपनी राजभाषा हिन्दी को न केवल अपने शब्दों में शामिल करें अपितु अपनी सोच को भी हिन्दीमय कर लें क्योंकि ये पीड़ा आज इतनी बढ़ चुकी है कि अब हिन्दी के कुछ शब्दों की तुलना में अँग्रेजी के शब्द हम सभी को आसान लगने लगें हैं|

मन, वचन व कर्म में हिन्दी को शामिल किए जाने की कामना के साथ हिन्दी दिवस” की ढेरों शुभकामनाएँ!!!

सोमवार, 9 सितंबर 2019

भारतीयों की दिलों की धड़कन बना Bollywood संगीत

Bollywood Music


भारत एक ऐसा देश जिसे दुनियाँ के सबसे colorful देश की संज्ञा से नवाजा जाये तो ये अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि ये देश है ही ऐसा| यहाँ के लोगों की ज़िंदादिली, आशावादिता, भाग्य के भरोसे न रहने की दृढ़ता एवं संसाधनों की कमी के बावजूद हौसलों की ऊंची उड़ान देख दुनियाँ दंग है| आखिर! हम भारतीय कैसे कर पाते हैं इतना सबकुछ? तो जी हाँ, हमारी इस सोच के पीछे छिपी होती है कुछ प्रेरक सौगातें, जिनका संबंध विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हमें ऐसा आधार प्रदान कर ही जाता है कि हम सबकुछ कर लेते हैं और जहां तक यथार्थता की बात है तो 130 करोड़ की आबादी वाले दुनियाँ के विशालतम देशों में शुमार भारत एक ऐसा देश है जहां का एक बड़ा तबका माध्यम वर्ग से जुड़ा है और इन परिवारों में आने वाली पीढ़ियों को ज़्यादातर इन्हीं बातों की शिक्षा दी जाती है कि वो जीवन में कैसे सफल व सशक्त बनें और ऐसा करने के लिए ये मध्यमवर्गीय परिवार जिन चीजों का सहारा लेते हैं उनमें से एक होती है “सशक्त किरदार व प्रेरक संगीतों से सुसज्जित Bollywood की हिन्दी फिल्में”, जिन्हें इसके आरंभ से लेकर आजतक के इतिहास ने “समाज का आईना” उपाधि से विभूषित किया है और यही वजह है कि भारतीय सिनेमा आज हम भारतीयों के दिलों में बसता है| इनमें सजे संगीत अब हम सभी के सुख-दुख के साथी बन चुके हैं| आज जब चंद्रयान 2 (Chandrayan 2) की निराशा ने हमें पल भर के लिए झिंझोड़ा तो हमें एक ही बात देश के महान वैज्ञानिकों से कहने का मन हुआ ______

“रुक जाना नहीं तू कहीं हार के....(विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म इम्तिहान)”   ये है हमारी और हम सबकी आवाज जो Bollywood फिल्मों में फिल्माए गए गानों के साथ ऐसे घुल जाती है कि विविधता से भरे इस राष्ट्र को एका के सूत्र में पिरो देती है|

आज जब कभी भारतीय खिलाड़ी किसी विश्वस्तरीय मंच पर प्रदर्शन कर रहे होते हैं तो शाहरुख खान अभिनीत “चक दे इंडिया” का वो गाना पूरे देश की पहचान बन जाता है और देशवासियों से मिले हौंसले हमारे खिलाड़ियों के मनोबल को ऐसा बढ़ाते हैं कि कामयाबी उनके कदमों को चूम ही लेती है और ये सिलसिले बदस्तूर जारी है|

अभी कुछ दिन पहले Facebook के जरिये Bollywood संगीत की दुनियाँ में कदम रखने वाली गायिका रानू मण्डल (Ranu Mandal) की कहानी भी हम भारतीयों के हिन्दी सिनेमा संगीत के प्रति हमारे लगाव को दर्शाती है कि कैसे विपरीत परिस्थितियाँ होने के बावजूद उनके जेहन में फिल्मों के ये गीत गूँजते रहे और न केवल गूँजते रहे बल्कि उन्हें एक नयी पहचान भी दे गए|

भारतीय हिन्दी सिने जगत ने ऐसे अनगिनत गीत-संगीत हमारे देश को दिये हैं जिनको हम चाहे जिन अवसरों पर हमारे जीवन में शामिल करें ये हमारे जीवन को एक नयी दिशा दे ही जाते हैं| ऐसे में मेरी बस यही कमाना है कि भारत के सिने जगत से निकलने वाली ये मधुरिम स्वर गंगाएँ भारत राष्ट्र की जमीं को सदैव सिंचित करती रहें| इसी आशा के साथ...
  जय हिन्द... जय भारत!!!

सोमवार, 2 सितंबर 2019

गणपति बप्पा मोरया - Happy Ganesh Chaturthi


Ganesh Chaturthi


एकदन्तं महाकायं लंबोदरगजाननमं |
विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ||

चारों दिशाएँ बप्पा के आगमन के जयकारों से गुंजायमान होकर हम सभी को आनेवाले दिनों में भक्ति के रस में अनवरत सिंचित कर उनके आशीर्वाद की कृपा हम सब पर बरसाती रहें| इसी कामना के साथ आप सभी को बप्पा के माँ गौरी के साथ हरतालिका तीज पर द्वि-आगमन की हार्दिक शुभकामनाएँ ||

हुआ है जयकारा, आए हैं बप्पा यारा,
मिटा के धुंध सारा, छाएगा उजियारा |
बरसेंगी अब खुशियाँ, सँवरेगा जग सारा,
जीवंत कर दिशाएँ, चलो बप्पा के रंग, रंग जाएँ |
अब दिन हो या रैना, बप्पा के ही गुन गाएँ,
भक्ति की अलग जगाएँ, अहम् की ज्योति बुझाएँ |
चलो एक बार फिर से, बप्पा की जय मनाएँ
                      स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)

रविवार, 1 सितंबर 2019

युद्ध विभीषिकाओं(War Catastrophe) के परिणाम इतने भयावह फिर भी….

War Catastrophe

जम्मू कश्मीर से धारा 370 (Article 370) हटाये जाने के बाद से भारत को पड़ोसी मुल्क द्वारा लगातार दी जा रही युद्ध की धमकियाँ आज पूरे विश्व में बहस का मुद्दा बन गयी हैं| हालाँकि इस राज्य के हित में लिया गया भारत सरकार का ये फैसला राष्ट्र का आंतरिक मुद्दा है, फिर भी पड़ोसी देश की ये प्रतिक्रिया ऐसी क्यों है, ये अनुत्तरित (unanswerable) प्रश्न है? लेकिन इससे एक कदम और आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर देखें तो वहां भी हालात कुछ सामान्य नजर नहीं आते|  अभी कुछ दिन पहले तक उत्तर कोरिया द्वारा आये दिन जापान, दक्षिण कोरिया व अमेरिका को दी जा रही युद्द की धमकियाँ भी इन्हीं सिलसिलों का एक हिस्सा भर हैं| इससे आगे तो न जाने कितना कुछ प्रतिदिन घटता है, जो युद्ध की शक्ल में ऐसी अघोषित लड़ाइयाँ हैं, जिनपर आये दिन दुनियाँ के किसी न किसी कोने में इंसानियत शर्मसार हो रही है| आज विश्व के कई ऐसे देश हैं जो पूर्व में या वर्तमान में चल रही लड़ाइयों का विध्वंझेल रहे हैं, चाहे वो अफगानिस्तान हो, कुवैत, इराक, सीरिया, लेबनान, इजराइल या फिर फिलिस्तीन, सभी युद्ध रूपी इस हिंसा की भेंट में इंसानी वजूद को या तो झोंक चुके हैं या फिर झोंक रहे हैं|

आखिर इन लड़ाइयों से हांसिल क्या होता है, ये मुझे आजतक समझ नहीं आया| वैसे अगर वैश्विक स्तर पर युद्ध विभीषिकाओं की बात करें तो ज्यादा दूर जाने की जरुरत हमें नहीं पड़ेगी, क्योंकि इन युद्धों को बीते अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है| सन् 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध (World War I) लड़ा  गया और 1939 से 1945 तक चला द्वितीय विश्व युद्द (World War II) जिसकी गवाही देने वाले भी कुछ लोग इस धरती पर आज भी मौजूद हैं और इनके परिणाम वो तो पूरी दुनियाँ आजतक देख रही है कि कैसे इन युद्धों ने पूरी धरती को आकाश व पाताल सहित झकझोर कर रख दिया| इनके प्रभाव व परिणाम की बात यदि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व अन्य पहलूओं से परे हटकर मात्र मानवता के विध्वंसात्मक पहलूओं को देखें तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं|

दोस्तों अभी कुछ दिन पूर्व मैंने सीरिया की refugee family पर बनी एक documentary देखी, जिसमें एक 9 साल की छोटी बच्ची अपने दादा-दादी, नाना-नानी और cousins को छोड़ अपने माँ-बाप व छोटी बहन के साथ एक refugee camp में रहती है| उसने बताया कि वो कैसे उन छोटी-छोटी खुशियों के लिए परेशान हो जाती है, जो उसे उसके वतन में मिलती थे, उसे नहीं पता की आगे क्या होगा? फिर भी उसकी उम्मीदें सबकुछ ठीक हो जाने की हैं| मुझे तो ये समझ ही नहीं आता की कैसे ये सबकुछ बदलेगा, कैसे बंद होगी ये अघोषित लड़ाई, जो न जाने कितनी मासूम जिंदगियों को झुलसाए जा रही है, और भी मुद्दे हैं यहाँ अशिक्षा, निर्धनता, बीमारी, भुखमरी, प्राकृतिक आपदाएँ जिनपर हमें ध्यान देने की जरूरत है, अगर हमें युद्ध छेड़ना है तो इनके खिलाफ छेड़ना चाहिए| मात्र अपनी एक सोच के लिए कुदरत द्वारा बनाई गयी इस दुनियाँ को आग की लपटों में ढकेलना कहाँ तक उचित है?


शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

कृष्णा ने रचा सारा संसार,
कृष्णा ने दिया ये जीवन सार |
गीता का जो ये ज्ञान दिया,
खुद को भावाग्नि में तौल दिया |
फिर भी मिट सका न तमस का ये संग्राम,
मूल्यों की दी थी जो विरासत  |
उसको भी मानव ने छोड़ दिया,
निर्मम थी वो प्रेमाग्नि |
जिसमें खुद को झोक दिया,
सहज सरल थी वो राहें |
जिसपर चलना हम इन्सानों ने छोड़ दिया,
कहाँ गईं वो नन्द की गलियाँ |
जिन संग कान्हा दौड़े थे,
बचपन की उस निठलाई ने |
कान्हा संग हमको जोड़ दिया,
गहन हो चला है फिर अँधियारा |
आकर इसको दूर हटाओ,
एक बार फिर कलयुग में अब |
कुंज की गलियाँ फिर खड़काओ,
कृष्णा ने रचा सारा संसार,
कृष्णा ने दिया ये जीवन सार...
                 स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)
समग्र मानव जाति को कर्म की राह पर चलने का ज्ञान देने वाले श्री कृष्ण के जन्म अवतरण की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ...

गुरुवार, 15 अगस्त 2019

स्वंत्रतता दिवस और रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं!!!

स्वंत्रतता दिवस

   महक रही है देश की बगिया, आजादी के भावों से |
          चमक रहा है स्वर्ण सा मस्तक, बन कश्मीर ललाटों पे ||
   अबकी बार पूरी आजादी, सैतालीस के वादों से |
ऐसी मधुरिम बेला में युग्मित होकर, पवन बह रही देश भक्ति के रागों से |
  दीप जला कर करो स्वागत नए सृजन का, भारत माँ के आँगन से ||
           महक रही है देश की बगिया, आजादी के भावों से....
                              स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव (कैलाश कीर्ति)
अद्भुत संयोग का गवाह बना है सन् 2019 का ये वर्ष जब रक्षाबंधन के साथ युग्मित है भारत की आजादी का दिवस, जिसने राखी के सूत्र की मर्यादा को और गौरवमयी बनाया है| ऐसे मेरे देश भारत के स्वतन्त्रता दिवस की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ!!!

शनिवार, 10 अगस्त 2019

बुलंद भारत की तस्वीरों में भरते नए रंग

India's Achievement
सँवर रहा है भारत मेरा,
सजग प्रहरियों के दम पर |
निर्विघ्न हो चली राहें इसकी,
सजग प्रहरियों के दम पर |
एक सूत्र में बंध गया भारत,
सजग प्रहरियों के दम पर |
मिटा शूल सन् सैतालीस का,
सजग प्रहरियों के दम पर |
सँवर रहा है भारत मेरा...
        (स्वरचित रश्मि श्रीवास्तव “कैलाश कीर्ति”)

“मेरा भारत अब सँवर रहा है ये पंक्तियाँ आज हर भारतवासी के मन को राष्ट्रभक्ति के भाव से ऐसे भर रही हैं, मानों आँखों के सामने भारत की गर्वीली छवि को बिखेरने वाला कोई पिटारा खुल गया हो और ऐसा हो भी क्यूं न, वर्तमान में आज हमारे देश को समृद्धवान बनाने की जो पहल चल रही है, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि अब हमारा देश फिर से अपने प्राचीन गौरव को हांसिल करने की ओर ऐसा सशक्त कदम बढ़ा रहा है, जिसकी धमक से पूरी दुनियाँ स्तब्ध हो जाएगी, अब फिर से भारत की साख से जुड़ी तस्वीरों में वही रंग भरने शुरू हो गए हैं, जिनकी आमद का इंतजार एक लंबे दशक से भारतीय जनमानस कर रहा था| अभी हाल ही में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद (Article) 370 व 35A को लेकर उठाए गए साहसिक कदम ने तो भारत और भारतवासियों के “विविधता से भरी एकता(Unity in Diversity) के उस जज्बे को दुनियाँ के सामने रखा है, जिसके लिए ये देश जाना जाता है| इतिहास गवाह है कि भारत एक ऐसा देश है कि जिसमें रहने वाले नागरिकों ने बिना संसाधनों की परवाह किए दुनियाँ को बदलने वाले आविष्कार दिये हैं|

5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से Article 370 व 35A के हटाये जाने से पूर्व 22 जुलाई 2019 को भारत से अन्तरिक्ष में भेजे गए चंद्रयान-2 (Chandrayaan 2) ने भी हम भारतीयों को भी वो गौरवशाली क्षण हमारे जीवन में दिखलाए हैं, जो हम सबका स्वप्न है| हमारे भारत की तस्वीर अब बदल रही है, दुनियाँ भी भारत की उपस्थिति को स्वीकारने लगी है, वाकई ये आनंदमयी अनुभूति है| आने वाले वक्त के साथ इस कड़ी में जुडने वाली और तस्वीरों की उम्मीद लिए “जय हिन्द, जय भारत”!


रविवार, 4 अगस्त 2019

मित्रता की डोर से बंधे सभी मित्रों को, मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!! Happy Friendship Day!!!



Happy Friendship Day!!!


पावन से रिश्तों का सार है ये, मित्रता!
कृष्णा और सुदामा सा प्यार है ये, मित्रता!
प्रभु राम से हनुमान की भक्ति का व्यवहार है ये, मित्रता!
आपसी सम्बन्धों की प्रगाढ़ता है ये, मित्रता!
उलझे को भी जो सुलझा दे उसका उपाय है ये, मित्रता
जात-पात, उंच-नीच के भेद से, परे है ये, मित्रता!
तभी तो सृष्टि के आदि से आज तक है, ये मित्रता!
             ........आज तक है, ये मित्रता!

रविवार, 28 जुलाई 2019

मनोरंजन (Entertainment) की आज की ये दुनियाँ confusing तो नहीं…


The Entertainment World

आज दुनियाँ 21वीं सदी के दौर को जी रही है और इस सदी में चारों ओर बाजारीकरण की ऐसी बयार चल रही है, जिसमें मानवीय जीवन की सारी संवेदनाओं को भुनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है और इसी में से एक है, “मनोरंजन की दुनियाँ” (The Entertainment World), जहां छह महीने के बच्चे से लेकर सौ साल तक की आयु वाले के लिए भी कुछ न कुछ है| कहने को तो मनुष्य को खुशी देने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर रची गयी है ये दुनियाँ, लेकिन क्या हमें ये वो खुशी दे पाने में सफल है, जिसका आज के मानवीय जीवन को सरोकार है? आज जब हम अपने चारो ओर मनोरंजन को जेहन में रखकर अपनी आखें घुमाते हैं तो options की हमें इतनी लंबी-चौड़ी फेहरिस्त दिखाई पड़ती है, जिसमें से हम क्या चुनें, ये समझ ही नहीं आता? इसका जीता जागता उदाहरण है, टीवी, जिसके शुरुआती दौर में मनोरंजन के नाम पर केवल दूरदर्शन आता था, जिसमें विकल्प भले कम थे, पर उस जमाने में दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करा पाने में सफल हो जाते थे| लेकिन आज के इस दौर में टीवी ऑन करते ही, चैनलों की इतनी सारी लिस्ट सामने आती है कि समझ ही नहीं आता, कौन सा मनोरंजक चैनल मन को खुशी देने वाला है और किसपर हम अपनी आखें टिकाएँ? हमारे confusion में अभी और किस बात की कमी थी कि Internet की भी दुनियाँ इससे आकार जुड़ गयी, जिसके जरिये मनोरंजन विकल्पों का अथाह भंडार दर्शकों के सामने उपलब्ध हो गया| अब तो बिलकुल ही समझ नहीं आता कि जिंदगी की भाग-दौड़ से बचे अपने चंद लम्हों को हम कहाँ खर्चें, जो हमारे मन को सुकून और जेहन को खुशी दे| जिस मनोरंजन की दुनियाँ से हम खुशियों की चाह में जुडने की कोशिश करते हैं, वो भी हमें कहीं न कहीं असंतुष्टि (Dis-satisfaction) का ही गुण सीखा रही हैं| मसलन ये चैनल नहीं पसंद आ रहा है, तो हम उसे बदलकर दूसरा लगाते हैं, ऐसा करते-करते हम कहीं संतुष्टि (Satisfaction) नहीं पाते और झल्लाकर स्विच-ऑफ कर उठ जाते हैं|

आज हमारे समाज की ये मनोदशा शायद बाजारीकरण(Commercialization) के दौर के चलते कहीं न कहीं असमंजस से भरी (Full of Confusion) एक जटिल सोच (Complex Thought) का शिकार है, जो हमें ये सिखाती है कि जीवन में मनुष्य ने यदि प्रारम्भ से ही संतुष्टि को शामिल कर लिया होता, तो शायद खुशियों के मायने भी कुछ और होते|

रविवार, 21 जुलाई 2019

जल के बल से....बेबस क्यों हैं हम


Water Conservation

कहीं बरसा है सावन तो,
कहीं प्यासी ये धरती है,
कहीं सैलाब सा है जल,
तो कहीं सूखे का है मंजर,
बदल दो रुख ये मौसम का,
मिटा तो फासला इनका,
क्योंकि तुम्ही से है ये धरती
और तुम्हीं से है ये जीवन भी

कहने को तो सावन का महिना है, काले-काले मेघों की आकाश में मौजूदगी से धरती भी प्रफुल्लित नज़र आ रही है, धरती की ये खुशी इस बात का संकेत दे रही है कि धरा पर चहुं ओर हरियाली छायी है| धरती से ऋतु के इस मिलन का मधुर संगीत कानों में किसी दिव्य संगीत की तरह गुंजायमान हो रहा है!

है न मनोरम अभिव्यक्ति, जो मात्र जादुई शब्दों का करिश्मा है, जिसे कागज पे उकेरा गया है, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है| आसमान से हो रही काले-काले मेघों द्वारा जल की बारिश वर्तमान में हमारे चारो ओर चल प्रलय बन सब कुछ खत्म करने पर आमादा है और इस जल से हो रही क्षतियाँ इस ओर इशारा करती प्रतीत हो रहीं हैं कि प्रकृति से खिलवाड़ करने वालों अभी भी वक्त है संभलने का क्योंकि ये जल का जो बल है वो यदि जिद्द पे आ जाए तो कैसे एक झटके में ही सबकुछ नष्ट कर सकता है|

आज वर्तमान में जल की ये माया मात्र और मात्र विनाश पर उतारू है, एक तरफ नदियां उफान पर हैं तो दूसरी ओर इन्द्र देवता समस्त धरती को जलमयी करने पे तुले हैं और जिसकी बलि चढ़ रहा है, इनकी चपेट में आने वाला मानव जीवन, अभी इसी हफ्ते मुंबई के डोंगरी इलाके में न जाने कितनी मासूम जिंदगियाँ दफन हो गईं वहीं दूसरी ओर देश के अनेक राज्यों में आई बाढ़ ने मानव जीवन के साथ-साथ मवेशियों सहित सम्पूर्ण फसलों को भी अपनी तबाही की जद् में समेट लिया है और यदि आंकड़ों का हिसाब लगाया जाए तो लगभग हर वर्ष ये स्थिति ऐसी ही उभर कर सामने आती है| ऐसा क्यों होता है कि साल भर हम जल की न्यूनता को लेकर चिंतित होते हैं और जब साल के कुछ महीनों में हमें ये प्रकृति द्वारा स्वयं मुहैय्या कराई जाती है तो हम इन्हें संभाल ही नहीं पाते| क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि प्रतिवर्ष जल के बल से आँख मिचौली खेलने की बजाय समय रहते उन उपायों को स्वीकारा जाये जो जल प्रलय को रोकने में अपनी अहम भूमिका निभाएँ, जैसे सूखती नदियों से बारिश में जल मग्न नदियों का जुड़ाव, जगह-जगह कृतिम तालाबों की और ज्यादा व्यवस्था, नदी के निचले इलाकों के लिए तकनीकों से लैस प्रणालियों की स्थापना, बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के लोगों का इन दिनों के लिए विशेष प्रशिक्षण तथा अन्य वैकल्पिक संसाधनों की उपलब्धता का प्रति व्यक्ति पर आधारित होना, कुछ ऐसे उपाय हैं, जो यदि अमल में लाए जाएँ तो जल के इस बल के समक्ष घुटने टेकने के बजाय हम उससे लड़ने में सफल साबित होंगे और जहां तक प्रश्न है डोंगरी जैसी परिस्थितियों का तो हमें प्रसाशन के साथ जन सहयोग करना अनिवार्यता की ओर ले जाता है, जिसे यदि समय रहते कर लिया जाये तो हमारे देश के नागरिकों की सुरक्षा हित का ध्यान रखना संभव हो सकेगा, क्योंकि भारत माँ की एक भी संतान का यूं असमय मात्र सुव्यवस्थाओं के आभाव में दुनियाँ से चले जाना हमारे राष्ट्र के साथ हमारे समाज की भी अपूरणीय क्षति है|

तो आइये हम सभी ये अभी से सुनिश्चित करें कि आने वाले भविष्य में हम प्रकृति के संरक्षण का दायित्व निभाते हुए जल के बल से बेबस होने के बजाय बेखौफ बनेंगे....

रविवार, 7 जुलाई 2019

भाषाओं की रहस्यमयी दुनियाँ

Birth of Languages
भाषा अर्थात अपनी बातों को दूसरे तक पहुंचाने का वो माध्यम जिनके जरिये हम किसी भी कार्य को सार्थकता प्रदान करते हैं| आज पूरी दुनियाँ में अनगिनत भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन बोले गए सभी भाषायी शब्दों का भावार्थ एक ही होता है, जैसे हम यदि हिन्दी भाषा में ये पूछते हैं कि तुम्हारा नाम क्या है? वैसे ही इंग्लिश में हम पूछते हैं What is your name?”, वैसे ही संस्कृत में बोलते हैं “तव नाम किम अस्ति” और फ्रेंच मेंquel eston nom” यानि सभी भावनाएँ और शाब्दिक अर्थ भाषाओं की रहस्यमयी दुनियाँ में गोल-गोल घूमते रहते हैं और इन भाषाओं की इन दुनियाँ में गोल-गोल घूमती है समग्र मानव जाति| कहीं-कहीं तो भाषा को लेकर ही द्वंद (लड़ाई -झगड़े) की नौबत बन जाती है|

ऐसे में इन्सानों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी इन भाषाओं की शुरुआत कहाँ से हुई है? ये जानने के लिए कभी-कभी हमारा मन व्याकुल हो उठता है, इनका पूर्ण रहस्य तो हम में से शायद ही कोई जनता है, पर अनुमानतः ये आंकलन अवश्य लगाया जाता है कि लगभग सभी भाषाओं के पीछे एक ही भाषा है जिसे स्वयं सृष्टि संचालित कर रही है और वो है संस्कृत भाषा | अब हमारे मन में एक सवाल और आया कि आखिर ये संस्कृत कहाँ से आयी? तो सटीक उत्तर का अभाव तो है, परंतु प्राचीन लिखे इतिहास जैसे वेद, पुराण, उपनिषद और अष्टाध्यायी जैसे ग्रंथ इस ओर इशारा करते हैं कि आदिकाल में भाषा थी ही नहीं, केवल ध्वनि संकेत हुआ करते थे, जो सौरमण्डल के जीवनदायी ग्रह सूर्य के एक ओर से 9 निकलती रश्मियों के रूप में प्रसरित होते थे और चारों ओर से मिलकर ये 36 हो जाती हैं और इन्हीं 36 ध्वनियों द्वारा संस्कृत के 36 स्वर बनें हैं (Vowel) और जब ये 9 रश्मियां पृथ्वी पर आकार 8 वसुओं से टकराती हैं, तो 72 ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन (Consonant) निर्मित हुए हैं और इस प्रकार तैयार हुई संस्कृत वर्णमाला क्योंकि प्राचीनकाल के विद्वानों का मत था कि धरती और ब्रह्मांड में गति सर्वव्याप्त है और विज्ञान का ये नियम है कि यदि गति होगी तो ध्वनि होगी और जहां ध्वनि होगी तो शब्द निकलेंगे ही, बस इन्हीं शब्दों को प्राचीनकाल के महर्षियों ने लिपि में बांधा जिसकी पुष्टि अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने स्वीकारी है|

लेकिन एक बात यहाँ और निकलकर सामने आती है और वो ये है कि भाषाओं के शब्द बनने से पूर्व बातचीत का माध्यम क्या था और जैसा कि हम सभी जानते हैं “मनुष्य जाति आविष्कारों की जननी है” तो शुरुआत में ही इस प्रजाति ने बातचीत के लिए ध्वनि संकेतों को चुना, फिर आयी चित्रलिपि, उसके बाद आयी भाषायी लिपि जिसका आधार विद्वानों ने संस्कृत को माना और उसी से भारतीय भाषाओं सहित अधिकतर यूरोपीय भाषाओं का भी जन्म हुआ और यहीं से चल पड़ा भाषाओं का सिलसिला| तो है न भाषाओं की दुनियाँ रहस्यमयी? जहां अभी कितनी परतें खुलनी बाकी हैं, क्योंकि शोध ऐसी कड़ी है, जो प्राचीन को इतिहास बना देता है और नए जुड़े को ही सही और सटीक साबित करता है| आने वाले भविष्य में भाषाओं से जुड़े कुछ रहस्य अवश्य खुलेंगे ऐसी मेरी आशा है, क्योंकि तभी सम्पूर्ण जगत एक परिवार बन पाएगा, जब इंसान उस आधार को खोज लेगा जहां से इन सभी भाषाओं का उद्भव हुआ है और यदि ऐसा होगा तो दुनियाँ भर के लोग अपनी बात एक-दूसरे से आसानी से व्यक्त कर सकेंगे और जिसके चलते वो दायरा बढ़ता जाएगा जो भाषा के चलते सीमित है|